जगन्नाथ संस्कृति

भगवान श्री जगन्नाथ के पावन वेश

पुरी श्रीमंदिर के बत्तीस दिव्य वेश — उनकी तिथि, वेश-विधान और प्रत्येक का महत्व।

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सुधर्मा महा-महा संघ भारत का नया सचित्र प्रकाशन, पंडित डॉ. श्री काशीनाथ मिश्र के मार्गदर्शन में। 33 पृष्ठ, निःशुल्क, ईमेल की आवश्यकता नहीं।

इसमें क्या है

प्रकाशन की विषय-वस्तु

नित्य वेश-क्रम

अबकाश, सादा और बड़ा शृंगार — प्रातःकाल से रात्रि शयन तक प्रभु का वेश कैसे बदलता है।

वार्षिक उत्सव-चक्र

ओड़िया चान्द्र वर्ष के उनतीस उत्सव-वेश — वैशाख की चन्दन लागि से दोल पूर्णिमा की चाचेरी तक।

विशेष वेश

रथयात्रा का टाहिया लागि, स्वर्णमय सुना वेश, और दुर्लभ नागार्जुन वेश — जो केवल छह-दिवसीय कार्तिक पंचुक में होता है।

वेश-पंचांग

प्रभु के वस्त्रागार में एक वर्ष — मास-दर-मास, तिथि और अवसर सहित।

वेश क्या सिखाते हैं

हर धर्म के लिए छह चिन्तन: हर रूप में एक ही प्रभु, ऋतुओं के भीतर बसा पावन, आनन्द एक धार्मिक कर्तव्य।

भविष्य मालिका और कल्कि

अन्तिम खण्ड: त्रिसन्ध्या, माधव नाम और श्रीमद्भागवत महापुराण — भय से नहीं, धर्म से तैयार हों।

छायाचित्रों के विषय में

“32 बेश” प्रदर्शनी

इस प्रकाशन के वेश-छायाचित्र भगवान जगन्नाथ के दिव्य वेशों की “32 बेश” प्रदर्शनी एवं सांस्कृतिक उत्सव में लिए गए, जो 14–20 अगस्त 2026 को श्री लिंगराज मन्दिर के निकट लिंगराज भजन मण्डप, भुवनेश्वर में आयोजित हुआ — ओड़िशा सर्विस सेंटर फॉर द दिव्यांग पीपुल्स, श्री जगन्नाथ संस्कृति प्रचार संस्थान और विश्व हिन्दू परिषद (भुवनेश्वर महानगर) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित। ये वेशों की कलात्मक प्रदर्शनी-प्रस्तुतियाँ हैं, क्योंकि श्रीमंदिर के भीतर रत्नसिंहासन की फ़ोटोग्राफ़ी अनुमत नहीं है। सुधर्मा महा-महा संघ भारत ने यह ग्रन्थ भक्तों की जानकारी हेतु संकलित एवं प्रकाशित किया है।

आगे की यात्रा

भविष्य मालिका की शिक्षाएँ पढ़ें और त्रिसंध्या की नित्य साधना आरम्भ करें।

🙏 जय जगन्नाथ! 🙏