
श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 अध्याय 1: ऋषियों के प्रश्न
नैमिषारण्य में प्रवेश करें, जहाँ शौनक और ऋषिगण पूज्य सूत जी से प्रश्न करते हैं और सम्पूर्ण भागवत आरम्भ होता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धामय पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →श्रीमद्भागवत, अध्याय-दर-अध्याय — भागवत माहात्म्य और प्रत्येक स्कन्ध, शास्त्र के क्रम में, प्रत्येक कथा-भाग ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र से आरम्भ होता हुआ। प्रत्येक अध्याय की कथित वाचन-प्रस्तुति के साथ पावन पाठ भी पढ़िए।
📥 PDF में निःशुल्क डाउनलोड करें — कोई भी अध्याय या पूरा स्कन्धश्रीमद्भागवत के दिव्य सागर में प्रवेश करने से पहले हम मंगलाचरण से आरम्भ करते हैं — परमेश्वर के चरण-कमलों में विनम्रता और भक्ति के साथ अर्पित एक शुभ वंदना।
मंगलाचरण पावन भागवत कथा के श्रवण के लिए हृदय और मन को तैयार करता है। यह दिव्य कृपा, बुद्धि की शुद्धता, विघ्नों के निवारण और श्रीमद्भागवत महापुराण में निहित शाश्वत ज्ञान को ग्रहण करने के आशीर्वाद की प्रार्थना है।
🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवायओम् नमो भगवते वासुदेवायश्रीमद्भागवत का प्रत्येक शब्द हमारे हृदय में भक्ति जगाए, भगवान् के स्मरण को दृढ़ करे और हमें सत्य, पवित्रता, करुणा और प्रेममयी सेवा की ओर ले चले।
🎶 ओड़िया में गाया गया यह पावन भागवत मंगलाचरण सुनिए और श्रद्धा एवं समर्पण के साथ इस आध्यात्मिक यात्रा का आरम्भ कीजिए।
श्रृंखला के प्रत्येक कथा-भाग का एक श्रद्धामय, अध्याय-दर-अध्याय पाठ और भक्तिमयी प्रस्तुति — गीता प्रेस पर आधारित, श्लोक-सत्यापित, तथा पावन ग्रन्थ के मूल क्रम का अनुसरण करते हुए।

नैमिषारण्य में प्रवेश करें, जहाँ शौनक और ऋषिगण पूज्य सूत जी से प्रश्न करते हैं और सम्पूर्ण भागवत आरम्भ होता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धामय पुनर्कथन।
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सूत जी ऋषियों को उत्तर देते हैं: निष्काम भाव से अर्पित भगवद्भक्ति ही परम धर्म है। सत्यापित श्लोकों के साथ एक श्रद्धामयी, प्रामाणिक प्रस्तुति।
पाठ जारी रखें →पूज्य सूत जी आदिपुरुष से लेकर कल्कि तक भगवान् के अवतार खोलते हैं और वह महान सत्य प्रकट करते हैं: श्रीकृष्ण स्वयं परम भगवान् हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धामय पुनर्कथन।
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स्वयं वेदों के संकलनकर्ता का हृदय भी अतृप्त था। वेदव्यास की अतृप्ति और नारद के आगमन की एक भक्तिपूर्ण, प्रामाणिक कथा — सत्यापित श्लोकों सहित।
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नारद व्यास जी के महान् ग्रन्थ की एकमात्र शेष कमी बताते हैं और स्मरण करते हैं कि किस प्रकार एक दासीपुत्र-रूप में श्रीकृष्ण की महिमा सुनने ने उन्हें भगवान् तक पहुँचाया। एक श्रद्धामय, सत्यापित पुनर्कथन।
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देवर्षि नारद की कोमल जीवन-कथा: एक पितृहीन बालक, श्रीहरि का दिया और छीना गया दर्शन, और वह वीणा-गीत जो सन्तप्त संसार को आनन्दित करता है। एक श्रद्धामय, सत्यापित पुनर्कथन।
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व्यास जी भागवत संसार को देते हैं; अर्जुन अश्वत्थामा को बन्दी बनाते हैं; द्रौपदी करुणा दिखाती है और श्रीकृष्ण न्याय का समन्वय करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धामय पुनर्कथन।
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भगवान् गर्भस्थ शिशु परीक्षित की रक्षा करते हैं और कुन्ती विपत्ति की प्रार्थना करती हैं ताकि उन्हें कभी न भूलें। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धामय पुनर्कथन।
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शरशय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को धर्म की शिक्षा देते हैं और, श्रीकृष्ण पर दृष्टि टिकाकर, एक दीप्तिमान स्तुति के साथ देह त्याग देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धामय पुनर्कथन।
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श्रीकृष्ण पुष्प-वर्षा और शोक के मध्य हस्तिनापुर से विदा लेकर द्वारका लौटते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धामय भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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शंख की ध्वनि सुनते ही समस्त द्वारका अपने लौटते स्वामी के स्वागत को उमड़ पड़ती है। कृष्ण के गृह-प्रत्यागमन का सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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गर्भ में बचाया गया शिशु भगवान् के दर्शन करता है, पाण्डु के वंश को आगे बढ़ाने हेतु जन्म लेता है, और विष्णुरात एवं परीक्षित कहलाता है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धामय पुनर्कथन।
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तीर्थयात्री विदुर अपने अन्धे भाई धृतराष्ट्र को जगाते हैं कि वे त्यागकर भगवान् की ओर चलें, और नारद जी सिखाते हैं कि समस्त मिलन-वियोग भगवान् के हाथ में है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धामय पुनर्कथन।
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कलियुग के निकट आते ही भयंकर अपशकुन राजा युधिष्ठिर को चेताते हैं कि श्रीकृष्ण संसार से विदा लेने को हैं, और अर्जुन द्वारका से उदास लौटते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथा।
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अर्जुन स्वीकार करते हैं कि हर विजय कृष्ण की देन थी, युधिष्ठिर परीक्षित का अभिषेक करते हैं, और पाण्डव उत्तर की महायात्रा पर निकल पड़ते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धामय पुनर्कथन।
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भक्त-राजा परीक्षित धर्म की रक्षा करते हैं, जबकि धर्म और पृथ्वी माता प्रस्थान कर चुके प्रभु श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं। श्रीमद्भागवत 1.16 का श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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सम्राट परीक्षित युग के मूर्तरूप से मिलते हैं, धर्म और पृथ्वी माता की रक्षा करते हैं, और दिखाते हैं कि करुणा से ही न्याय पूर्ण होता है। श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1, अध्याय 17।
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एक बालक ऋषि का आवेशपूर्ण शाप धर्मात्मा राजा परीक्षित की मृत्यु निश्चित कर देता है, फिर भी उनके पिता शमीक क्षमा से उत्तर देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक भक्तिमय पुनर्कथन।
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राजा परीक्षित शाप को ईश्वर तक का द्वार बना लेते हैं और गंगा-तट पर आमरण अनशन का व्रत लेते हैं। तत्पश्चात् युवा मुनि श्रीशुकदेव गोस्वामी पधारते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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श्रीशुकदेव का वचनबद्ध उत्तर आरम्भ होता है — कथा-श्रवण का परम महत्त्व, ध्यान की क्रमबद्ध विधि, तथा भव्य विराट् पुरुष, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भगवान् के ही शरीर के रूप में वर्णित करने वाली शिक्षा। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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श्रीशुकदेव का उपदेश आगे बढ़ता है — ब्रह्मा का विस्मृत ज्ञान पुनः प्राप्त होना, हृदय में ध्यान किया जाने वाला भगवान् का आत्मीय चतुर्भुज रूप, सचेत रूप से शरीर त्यागने की सटीक योग-विधि, तथा मुक्ति के दो शाश्वत मार्ग — क्रममुक्ति और सद्योमुक्ति। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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श्रीशुकदेव परीक्षित को अपना उत्तर समाप्त करते हैं, फिर विशिष्ट सांसारिक कामनाओं के लिए परम्परागत रूप से उपास्य देवताओं का सर्वेक्षण करते हैं — केवल यह दिखाने के लिए कि भगवद्भक्ति इन सबसे श्रेष्ठ है। शौनक सूत से कथा आगे बढ़ाने का अनुरोध करते हैं, और अध्याय भगवान् के नाम के श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण पर भागवत के मार्मिक श्लोकों के साथ समाप्त होता है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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श्रीशुकदेव के उपदेश को सुनकर, राजा परीक्षित अपनी समस्त आसक्तियाँ त्यागकर पूछते हैं कि भगवान् ब्रह्माण्ड की सृष्टि, पालन तथा संहार कैसे करते हैं। श्रीशुकदेव का उत्तर ब्रह्माण्ड-विज्ञान से नहीं, अपितु परम पुरुष को समर्पित एक त्रयोदश-श्लोकीय स्तुति से आरम्भ होता है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ब्रह्मा नारद के ब्रह्माण्ड सम्बन्धी प्रश्न का उत्तर एक विनम्र स्वीकारोक्ति से देते हैं — वे केवल सृजन करते प्रतीत होते हैं — और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भगवान् से प्रकट होता हुआ दर्शाते हैं: तीन गुण, महत् तथा अहंकार, पाँच तत्त्व, इन्द्रियाँ तथा उनके देवता, ब्रह्माण्ड-अण्ड, तथा समस्त चौदह लोकों को धारण करने वाले विराट् पुरुष। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ब्रह्मा नारद को अपना उत्तर जारी रखते हुए वर्णन करते हैं कि विराट् पुरुष के मुख, नेत्र, अंग तथा प्रत्येक शक्ति से देवताओं तथा तत्त्वों का जन्म कैसे होता है — तत्पश्चात् शास्त्र की सबसे विनम्र स्वीकारोक्तियों में से एक अर्पित करते हैं: वेद-स्वरूप तथा योग में निपुण होते हुए भी, वे भगवान् को पूर्णतः नहीं जान सकते। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ब्रह्मा ऋषि नारद को भगवान् के युगों में अवतारों की विस्तृत सूची सुनाते हैं — वराह, कपिल, दत्तात्रेय, कुमार, ध्रुव, पृथु, मत्स्य, कूर्म, नृसिंह, वामन, राम, कृष्ण-बलराम, व्यास, बुद्ध, तथा आने वाले कल्कि — और अन्त में भगवान् के अगम्य स्वरूप पर एक चिन्तन करते हैं। एक निष्ठापूर्ण, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन, सत्यापित श्लोकों सहित।
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जीवन के सात दिन शेष रहते, राजा परीक्षित ऋषि शुक के समक्ष अपने हृदय का प्रत्येक प्रश्न उड़ेल देते हैं — भागवत की उत्पत्ति, आत्मा तथा विराट् पुरुष, कल्प तथा काल, युग तथा भगवान् के अवतार, कर्तव्य, योग, वेद, तथा बन्धन-मुक्ति के रहस्य के विषय में। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ब्रह्मा एक अदृश्य शब्द के बल पर एक हज़ार दिव्य वर्षों तक तपस्या करते हैं, भगवान् के अपने दिव्य धाम का दर्शन पाते हैं, तथा चतु:श्लोकी भागवतम् प्राप्त करते हैं — चार ऐसे श्लोक जो इतने पूर्ण हैं कि सम्पूर्ण शास्त्र को परम्परागत रूप से इन्हीं का विस्तार माना जाता है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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श्रीशुकदेव गोस्वामी उन दस विषयों का नामोल्लेख करते हैं जो सम्पूर्ण भागवत पुराण की संरचना करते हैं — सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊतियाँ, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति, तथा आश्रय — तत्पश्चात् दर्शाते हैं कि आदिम जल में अकेले विराट् पुरुष ने ब्रह्माण्ड की प्रत्येक इन्द्रिय तथा अंग को कैसे उत्पन्न किया। द्वितीय स्कन्ध का यह अन्तिम अध्याय शौनक के विदुर-सम्बन्धी प्रश्न से समाप्त होता है, तृतीय स्कन्ध का द्वार खोलते हुए। एक निष्ठापूर्ण, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन, सत्यापित श्लोकों सहित।
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सत्य कहने के कारण हस्तिनापुर से निर्वासित विदुर वर्षों तीर्थयात्रा में बिताने के पश्चात् यमुना तट पर अपने सहभक्त उद्धव से मिलते हैं। तृतीय स्कन्ध के प्रथम अध्याय का श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन — कुरु-कुल का पतन, विदुर का परामर्श तथा निर्वासन, उनका तीर्थयात्री-व्रत, तथा यादव एवं पाण्डव परिवारों के विषय में उनकी स्नेहिल जिज्ञासा — सत्यापित श्लोकों सहित।
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कृष्ण का समाचार पूछे जाने पर, भक्त उद्धव प्रेम से अभिभूत होकर लगभग एक घण्टे तक मौन रह जाते हैं। तृतीय स्कन्ध के द्वितीय अध्याय का श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन — उस संसार पर उद्धव का विस्मयकारी विलाप जो भगवान् को पहचान न सका, तथा कृष्ण के जन्म, व्रज-बाल्यकाल, कालिय-दमन, गोवर्धन तथा रास-लीला का उनका स्नेहिल वर्णन — सत्यापित श्लोकों सहित।
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अट्ठाईस त्वरित श्लोकों में, उद्धव विदुर को कंस की मृत्यु तथा सोलह हज़ार राजकुमारियों की मुक्ति से लेकर महाभारत युद्ध की गर्जना और यदुवंश के अन्त की प्रथम छाया तक ले जाते हैं। स्कन्ध 3 के तृतीय अध्याय का एक निष्ठावान, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन — सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित।
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यदुवंश का विनाश पूर्ण हो चुका है, और उद्धव सरस्वती के तट पर एक पीपल वृक्ष के नीचे भगवान् से हुई अपनी अन्तिम, कोमल भेंट का वर्णन करते हैं। तृतीय स्कन्ध, चतुर्थ अध्याय का श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन — भगवान् की अन्तिम शिक्षा, विदुर को विनम्रतापूर्वक महर्षि मैत्रेय की ओर भेजा जाना, तथा विदुर की गंगा तक की यात्रा — सत्यापित श्लोकों सहित।
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हरिद्वार में, जहाँ स्वर्गीय गंगा मैदानों में उतरती है, विदुर ऋषि मैत्रेय से पूछते हैं कि एक व्यथित आत्मा स्थायी सुख कैसे पाए — और उत्तर में भागवत का मूल सृष्टि-वृत्तान्त पाते हैं: सृष्टि से पूर्व अकेले भगवान्, माया, पुरुष, महत्तत्त्व, त्रिगुणात्मक अहंकार, पंच तत्त्व, तथा नवसृजित देवताओं की सृजनात्मक कृपा के लिए प्रार्थना। सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित एक निष्ठावान, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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ऋषि मैत्रेय विदुर को भागवत के सबसे असाधारण ब्रह्माण्ड-वर्णनों में से एक सुनाते हैं: भगवान् काल की शक्ति धारण करते हैं, सृष्टि के तेईस असम्बद्ध तत्त्वों में प्रवेश करते हैं, तथा उन्हें तेजोमय विराट-शरीर में समेट लेते हैं — वह विश्व-रूप जिससे इन्द्रियाँ, उनके अधिष्ठाता देवता, तीनों लोक तथा चारों वर्ण उत्पन्न होते हैं। स्कन्ध 3 के षष्ठ अध्याय का एक निष्ठावान, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन — सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित।
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विदुर मैत्रेय से पूछते हैं कि शुद्ध, गुणातीत, आत्म-तृप्त भगवान् माया तथा क्रीड़ा से स्पर्शित कैसे प्रतीत हो सकते हैं। मैत्रेय का उत्तर — कटे सिर का स्वप्न, जल में काँपता चन्द्रमा — इस उलझन को सुलझाता है, और विदुर आगे चालीस प्रश्न पूछते हैं जो भागवत के शेष भाग की रूपरेखा बनाते हैं। स्कन्ध 3 के सप्तम अध्याय का एक निष्ठावान, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन — सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित।
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महर्षि मैत्रेय विदुर को अपनी दीर्घ-प्रतीक्षित शिक्षा सृष्टि की ही कथा से आरम्भ करते हैं: शयनरत भगवान् नारायण की नाभि से एक कमल उत्पन्न होता है, स्वयंभू ब्रह्मा उसमें प्रकट होते हैं, अपने ही उद्गम की खोज में असफल रहते हैं, तथा सौ वर्षों के ध्यान के पश्चात् शेषनाग पर भगवान् की पूर्ण शोभा का दर्शन करते हैं। स्कन्ध 3, अध्याय 8 का श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन, सत्यापित श्लोकों सहित।
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सोते हुए भगवान् की नाभि से उत्पन्न कमल पर नवसृजित, ब्रह्मा पहली बार अपने पिता को देखते हैं और भागवत की सबसे व्यक्तिगत स्तुतियों में से एक अर्पित करते हैं — अपने ही दीर्घकालीन अज्ञान की स्वीकारोक्ति, भक्ति, काल तथा भगवान् की योगनिद्रा पर चिन्तन, तथा सृष्टि की दृष्टि के लिए याचना। भगवान् आश्वासन तथा शिक्षा के साथ उत्तर देकर अपना रूप अन्तर्धान करते हैं। सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित एक निष्ठावान, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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विदुर ऋषि मैत्रेय से पूछते हैं कि ब्रह्मा ने कितने प्रकार के जीवों को अस्तित्व में लाया, तथा उत्तर में भागवत के महान संरचनात्मक प्रसंगों में से एक प्राप्त करते हैं: ब्रह्मा की सौ वर्षों की तपस्या तथा कमल की खोज, भगवान् की काल-शक्ति, प्रकृति से प्रवाहित सृष्टि की छह धाराएँ, तथा आगे तीन धाराएँ — पौधे, पशु तथा मनुष्य — जो स्वर्गीय जीवों की चरम अष्टविध सृष्टि में परिणत होती हैं। स्कन्ध 3 के दशम अध्याय का एक निष्ठावान, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन — सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित।
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मैत्रेय काल का सम्पूर्ण मापदण्ड इकाई-दर-इकाई प्रस्तुत करते हैं — अविभाज्य परमाणु से लेकर मानव-पंचांग, चार युग, ब्रह्मा का एक दिन-रात्रि, चौदह मन्वन्तर, महाप्रलय, तथा ब्रह्मा के अपने जीवन के दो पराध तक — तथा अन्त में यह प्रकट करते हैं कि यह सम्पूर्ण अपरिमेय मापदण्ड, स्वयं भगवान् के लिए, एक पलक झपकने से अधिक कुछ नहीं है। स्कन्ध 3 के एकादश अध्याय का एक निष्ठावान, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन — काल-इकाइयों की सारणी, सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित।
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महर्षि मैत्रेय विदुर को उस कठिन, अत्यन्त मानवीय कथा का वर्णन करते हैं कि ब्रह्मा ने वास्तव में सृष्टि का निर्माण किस प्रकार किया: अज्ञान की एक अवांछित प्रथम फसल, वैराग्य चुनने वाले चार पुत्र, दबे हुए क्रोध से रुद्र का अश्रुपूर्ण जन्म, उनके अपने ही शरीर से उत्पन्न दस और पुत्र, ईमानदारी से सुधारी गई एक पीड़ादायक भूल, तथा अन्ततः स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की उन पाँच सन्तानों का जन्म जिन्होंने ब्रह्माण्ड को भर दिया। स्कन्ध 3, अध्याय 12 का श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन, सत्यापित श्लोकों सहित।
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जब नवसृजित पृथ्वी कारण-सागर में डूब जाती है और ब्रह्मा उसे बचाने में असमर्थ होते हैं, तब भगवान् कर्म से उत्तर देते हैं: ब्रह्मा की ही नासिका से एक लघु शूकर, क्षणभर में पर्वत के समान विशाल होकर, अथाह जल में गोता लगाकर, दैत्य हिरण्याक्ष का वध करके, तथा संसार को अपने दाँतों पर उठाकर — जबकि ऋषिगण उन्हें यज्ञ के साक्षात् स्वरूप के रूप में स्तुति करते हैं। सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित एक निष्ठावान, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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विदुर मैत्रेय से भगवान् के दानव हिरण्याक्ष के साथ सामने के विषय में पूछते हैं, तथा उत्तर में उस दानव के अपने गर्भाधान की कथा प्राप्त करते हैं: एक अशुभ घड़ी में अपने पति कश्यप से दिति की काम-प्रेरित प्रार्थना, विवाह तथा उस क्षण के संकट पर उनकी सलाह, उनका अन्ततः समर्पण, तथा उसके पश्चात् की दोहरी भविष्यवाणी — दो दुष्ट पुत्र, तथा साथ ही एक भक्त पौत्र। स्कन्ध 3 के चतुर्दश अध्याय का एक निष्ठावान्, शालीन, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन — सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित।
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ब्रह्मा चिन्तित देवताओं को एक पुरानी कथा सुनाते हैं: कैसे चार कुमार ऋषि, वैकुण्ठ के छह द्वारों से स्वतन्त्र रूप से गुजरते हुए, सातवें द्वार पर द्वारपाल जय-विजय द्वारा रोक दिए गए — और कैसे उनका शाप, द्वारपालों के ही कल्याण हेतु उच्चारित, स्वयं भगवान् को तुरन्त द्वार पर ले आया। तृतीय स्कन्ध के पंचदश अध्याय का एक निष्ठावान्, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन — सत्यापित श्लोक, संस्कृत उद्धरण, तथा सम्पूर्ण विसंगति-टिप्पणियों सहित।
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ब्रह्मा वर्णन करते हैं कि वैकुण्ठाधिपति ने अपने ही द्वारपालों के विरुद्ध सन्तों के शाप को आनन्दपूर्वक ग्रहण किया, उनके अपराध को अपना घोषित किया, तथा केवल तब यह प्रकट किया कि शाप स्वयं उनके द्वारा आरम्भ से ही विहित था। सन्त आग्रह करते हैं कि वे केवल ब्राह्मणों के नहीं, समस्त प्राणियों के देवता हैं; भगवान् जय-विजय को विदाई देते हैं, लक्ष्मी द्वारा दिए गए एक पूर्व शाप का स्मरण कराते हुए; तथा दोनों अन्ततः स्वर्ग की व्यथा के मध्य दिति के गर्भ की ओर गिरते हैं। स्कन्ध 3, अध्याय 16 का एक निष्ठापूर्ण, भक्तिपूर्ण तथा सत्यापित पुनर्कथन।
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वैकुण्ठ के दोनों पतित द्वारपाल दिति के जुड़वाँ पुत्रों के रूप में भयंकर अपशकुनों की रात्रि में जन्म लेते हैं। हिरण्यकशिपु ब्रह्मा के वरदान से अजेय होकर तीनों लोकों को जीत लेता है; उसका भाई हिरण्याक्ष, स्वर्ग में भी कोई प्रतिद्वन्द्वी न पाकर, प्रलय-सागर में गोता लगाता है तथा वरुण को उपहासपूर्वक चुनौती देता है — जो अस्वीकार करते हुए, अहंकारी दैत्य को उस एकमात्र भगवान् की ओर मोड़ देते हैं जो वास्तव में उससे मिल सकते हैं। सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित एक निष्ठावान, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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मैत्रेय विदुर को अपनी कथा आगे सुनाते हैं: वरुण की सलाह की उपेक्षा करने वाला दानव हिरण्याक्ष दिव्य वराह को समुद्र की गहराई में खोज निकालता है, जहाँ ताने एक कठिन गदा-द्वन्द्व में बदल जाते हैं, तथा स्वयं ब्रह्मा भगवान् से प्रार्थना करने आते हैं कि सन्ध्या की भयावह घड़ी आने से पहले ही यह द्वन्द्व समाप्त कर दें। स्कन्ध 3 के अष्टादश अध्याय का एक निष्ठावान्, शालीन, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन — सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित।
पाठ जारी रखें →
वराह भगवान् तथा दैत्य हिरण्याक्ष अपने दीर्घ द्वन्द्व को निष्कर्ष तक ले जाते हैं: एक गदा जो छूट जाती है और जिसका दुरुपयोग नहीं किया जाता, माया का एक तूफान जो सुदर्शन चक्र से नष्ट होता है, तथा इतनी शान्त मृत्यु कि साक्षी सन्त उसे धन्य कहते हैं — भगवान् का अपना नित्य अनुचर अन्ततः घर लौट रहा है। स्कन्ध 3, अध्याय 19 का एक निष्ठापूर्ण, संयमित तथा सत्यापित पुनर्कथन।
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महर्षि मैत्रेय विदुर को बताते हैं कि भगवान् की अपनी नाभि के कमल से जन्मे ब्रह्मा ने अपने ही शरीर तथा क्षणिक मानसिक भावों से जीवों की प्रत्येक जाति का विकास किया — अज्ञान, यक्ष तथा राक्षस, देवता, दैत्य, सन्ध्या-काल, गन्धर्व तथा अप्सराएँ, भूत तथा पिशाच, पितर, सिद्ध, किम्पुरुष तथा किन्नर, सर्प तथा नाग — तथा अन्ततः मनुओं और ऋषियों में परिणत होकर, जिन्हें ब्रह्मा अपना ही एक जीवन्त अंश प्रदान करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित स्कन्ध 3, अध्याय 20 का एक निष्ठापूर्ण, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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सरस्वती के तट पर दस सहस्र वर्षों के मौन तप के पश्चात्, महर्षि कर्दम स्वयं भगवान् को गरुड़ के कन्धों पर खड़े देखते हैं। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर, भगवान् उन्हें सम्राट् स्वायम्भुव मनु की पुत्री देवहूति को वधू रूप में, नौ पुत्रियों तथा अन्तिम मुक्ति का, तथा भावी महर्षि कपिल के जन्म का भी वरदान देते हैं। अध्याय उसी दिन मनु के अपनी पुत्री सहित आश्रम पहुँचने पर समाप्त होता है। सत्यापित श्लोकों, संस्कृत उद्धरणों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित एक निष्ठावान्, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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सम्राट् स्वायम्भुव मनु औपचारिक रूप से अपनी पुत्री देवहूति का हाथ ऋषि कर्दम को अर्पित करते हैं, जिसका हृदय वह पहले ही उनके चरित्र से जीत चुकी है। कर्दम भगवान् हरि की अपनी प्रतिज्ञा में निहित एक शर्त पर स्वीकार करते हैं, विवाह राजसी तथा तपस्वी दोनों कुलों द्वारा आशीर्वादित होता है, तथा दम्पति की गृह-यात्रा भगवान् कपिल के आगामी जन्म का बीज साथ लिए है। सत्यापित श्लोकों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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देवहूति की वर्षों की मौन, समर्पित सेवा से द्रवित होकर, ऋषि कर्दम अपनी योगशक्ति से एक अद्भुत विमान की रचना करते हैं, उसे एक पावन सरोवर में भेजते हैं जहाँ वह नवजात के समान रूपान्तरित होती है, तथा उसे स्वर्ग के क्रीड़ा-उद्यानों में विचरण कराते हैं। उनके मिलन से नौ पुत्रियाँ जन्मती हैं — तथा फिर, कर्दम के वन-गमन की तैयारी के समय, देवहूति की ईमानदार, पीड़ित याचना अध्याय को समाप्त करती है। स्कन्ध 3, अध्याय 23 का एक निष्ठापूर्ण, भक्तिपूर्ण तथा सत्यापित पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →एक दीर्घकाल से प्रतीक्षित वचन अन्ततः पूर्ण होता है: भगवान् विष्णु ऋषि कर्दम तथा उनकी पत्नी देवहूति के माध्यम से प्रकट होते हैं, "ठीक जैसे काष्ठ से अग्नि प्रकट होती है", जबकि स्वर्ग स्वयं संगीत तथा गिरते पुष्पों से इस क्षण को चिह्नित करता है। ब्रह्मा अवतरण की पुष्टि करने आते हैं, कर्दम की नौ पुत्रियों का विवाह महान् ऋषियों से सम्पन्न कराते हैं, तथा देवहूति को प्रकट करते हैं कि उनका पुत्र स्वयं भगवान् हैं, जो कपिल नाम से विख्यात होंगे। अध्याय के भावनात्मक केन्द्र में, कर्दम अपने ही सन्तान को साक्षात् भगवान् के रूप में पहचानते हैं, आश्चर्य तथा समर्पण का स्तोत्र अर्पित करते हैं, तथा अनन्त ब्रह्म से मिलन में समाप्त होने वाले संन्यास-जीवन की ओर प्रस्थान करते हैं। स्कन्ध 3, अध्याय 24 का सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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कर्दम के वन-गमन के पश्चात्, भगवान् कपिल बिन्दुसरोवर पर अपनी माता देवहूति के साथ रुकते हैं। उनकी ईमानदार आध्यात्मिक थकान की स्वीकारोक्ति उनसे प्रसिद्ध कपिल-गीता का आरम्भ कराती है: हर्ष-शोक से परे चिन्तन-रूप योग, सन्तों की परिवर्तनकारी संगति, तथा निष्काम भक्ति की वह परिभाषा जिसे मुक्ति से भी श्रेष्ठ घोषित किया गया है। स्कन्ध 3, अध्याय 25 का सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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देवहूति अपने दिव्य पुत्र से एक प्रश्न पूछती हैं — प्रकृति और पुरुष क्या हैं? — और भगवान कपिल का उत्तर सृष्टि की सम्पूर्ण सांख्य संरचना को खोलता है: चौबीस श्रेणियाँ और पच्चीसवें के रूप में काल, महत्तत्त्व और त्रिविध अहंकार की उत्पत्ति, पाँच सूक्ष्म तत्त्वों का स्थूल तत्त्वों और इन्द्रियों में क्रमिक विकास, तथा ब्रह्माण्ड और विशाल विराट पुरुष की रचना — जिनका प्रत्येक अंग और देवता तब तक जगा नहीं सकते जब तक अन्तर्यामी स्वयं हृदय में प्रवेश नहीं करते। तृतीय स्कन्ध, अध्याय २६ की एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन, सत्यापित श्लोकों, संरचित विकास सारणियों और पूर्ण भिन्नता टिप्पणियों सहित।
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कपिल-गीता की गहराई में, भगवान् कपिल अपनी माता देवहूति को सिखाते हैं कि आत्मा, जल में प्रतिबिम्बित सूर्य के समान, शरीर के सुख-दुःख से सदा अस्पृष्ट रहती है। वे भगवत्-साक्षात्कार-प्राप्त भक्त का वर्णन करते हैं, अहंकार को प्रतिबिम्ब के प्रतिबिम्ब के रूप में समझाते हैं, और फिर देवहूति एक तीक्ष्ण दार्शनिक आपत्ति उठाती हैं: यदि पदार्थ और आत्मा नित्य-सहवर्ती हैं, तो आत्मा कभी वास्तव में कैसे मुक्त हो सकती है? कपिल का उत्तर — भक्ति द्वारा प्रकृति की पकड़ का उसी प्रकार समाप्त होना जैसे अग्नि अपने ही ईंधन को भस्म कर देती है — योग-सिद्धियों के प्रति आसक्ति की अन्तिम चेतावनी के साथ समाप्त होता है। स्कन्ध 3, अध्याय 27 का सत्यापित श्लोकों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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कपिल-गीता के इस सर्वाधिक व्यावहारिक अध्याय में, भगवान् कपिल अपनी माता देवहूति को ध्यान की एक क्रमबद्ध नियमावली देते हैं: नैतिक आधार-भूमि, आसन, अग्नि में परिष्कृत होते सोने के समान प्राणायाम, तथा भगवान् के स्वरूप का एक अत्यन्त विस्तृत ध्यान — चरण, नाभि, भुजाएँ तथा मुस्कुराता मुखमण्डल — जो मन के बुझते दीपक के समान विलय में परिणत होता है। स्कन्ध 3, अध्याय 28 का सत्यापित श्लोकों तथा पूर्ण विसंगति-टिप्पणियों सहित एक निष्ठावान्, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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देवहूति भगवान कपिल से भक्ति तथा सर्वशक्तिमान काल की प्रकृति समझाने का अनुरोध करती हैं। कपिल का उत्तर गुण-रंजित भक्ति की तीन श्रेणियों, भगवान की ओर निष्काम प्रवाहित होने वाली एकल निर्गुण भक्ति, समान दृष्टि के बिना पूजा के विरुद्ध कठोर चेतावनी, शुद्ध भक्त में परिणत होने वाले जीवन के क्रमबद्ध सोपान, तथा इस रहस्योद्घाटन को प्रकट करता है कि वायु, सूर्य, तथा स्वयं मृत्यु भी जिनके समक्ष नतमस्तक हैं, वह काल स्वयं भगवान ही हैं। तृतीय स्कन्ध, अध्याय २९ का सत्यापित श्लोकों, स्रोत-अंतराल के पारदर्शी प्रकटीकरण, तथा पूर्ण विसंगति टिप्पणियों सहित एक वफादार, भक्तिमय पुनर्कथन।
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कपिल-गीता की गहराई में, भगवान् कपिल अपनी माता देवहूति को चेतावनी देते हैं कि जो जीव शरीर, पत्नी, सन्तान, घर तथा धन को स्थायी मान बैठता है, वह काल द्वारा वृद्धावस्था, उपेक्षा, मृत्यु, यमराज के धाम की ओर एक भयावह मार्ग, तथा नरक की यातनाओं से होकर ले जाया जाता है — जब तक कि, शुद्ध होकर, वह पुनः मनुष्य के रूप में जन्म न ले। स्कन्ध 3, अध्याय 30 का सत्यापित श्लोकों तथा पूर्ण भिन्नता-टिप्पणियों सहित एक निष्ठापूर्ण, संयमित पुनर्कथन।
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कपिल-गीता में, भगवान् कपिल अपनी माता देवहूति को बताते हैं कि किस प्रकार जीव कर्म के बल से गर्भ में प्रवेश करता है, माह-दर-माह उसमें बढ़ता है, सैकड़ों पूर्वजन्मों की स्मृति से जाग उठता है, तथा जुड़े हुए हाथों से मुक्ति के लिए प्रार्थना करता है — एक ऐसी प्रार्थना जिसका कठिनाई से अर्जित ज्ञान जन्म के आघात में ही पुनः खो जाता है। स्कन्ध 3, अध्याय 31 का सत्यापित श्लोकों तथा पूर्ण विसंगति-टिप्पणियों सहित एक निष्ठावान्, सुरुचिपूर्ण पुनर्कथन।
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तृतीय स्कन्ध की कपिल-गीता के अन्तिम-से-पूर्व अध्याय में, भगवान् कपिल आत्मा के मृत्यु के पश्चात् के दो मार्गों का मानचित्र प्रस्तुत करते हैं — परम पुरुष तथा ब्रह्मलोक की ओर जाने वाला 'उज्ज्वल मार्ग', तथा पितरों के लोक होते हुए पृथ्वी पर लौटने वाला 'अन्धकार मार्ग' — तथा अन्त में घोषित करते हैं कि भगवान् वासुदेव के प्रति भक्ति ही अकेली शीघ्रता से, बिना पुनरागमन के जोखिम के, वैराग्य तथा ज्ञान उत्पन्न करती है। सत्यापित श्लोकों तथा पूर्ण विसंगति-टिप्पणियों सहित स्कन्ध 3, अध्याय 32 का एक निष्ठावान् पुनर्कथन।
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तृतीय स्कन्ध के तैंतीसवें तथा अन्तिम अध्याय में, देवहूति के अज्ञान का आवरण फट जाता है, तथा वे अपने ही पुत्र कपिल को साक्षात् भगवान् विष्णु के रूप में पहचानते हुए एक स्तोत्र का पाठ करती हैं। कपिल अपने अन्तिम आशीर्वाद के साथ विदा लेते हैं, तथा देवहूति उस भक्ति तथा योग के मार्ग पर चलती हैं जो उन्हें सिखाया गया था, जब तक कि वे सिद्धपद नामक पावन स्थान पर मुक्ति को प्राप्त नहीं हो जातीं — उनका नश्वर शरीर एक पावन नदी में रूपान्तरित हो जाता है। सत्यापित श्लोकों, पूर्ण विसंगति-टिप्पणियों, तथा स्कन्ध 3 के समापन सहित अध्याय 33 का एक निष्ठावान् पुनर्कथन।
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चतुर्थ स्कन्ध का आरम्भ स्वायम्भुव मनु की तीन कन्याओं से प्रवाहित वंश की महान् नदी से होता है — भगवान् यज्ञ का जन्म, ऋषि अत्रि के आश्रम में तीनों देवों का अवतरण, नर-नारायण का प्राकट्य, तथा सती की कथा की प्रथम छाया। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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देवताओं की एक महान् सभा में आहत अभिमान दक्ष को अपने जामाता भगवान् शिव के विरुद्ध कर देता है। निन्दा, दक्ष का शाप, नन्दीश्वर तथा भृगु के प्रति-शाप, तथा शिव का मौन प्रस्थान — अपमान को हृदय पर ले लेने की कीमत का एक गहन अध्ययन, सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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सती देवियों को अपने पिता दक्ष के यज्ञ की ओर उड़ते देखती हैं और जाने की विनती करती हैं; भगवान् शिव उन्हें चेताते हैं कि किसी सम्बन्धी की अवमानना सबसे गहरा घाव है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् शिव की चेतावनी के विरुद्ध सती दक्ष के यज्ञ में जाती हैं, अपने स्वामी के लिए कोई आहुति न रखी पाती हैं, समस्त सभा के समक्ष अपने पिता की भर्त्सना करती हैं, और योग की अग्नि में अपनी देह त्याग देती हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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सती की मृत्यु सुनकर भगवान् शिव का शोक अपार क्रोध में बदल जाता है; उनकी जटा की एक लट से विशालकाय वीरभद्र प्रकट होते हैं, जो रुद्र के गणों का नेतृत्व करते हुए दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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तूफान के पश्चात् पराजित देवगण ब्रह्मा की शरण में जाते हैं, जो उन्हें कैलास ले जाकर भगवान् शिव का प्रसादन करते हैं। वे उन्हें शान्त पाते हैं, और ब्रह्मा त्रुटिकर्ताओं तथा ध्वस्त यज्ञ के लिए प्रार्थना करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ब्रह्मा की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान् शिव दक्ष को पुनर्जीवित करते तथा देवताओं को स्वस्थ करते हैं; यज्ञ पुनः आरम्भ होता है, और परम भगवान् श्रीहरि स्वयं प्रकट होकर उसे पूर्ण करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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विमाता के वचनों से आहत बालक ध्रुव माता सुनीति तथा देवर्षि नारद के मार्गदर्शन में परम भगवान् को खोजने चलता है। वह द्वादशाक्षर मन्त्र पाकर अकेला वन को प्रस्थान करता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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परम भगवान् बालक ध्रुव के समक्ष प्रकट होकर उसके गाल को शंख से स्पर्श करते हैं और उसे सप्तर्षियों से ऊपर अविनाशी धाम का वर देते हैं। ध्रुव पश्चात्तापी पिता के पास घर लौटकर राजा बनता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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ध्रुव का भाई उत्तम हिमालय में एक यक्ष द्वारा मारा जाता है। शोक तथा क्रोध से अभिभूत ध्रुव अलकापुरी पर चढ़ाई करता है और युद्ध आरम्भ होता है; जब यक्ष माया की ओर मुड़ते हैं, ऋषि उसे भगवान् के नाम से आशीर्वाद देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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जैसे ध्रुव का अस्त्र निर्दोषों को भी मारता है, उसके पितामह स्वायम्भुव मनु ऋषियों के साथ आकर सिखाते हैं कि प्रतिशोध भगवान् के भक्तों का मार्ग नहीं। द्रवित होकर ध्रुव क्रोध त्यागकर सेना लौटा लेता है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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कुबेर ध्रुव को वरदान अर्पित करते हैं, और विनम्र राजा केवल भगवान् की अविचल स्मृति माँगता है। दीर्घ शासन के पश्चात् ध्रुव दिव्य विमान में आरूढ़ होता है, मृत्यु पर पैर रखता है, माता को स्मरण करता है, और विष्णु के अविनाशी धाम को पहुँचता है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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मैत्रेय ध्रुव के वंश को साधु राजा अंग तक ले जाते हैं, जिन्हें एक दुष्ट पुत्र, वेन, मिलता है। शोक से थककर अंग एक कठोर स्वतन्त्रता पाकर रात्रि में विरक्ति में निकल जाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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नेतृहीन प्रजा की रक्षा हेतु अभिषिक्त, अभिमानी वेन समस्त यज्ञ निषिद्ध कर भगवान् के स्थान पर स्वयं की पूजा माँगता है। ऋषि व्यर्थ समझाते हैं, संसार-कल्याण हेतु उसका शासन समाप्त करते हैं, और शरीर का मन्थन कर विनाश से भी भला खींचते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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वेन की भुजाओं के मन्थन से एक तेजोमय युगल अवतरित होता है — राजा पृथु, विष्णु के अंशावतार, तथा रानी अर्चि, लक्ष्मी का अंश। पृथु सम्राट् अभिषिक्त होते हैं और देवगण उन्हें संसार की रक्षा हेतु सज्जित करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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ऋषियों की प्रेरणा से, दिव्य वन्दीजन राजा पृथु की स्तुति करते हैं — धर्म के अग्रगण्य धारक, पृथ्वी के समान सहनशील रक्षक, तथा अपनी शक्ति के अंश से अवतरित स्वयं भगवान् के रूप में। इस सबके बीच सम्राट् विनम्रता से सुनते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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भूमि अकाल से जकड़ी है, क्योंकि पृथ्वी ने अपनी सम्पदा रोक ली है। अपनी भूखी प्रजा के लिए राजा पृथु धनुष उठाते हैं; पृथ्वी गोरूप में भागती है, फिर मुड़कर समर्पण कर उनसे प्रार्थना करती है। उग्र करुणा तथा पृथ्वी के विवेक का अध्याय। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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पृथ्वी राजा पृथु को परामर्श देती है कि उसकी सम्पदा बल से नहीं बल्कि उचित व्यवस्था से खींची जाए। मनु को बछड़ा तथा अंजलि को पात्र बनाकर वे समस्त प्राणियों के लिए अन्न दुहते हैं, और अकाल जानने वाले संसार में समृद्धि लौटती है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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भक्ति में, राजा पृथु सौ अश्वमेध यज्ञ करते हैं। ईर्ष्यालु इन्द्र वेश बदलकर यज्ञ का अश्व चुराते हैं; पृथु के पुत्र उसे पुनः प्राप्त करते हैं, और ऋषि राजा को उनकी भगवान् के अंश की पहचान स्मरण कराकर इन्द्र से मेल कराते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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परम भगवान् पृथु के यज्ञ-मण्डप में पश्चात्तापी इन्द्र के साथ प्रकट होते हैं, सर्वोच्च ज्ञान सिखाते हैं, और कोई भी वरदान अर्पित करते हैं। पृथु मुक्ति को भी अस्वीकार कर केवल दस हज़ार कान माँगते हैं जिनसे भगवान् की महिमा सदा सुन सकें। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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महिमा में अपनी उत्सवमय राजधानी लौटकर, राजा पृथु अपनी प्रजा को सिखाते हैं कि एक शासक की शक्ति सेवा की पवित्र धरोहर है, और कि मन, वाणी, शरीर, तथा ईमानदार कर्म से भगवान् की उपासना प्रत्येक आत्मा का सर्वोच्च कल्याण है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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चार सनातन-युवा कुमार राजा पृथु की सभा में आते हैं। महान् राजा उठकर उनकी पूजा करते हैं और विनम्रता से सिखाए जाने की याचना करते हैं। वे सर्वोच्च ज्ञान देते हैं: कि आत्मा का सम्पूर्ण कल्याण परम के प्रति अनासक्त प्रेम में निहित है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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दीर्घ तथा धर्ममय शासन के पश्चात्, राजा पृथु रानी अर्चि सहित वन में निवृत्त होते हैं, भगवान् को प्रसन्न करने सर्वोच्च तपस्या करते हैं, और उनके परम धाम को प्रस्थान करते हैं। उनकी निष्ठावान् रानी भक्ति में उनका अनुसरण करती है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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दस प्रचेता तपस्या करने निकलते हैं और भगवान् शिव से मिलते हैं, जो, उनकी सच्चाई से प्रसन्न होकर, उन्हें रुद्र-गीत सिखाते हैं — परम भगवान् का एक सुन्दर स्तोत्र, वह निर्भय आश्रय जिसमें संहारक भी शरण लेता है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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राजा प्राचीनबर्हि को जगाने के लिए, देवर्षि नारद पुरञ्जन की कथा आरम्भ करते हैं — वह आत्मा जो नौ द्वारों वाली नगरी (शरीर) में भटकती है, एक सुन्दर रानी (इन्द्रियों) से मिलती है, और मोहित होकर अपने अज्ञात मित्र, भीतर के भगवान् को भूल जाती है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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नारद की कथा में, पुरञ्जन आखेट के उन्माद से ग्रस्त होकर निकल पड़ता है, रानी की उपेक्षा करता है। लौटकर उसे क्रुद्ध पाता है, और कोमल वचनों से मनाता है — आत्मा का एक दर्पण जो लालसा, उपेक्षा, तथा मनाने के बेचैन चक्र में फँसी है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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नारद की कथा में, पुरञ्जन गृहस्थ में उलझता है जबकि वर्ष सरक जाते हैं। कालकन्या (वृद्धावस्था) भय तथा ज्वर से मैत्री कर लेती है, और चण्डवेग (बीतते वर्ष) नौ द्वारों वाली नगरी को घेर लेता है — प्रत्येक शरीर पर काल के घेरे का चित्र। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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पुरञ्जन भगवान् के बजाय अपने परिवार में लीन मरता है और स्त्री रूप में जन्म लेता है। पति की चिता के पास शोक करती हुई वह अपने भूले मित्र — भीतर भगवान् — से मिलती है, जो अन्योक्ति का अनावरण कर आत्मा को उसकी खोई स्मृति के लिए जगाता है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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राजा प्राचीनबर्हि स्वीकार करते हैं कि वे कथा नहीं समझ सके, अतः नारद उसका अनावरण करते हैं: पुरञ्जन आत्मा है, नगरी शरीर, मित्र भीतर भगवान्। मन आत्मा को जीवन से जीवन ले जाता है; एकमात्र औषधि श्रीहरि की समस्त अस्तित्व से उपासना है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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दस हज़ार वर्ष की तपस्या के बाद परम भगवान् प्रचेताओं के समक्ष प्रकट होकर वरदान देते हैं। वे घोषित करते हैं कि भक्तों का एक क्षण का संग स्वर्ग या मुक्ति से बढ़कर है, और लौटकर वृक्षों की पालित-पुत्री मारिषा से विवाह करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान् भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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चतुर्थ स्कन्ध के अन्तिम अध्याय में नारद प्रचेताओं को सिखाते हैं कि जीवन केवल भगवान की सेवा में सार्थक है — और उनकी आराधना से, जैसे वृक्ष की जड़ सींचने से, सब कुछ पुष्ट होता है। प्रबुद्ध होकर वे भगवान को पाने सब त्याग देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठावान्, भक्तिमय पुनर्कथन।
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आजीवन त्याग के कगार से पृथ्वी पर शासन के लिए बुलाए गए भक्त-राजा प्रियव्रत ने संसार को अनासक्त भाव से चलाया, अपने तेजोमय रथ से सात सागर गढ़े, द्वीप अपने पुत्रों में बाँटे, और अन्त में साम्राज्य त्यागकर भक्ति के मार्ग पर लौट गए। पंचम स्कन्ध के प्रथम अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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जम्बूद्वीप का एक कर्तव्यनिष्ठ राजा योग्य उत्तराधिकारी के लिए प्रार्थना करता है और उसका उत्तर एक अप्रत्याशित रीति से मिलता है: ब्रह्मा अप्सरा पूर्वचित्ति को भेजते हैं। एक ही दृष्टि से बन्दी बना आग्नीध्र कामना में बह जाता है, जम्बूद्वीप के शासक बनने वाले नौ पुत्रों को जन्म देता है, फिर भी कभी तृप्त नहीं होता। पंचम स्कन्ध के द्वितीय अध्याय का एक कोमल, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →
निःसन्तान राजा नाभि और रानी मेरुदेवी योग्य पुत्र के लिए भगवान् विष्णु की आराधना करते हैं। स्नेह से द्रवित भगवान् यज्ञ में प्रकट होते हैं, ऋत्विजों के विनम्र स्तवन को स्वीकार करते हैं, और अपने समान किसी को न पाकर स्वयं अवतरित होने का वचन देते हैं — मेरुदेवी के गर्भ में भगवान् ऋषभदेव के रूप में। पंचम स्कन्ध के तृतीय अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →
भगवत्ता के लक्षणों के साथ जन्मे भगवान् ऋषभदेव एक मुस्कान से इन्द्र के दर्प को शमित करते हैं, 'सर्वश्रेष्ठ' नाम पाते हैं, भरत के नेतृत्व में सौ पुत्रों को जन्म देते हैं, और परम भगवान् होते हुए भी एक मर्त्य के समान शासन कर संसार को अपने ही उदाहरण से धर्म सिखाते हैं। पंचम स्कन्ध के चतुर्थ अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →
भागवत के सर्वाधिक अमूल्य उपदेशों में से एक में, भगवान् ऋषभदेव अपने सौ पुत्रों को सिखाते हैं कि मानव-देह भोग के लिए नहीं, अपितु तप और भक्ति के लिए है; वे बताते हैं कि आत्मा किस प्रकार बँधती और मुक्त होती है, निष्काम भक्त का सम्मान करते हैं, प्रत्येक प्राणी को अपना निवास-स्थान मानकर आदर करने का आदेश देते हैं, और फिर सिंहासन त्यागकर अवधूत-रूप में विचरण करते हैं। पंचम स्कन्ध के पाँचवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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राजा परीक्षित को उत्तर देते हुए, श्रीशुकदेव बताते हैं कि भगवान् ऋषभदेव ने बिना माँगे प्राप्त हुई योग-सिद्धियों को क्यों ठुकराया, चेतावनी देते हैं कि चंचल मन पर कभी अन्धा विश्वास नहीं करना चाहिए, और बताते हैं कि किस प्रकार भगवान् ने दक्षिण के वनों में विचरण करते हुए अपनी देह त्यागी। वे भारतवर्ष और प्रियव्रत-वंश की महिमा गाते हैं और उनकी पावन कथा के श्रवण का आशीर्वाद प्रकट करते हैं। पंचम स्कन्ध के छठे अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →
श्रीशुकदेव बताते हैं कि किस प्रकार भगवान् ऋषभदेव के पुत्र सम्राट् भरत ने सिंहासन पर बैठे एक सन्त के समान समस्त पृथ्वी पर शासन किया, प्रत्येक यज्ञ का फल भगवान् वासुदेव को अर्पित करते हुए। कर्तव्य पूर्ण होने पर उन्होंने राज्य त्यागा, गण्डकी तट पर पुलह के आश्रम में प्रस्थान किया, और परम पुरुष की इतनी प्रबल भक्ति से आराधना की कि वे रो पड़े और आराधना को ही भूल गए। पंचम स्कन्ध के सातवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →
श्रीशुकदेव भागवत की सबसे कोमल कथाओं में से एक सुनाते हैं: किस प्रकार महान् भक्त भरत, जिन्होंने राज्य और पुत्रों का त्याग कर दिया था, करुणावश एक मातृहीन मृगछौने को बचाया और उससे इतना मोह कर बैठे कि उनकी साधना छूट गई। मृत्यु के समय मृग का ही चिन्तन करते हुए, वे एक मृग के रूप में जन्मे — फिर भी अपने पूर्वजन्म की स्मृति धारण किए, पश्चात्ताप किया, और पुनः भगवान् की ओर मुड़े। पंचम स्कन्ध के आठवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →
श्रीशुकदेव भरत के तीसरे और अन्तिम जन्म की कथा कहते हैं — एक पावन ब्राह्मण कुल में। अपने समस्त पूर्वजन्मों को स्मरण करते और आसक्ति से डरते हुए, उन्होंने अपने सिद्ध ज्ञान को एक मूढ़, बहरे उन्मत्त के मुखौटे के पीछे छिपा लिया, उपहास और कष्ट को अखण्ड समता से सहते हुए। जब डाकुओं के एक दल ने उन्हें बलि देने के लिए पकड़ा, तब भगवान् की अपनी रक्षक शक्ति देवी के रूप में उठकर उन्हें बचाने प्रकट हुई। पंचम स्कन्ध के नौवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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राजा रहूगण की पालकी-वाहक के रूप में विवश किए गए, मौन ऋषि जड़ भरत धीरे-धीरे चलते हैं, किसी छोटे-से प्राणी को हानि पहुँचाने को अनिच्छुक, और राजा के उपहास को पूर्ण शान्ति से सहते हैं। फिर, दुर्लभ गहराई के एक उपदेश में, वे प्रकट करते हैं कि समस्त भार नश्वर देह के हैं जबकि भीतर की आत्मा अमर और मुक्त है — जिससे अभिमानी राजा उनके चरणों में झुक जाता है। पंचम स्कन्ध के दसवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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पालकी अब भी उठाए, ऋषि जड़ भरत विनम्र हुए राजा रहूगण के समक्ष मन का महान् रहस्य खोलते हैं — किस प्रकार, प्रकृति के तीन गुणों से प्रेरित होकर, वह बन्धन और मुक्ति दोनों की जड़ बनता है; किस प्रकार भगवान् वासुदेव प्रत्येक हृदय में मौन साक्षी रूप में निवास करते हैं; और किस प्रकार मन की माया भगवान् और गुरु की आराधना से मारी जाती है। पंचम स्कन्ध के ग्यारहवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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अन्ततः विनम्र होकर, राजा रहूगण उस ऋषि के समक्ष झुकते हैं जिसके साथ उन्होंने अन्याय किया था, और सिखाए जाने की प्रार्थना करते हैं। उत्तर में जड़ भरत दिखाते हैं कि राजा और कहार दोनों समान रूप से पृथ्वी के विकार हैं, कि समस्त सांसारिक भेद माया की रचना पर मात्र नाम हैं, और कि शुद्ध चैतन्य — जिसे विवेकी जन वासुदेव कहते हैं — ही एकमात्र सत्य है, जो केवल महान् भक्तों के चरणों की धूल से प्राप्त होता है। फिर वे प्रकट करते हैं कि वे कभी राजा भरत थे। पंचम स्कन्ध के बारहवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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समस्त शास्त्र के सबसे मर्मस्पर्शी दृष्टान्तों में से एक में, ऋषि जड़ भरत सांसारिक अस्तित्व को एक विशाल वन के रूप में चित्रित करते हैं जिसमें जीव एक खोए वणिक के समान भटकता है — इन्द्रियों से लूटा जाता, मृगतृष्णा और मायावी नगरों से छला जाता, मिठास की ओर हाथ बढ़ाने पर डसा जाता। फिर ऋषि दृष्टान्त को आशा में उठाते हैं: भक्ति से तीक्ष्ण की गई ज्ञान की तलवार उठाओ और पार तट तक पहुँच जाओ। उनके शब्द राजा रहूगण के प्रत्येक सन्देह को जड़ से उखाड़ देते हैं। पंचम स्कन्ध के तेरहवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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श्रीशुक राजा परीक्षित के लिए जड़ भरत के महान् रूपक को खोलते हैं: सांसारिक जीवन एक भयावह वन, जहाँ जीव वणिक् के समान भटकता है, छह इन्द्रियाँ लुटेरों के समान घात लगाती हैं, परिवार भेड़िये और सियार बनते हैं, धन मृगतृष्णा है, और काल का चक्र भगवान् विष्णु के सुदर्शन के रूप में घूमता है। यह महिमा में समाप्त होता है — राजर्षि भरत के साथ, जो शुद्ध भक्ति से उस वन के पार चले गए। पंचम स्कन्ध के चौदहवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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पंचम स्कन्ध का पंद्रहवाँ अध्याय उस पावन राजवंश का अनुसरण करता है जो सम्राट भरत से प्रवाहित हुआ — उनके पुत्र सुमति से लेकर विरज तक — और राजा गय पर ठहरता है, जो भगवान् विष्णु के एक साक्षात् अंश थे। समूची पृथ्वी पर अभिमान के लेश बिना शासन करते और अपना प्रत्येक कर्म प्रेममयी सेवा में अर्पित करते हुए, गय की भक्ति इतनी शुद्ध थी कि परम भगवान् स्वयं उनके यज्ञ का फल स्वीकार करने साक्षात् पधारे। पंचम स्कन्ध के पंद्रहवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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राजा परीक्षित के उत्तर में, ऋषि शुकदेव भूमण्डल को भगवान् के प्रत्यक्ष रूप के रूप में प्रकट करते हैं: कमल-सदृश जम्बूद्वीप, केन्द्र में कर्णिका-रूप स्वर्णिम मेरु, उसके नौ वर्षों को विभाजित करती श्रेणियाँ, अमृत की नदियों वाले चार महान् वृक्ष जिनके तट स्वर्ण बन जाते हैं, और शिखर पर ब्रह्मा की स्वर्णिम नगरी। पंचम स्कन्ध के सोलहवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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पवित्र गंगा भगवान् के चरण-कमल से फूटती है जब वे ब्रह्माण्ड को लाँघते हैं, ध्रुव के मस्तक और ऋषियों की जटाओं पर प्रेम से धारण की जाती है, मेरु पर्वत पर सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा में विभक्त होती है, और संसार के देशों को आशीर्वाद देती है; और इलावृत में, भगवान् शिव भगवान् संकर्षण के समक्ष समर्पण की स्तुति उँडेलते हैं। पंचम स्कन्ध के सत्रहवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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पृथ्वी के एक-एक प्रदेश में भगवान् एक प्रिय दिव्य रूप में निवास करते हैं, जिनकी उस प्रदेश का प्रमुख भक्त आराधना करता है। पंचम स्कन्ध का यह अठारहवाँ अध्याय छह देदीप्यमान स्तुतियाँ एकत्र करता है — भद्रश्रवा की हयग्रीव को, प्रह्लाद की नृसिंह को, लक्ष्मी की प्रद्युम्न को, मनु की मत्स्य को, अर्यमा की कूर्म को, और धरती माता की वराह को। एक निष्ठावान्, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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किम्पुरुष-वर्ष में श्रीहनुमान भगवान् राम की आराधना शुद्ध प्रेम के स्तवन से करते हैं; भारत-वर्ष में भगवान् नर-नारायण के रूप में अनन्त तपस्या करते हैं और मुनि नारद उनकी आराधना करते हैं। श्रीशुक भारत के पावन पर्वत और नदियाँ उघाड़ते हैं और वह आश्चर्य प्रकट करते हैं कि देवता तक इस भूमि में मानव-जन्म चाहते हैं, जहाँ भगवान् को अर्पित एक क्षण उनका अभय धाम जीत लेता है। पंचम स्कन्ध के उन्नीसवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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श्रीशुक हमें जम्बूद्वीप से परे छह महान् द्वीपों के पार ले जाते हैं — प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर — प्रत्येक अपने ही सागर से घिरा और एक शक्तिशाली वृक्ष से मण्डित, और प्रत्येक में लोग एक ही भगवान् की सूर्य, चन्द्र, अग्नि, जल, प्राण और ब्रह्मा के रूप में उपासना करते हैं। इन सबसे परे लोकालोक उठता है, जहाँ चार गजराज भूमण्डल को धारण करते हैं और भगवान् विष्वक्सेन सहित निवास करते हैं। पंचम स्कन्ध के बीसवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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श्रीशुक हमारी दृष्टि को आकाश की ओर उठाते हैं, और प्रकट करते हैं आकाश के मध्य में स्थित देदीप्यमान सूर्य, मानसोत्तर पर लोकपालों की चार पुरियाँ, और सूर्यदेव का अद्भुत रथ — जिसका एकमात्र चक्र संवत्सर है, जिसे सात वैदिक अश्व खींचते हैं, जिसे अरुण हाँकते हैं और जिसकी साठ सहस्र अंगूठे-भर वालखिल्य ऋषि स्तुति करते हैं। पंचम स्कन्ध के इक्कीसवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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सूर्य की प्रतीति और वास्तविक गति के विषय में राजा परीक्षित के विस्मयपूर्ण प्रश्न का उत्तर देते हुए, श्रीशुक आकाश की सम्पूर्ण व्यवस्था उद्घाटित करते हैं: भगवान् नारायण अपने शरीर को मासों और ऋतुओं में विभाजित करते हुए, चन्द्रमा प्रत्येक प्राणी पर अपना अमृत उँडेलता हुआ, काल-चक्र से बँधे नक्षत्र और ग्रह अपनी नियत परिक्रमा रखते हुए, और सात ऋषि भगवान् विष्णु के परम धाम की परिक्रमा करते हुए। पंचम स्कन्ध के बाईसवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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सप्तर्षियों से कहीं ऊपर, अटल ध्रुव आकाश के अटल ध्रुव-स्तम्भ के रूप में देदीप्यमान हैं, जिनके चारों ओर ग्रह और तारे खलिहान के खम्भे के गिर्द बैलों के समान घूमते हैं। विवेकी जन समूचे तारागण को शिशुमार — भगवान् वासुदेव के डॉल्फ़िन-सदृश रूप — के रूप में देखते हैं, जिसके अंगों पर देवता और ग्रह विराजमान हैं, और प्रत्येक सन्ध्या को उसे एक पावन प्रार्थना से प्रणाम करते हैं। पंचम स्कन्ध के तेईसवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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श्रीशुकदेव राजा परीक्षित को नीचे की ओर ले चलते हैं — छाया-ग्रह राहु तक, जिसे भगवान् का सुदर्शन चक्र दूर रोके रहता है, और सात देदीप्यमान पाताल-लोकों में। इनके हृदय में है सुतल, जहाँ साक्षात् परमेश्वर श्रीनारायण, हाथ में गदा लिए, महान् भक्त राजा बलि के द्वार पर पहरा देते हैं। पंचम स्कन्ध के चौबीसवें अध्याय का श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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पाताल से बहुत नीचे, भगवान् अनन्त (संकर्षण) समूची पृथ्वी को अपने सहस्र फणों में से केवल एक पर सरसों के दाने के समान धारण करते हैं। नील-श्याम और कोमल-नेत्र, नाग-राजों द्वारा पूजित, वे प्रलय के रुद्र को रोके रहते हैं और उन सबके हृदय में प्रवेश करते हैं जो उनके विषय में सुनते हैं। ब्रह्मा की सभा में नारद गाते हैं कि उनका नाम पतितों का भी उद्धार करता है। पंचम स्कन्ध के पचीसवें अध्याय का एक श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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पंचम स्कन्ध के अन्तिम अध्याय में, श्रीशुक राजा परीक्षित को बताते हैं कि आत्माओं के गन्तव्य क्यों भिन्न होते हैं, उस दक्षिण-प्रदेश का वर्णन करते हैं जहाँ महाभाग यम दिवंगतों का ठीक और करुणामय न्याय करते हैं, अट्ठाईस लेखा-प्रदेशों और उन तक ले जाने वाले कर्मों का नाम लेते हैं, और प्रकट करते हैं कि समूचा ब्रह्माण्ड भगवान् नारायण का स्थूल रूप है — जिससे उनके भक्त पूर्णतया मुक्त हैं। एक श्रद्धापूर्ण, श्लोक-सत्यापित पुनर्कथन।
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षष्ठ स्कन्ध का आरम्भ राजा परीक्षित के नरक से बचने के प्रश्न और श्रीशुकदेव के उत्तर से होता है: शुद्ध भक्ति तथा भगवन्नाम समस्त कर्मकाण्ड से अधिक शुद्ध करते हैं। अजामिल की कथा का श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन, जिसका 'नारायण' का मरण-पुकार विष्णु के दूतों को उसके पास ले आया — सत्यापित श्लोकों सहित।
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भगवान् विष्णु के दूत भगवन्नाम की अतुलनीय शोधक शक्ति का विवेचन करते हैं, अजामिल को यम के पाश से मुक्त करते हैं, और पश्चात्ताप तथा हरिद्वार में तप के पश्चात् वह भगवान् के परम धाम चढ़ जाता है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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जब उनके दूत पराजित होकर लौटते हैं, यमराज प्रसन्न होते हैं, भगवान् के चरणों का ध्यान करते हैं, और गूढ़तम शिक्षा प्रकट करते हैं: बारह धर्मज्ञ महाजन, भगवन्नाम से भक्ति की सर्वोच्चता, और भगवद्भक्तों की अलंघ्यता। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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चन्द्रदेव उग्र प्रचेताओं को शान्त करते हैं, दक्ष प्राचेतस का जन्म होता है, और गुप्त हंस-गुह्य स्तोत्र से वे अदृश्य परमेश्वर की आराधना करते हैं — जो गरुड़ पर प्रकट होकर उन्हें सन्तति का वरदान देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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नारद की पहेलियाँ दक्ष के दस हजार और फिर एक हजार पुत्रों को मुक्ति की ओर मोड़ देती हैं; शोकाकुल पिता देवर्षि को शाप देते हैं, जो उसे एक शान्त शब्द से स्वीकार कर लेते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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दक्ष की साठ कन्याएँ देवों और असुरों, पक्षियों और पशुओं, वनस्पतियों और नागों की माताएँ बनती हैं — और अदिति के वंश में स्वयं नारायण अवतरित होते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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सम्मान की एक ही चूक स्वर्ग के राजा को गिरा देती है; असुरों से पराजित देवों को ब्रह्मा विश्वरूप की शरण लेने का परामर्श देते हैं, जिनका विष्णु-स्तोत्र उनका वैभव लौटा देता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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नारायण-कवच, भगवान् के नामों और रूपों का कवच, विष्णु के प्रत्येक अवतार को जल, थल और आकाश में, प्रत्येक प्रहर और संकट में भक्त की रक्षा हेतु पुकारता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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विशालकाय राक्षस वृत्र एक शोकाकुल पिता के यज्ञ से उठकर देवताओं के अस्त्रों को निगल जाता है, जो अन्ततः भगवान् नारायण की शरण लेते हैं; भगवान् ऋषि दधीचि के त्याग से विजय का मार्ग प्रकट करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ऋषि दधीचि अपना शरीर अर्पित करते हैं, उनकी अस्थियों से वज्र गढ़ा जाता है, और इन्द्र नर्मदा तट पर वृत्र से युद्ध करने जाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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इन्द्र के वज्र के सम्मुख, राक्षस वृत्र भागवत की सबसे पवित्र समर्पण-प्रार्थनाओं में से एक उँडेलता है, केवल भगवान् की अनन्त सेवा के अतिरिक्त कुछ नहीं माँगता। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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मरते हुए भी वृत्र इन्द्र को सिखाता है कि केवल भगवान् ही, काल रूप में, विजय और पराजय देते हैं; और जब वज्र गिरता है, उसकी आत्मा भगवान् में लीन हो जाती है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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विजय इन्द्र को शान्ति नहीं देती; ब्रह्महत्या के पाप से व्याकुल, वे भगवान् की शरण लेते हैं और अश्वमेध तथा पावन नाम से शुद्ध होते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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समूची पृथ्वी पर शासन करने वाला सम्राट् एक रिक्त पालने से टूट जाता है; उसका चिर-प्रतीक्षित पुत्र मिलता है और मृत्यु द्वारा छिन जाता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ऋषि अंगिरा और नारद चित्रकेतु के शोक को ज्ञान में बदलते हैं, यह सिखाते हुए कि प्राणी काल द्वारा जोड़े और अलग किए जाते हैं, प्रत्येक सम्पत्ति शोक है, और आत्मा अमर है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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दिवंगत राजकुमार सिखाता है कि पारिवारिक बन्धन क्षणिक भूमिकाएँ हैं; चित्रकेतु भगवान् संकर्षण का दर्शन करते हैं, पाप विलीन होते हैं, और भगवान् स्वयं को सबकी आत्मा प्रकट करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् शिव और पार्वती के समक्ष एक असावधान टिप्पणी चित्रकेतु को शाप दिलाती है, जिसे वे बिना क्रोध या भय के स्वीकारते हैं; भगवान् शिव भक्त की स्तुति करते हैं और प्रकट करते हैं कि चित्रकेतु वृत्र बने। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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एक शोकाकुल माता का इन्द्र के विरुद्ध प्रतिशोध-संकल्प भगवान् विष्णु की कृपा से उलट जाता है; उसके उनचास पुत्र देदीप्यमान मरुत् बनकर इन्द्र के ही भ्राता हो जाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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षष्ठ स्कन्ध पुंसवन व्रत से समाप्त होता है, भगवान् विष्णु तथा देवी लक्ष्मी की गृह-भक्ति की एक कोमल मार्गदर्शिका, जिसमें आत्म-तृप्त भगवान् अभाव से नहीं अपितु प्रेम से पूजे जाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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सप्तम स्कन्ध का आरम्भ परीक्षित की निष्कपट शंका से होता है: यदि भगवान् सबके समान हैं, तो वे देवताओं के लिए असुरों का वध क्यों करते हैं? श्रीशुकदेव का उत्तर, नारद का रहस्य, तथा वैकुण्ठ के द्वारपाल जय-विजय की कथा — सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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हिरण्याक्ष के वध के पश्चात् असुर-राज हिरण्यकशिपु प्रतिशोध की शपथ लेकर पृथ्वी उजाड़ता है — फिर भी अविनाशी आत्मा की उदात्त शिक्षा तथा राजा सुयज्ञ और बालक-यम की प्राचीन कथा से अपनी माता दिति को सान्त्वना देता है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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मृत्यु को जीतने के लिए संकल्पबद्ध हिरण्यकशिपु ऐसी उग्र तपस्या करता है कि लोक झुलस उठते हैं और देवता ब्रह्मा की शरण में भागते हैं — फिर सृष्टिकर्ता से एक चतुराई से गढ़ा गया निकट-अमरता का वरदान माँगता है जो मृत्यु के हर द्वार को बन्द करता-सा प्रतीत होता है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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ब्रह्मा के वरदान से सुरक्षित हिरण्यकशिपु तीनों लोक जीतकर इन्द्र का सिंहासन हड़प लेता है, फिर भी सन्तोष नहीं पाता — जबकि पीड़ित लोक भगवान् विष्णु को पुकारते हैं जो उद्धार का वचन देते हैं, और असुर के अपने घर में सन्त प्रह्लाद जन्म लेता है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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असुरों के गुरुओं के पास भेजा गया सन्त-शिशु प्रह्लाद घोषित करता है कि परम कल्याण श्रीहरि की शरण लेने में है और भक्ति के प्रसिद्ध नौ रूप सिखाता है — जबकि उसका क्रुद्ध पिता हिरण्यकशिपु भाले, विष, अग्नि तथा जल से उसके प्राण लेने का प्रयास करके विफल होता है। सत्यापित श्लोकों सहित निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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असुरों की अपनी ही पाठशाला में बालक प्रह्लाद अपने साथियों को बचपन में ही भक्ति आरम्भ करने, भोग तथा धन की खोज का खोखलापन देखने, और समस्त प्राणियों पर दया रखते हुए भगवान् नारायण की शरण लेने का उपदेश देता है। प्रसिद्ध 'कौमार आचरेत्प्राज्ञो' श्लोक सहित सत्यापित श्लोकों वाला निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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प्रह्लाद उत्तर देता है कि उसने शिशु रहते ज्ञान कैसे पाया: ऋषि नारद ने उसकी गर्भवती माता को बचाया, आश्रय दिया, और आत्म-विज्ञान सिखाया — और गर्भस्थ शिशु ने हर वचन सुना। नित्य आत्मा तथा सबके लिए खुली शुद्ध भक्ति पर सत्यापित श्लोकों वाला निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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प्रह्लाद की कथा का चरम: जब हिरण्यकशिपु भगवान् की उपस्थिति का उपहास कर खम्भे को मारता है, भगवान् अपने अद्भुत नर-सिंह रूप में प्रकट होते हैं, अटूट वरदान की हर शर्त पूरी करते हैं, अपने भक्त की रक्षा करते हैं, और देवगण कृतज्ञता की प्रार्थनाएँ अर्पित करते हैं। सत्यापित श्लोकों वाला निष्ठावान, श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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जब देवता क्रुद्ध भगवान् के निकट जाने का साहस न करें, बालक प्रह्लाद उनके चरणों में प्रणाम करता है और उनके अपने हाथ से उठाया जाता है। उसकी प्रार्थना — कि केवल भक्ति भगवान् को जीतती है, कि वह स्वयं के लिए कुछ नहीं डरता, और कि वह दूसरों को भटकते छोड़कर मुक्त नहीं हो सकता — भागवत की महान प्रार्थनाओं में से एक है। सत्यापित श्लोकों वाला निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् द्वारा कोई भी वरदान माँगने को कहे जाने पर बालक प्रह्लाद हर सांसारिक उपहार अस्वीकार कर देता है, केवल यह माँगते हुए कि कामना उसके हृदय में फिर कभी जड़ न पकड़े — फिर वह अपने पिता की क्षमा के लिए प्रार्थना करता है। भगवान् उसे समस्त भक्तों का आदर्श घोषित करते हैं और धर्मशील राजा के रूप में उसका राज्याभिषेक करते हैं। सत्यापित श्लोकों वाला निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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प्रह्लाद के उदाहरण से प्रेरित होकर युधिष्ठिर पूछते हैं कि मनुष्य को कैसे जीना चाहिए। नारद सनातन-धर्म के सर्वाधिक स्पष्ट मानचित्रों में से एक से उत्तर देते हैं — वे तीस गुण जो हर आत्मा के हैं, चार वर्णों के कर्तव्य तथा लक्षण, और यह सत्य कि चरित्र जन्म से अधिक भारी है। सत्यापित श्लोकों वाला निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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नारद ब्रह्मचारी के अनुशासित जीवन का, कामना के सतर्क संयम का, तथा वानप्रस्थ के तपस्वी मार्ग का वर्णन करते हैं — यह सिखाते हुए कि जीवन की जो भी अवस्था हो, लक्ष्य एक है: भगवान् को अग्नि, गुरु, स्व, तथा समस्त प्राणियों के भीतर विद्यमान देखना। सत्यापित श्लोकों वाला निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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नारद नारायण के प्रति समर्पित विचरण करते संन्यासी का वर्णन करते हैं, फिर बताते हैं कि भक्त-राजा प्रह्लाद एक धूल-ढके सन्त से मिले जो कुछ भी नहीं रखते थे फिर भी परम शान्ति के स्वामी थे। लोभ की व्यर्थता तथा स्व के आनन्द पर उनकी शिक्षा — मधुमक्खी तथा अजगर से सीखी — भागवत की सन्तोष पर महान शिक्षाओं में से एक है। सत्यापित श्लोकों वाला निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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युधिष्ठिर पूछते हैं कि घर से बँधा गृहस्थ भगवान् तक कैसे पहुँच सकता है। नारद उत्तर देते हैं कि एक घर भी एक मन्दिर हो सकता है — हर कर्तव्य को भगवान् के अर्पण के रूप में करके, सन्तों का संग रखकर, पशुओं तक को अपनी सन्तान समझकर, और समस्त प्राणियों के भीतर विद्यमान भगवान् की पूजा करके। सत्यापित श्लोकों वाला निष्ठावान भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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नारद सदाचरण के समूचे मार्ग को समेटते हैं — अहिंसा, सन्तोष, ध्यान, तथा आन्तरिक शत्रुओं पर विजय — और फिर सामने छिपा रहस्य प्रकट करते हैं: कि श्रीकृष्ण, मित्र तथा बन्धु के रूप में पाण्डवों के बीच विराजमान, स्वयं परम ब्रह्म हैं। सप्तम स्कन्ध का तेजोमय समापन, सत्यापित श्लोकों वाला निष्ठावान पुनर्कथन।
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आठवाँ स्कन्ध इस वर्णन से आरम्भ होता है कि श्रीशुकदेव मन्वन्तरों — महान युग-कालों — का वर्णन करते हैं, और प्रत्येक युग में भगवान का यज्ञ, विभु, सत्यसेन तथा श्रीहरि रूप में अवतरण जिससे वे लोक की रक्षा करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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वरुण के स्वर्ण-कमल सरोवर में हाथियों में श्रेष्ठ गजराज एक ग्राह द्वारा पकड़ा जाता है, और एक लम्बे निराश संघर्ष के पश्चात् वह परम भगवान की शरण लेने का निश्चय करता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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सरोवर की गहराई से मरणासन्न गजराज निराकार परम भगवान को समर्पण की अमर स्तुति सुनाता है — और भगवान श्रीहरि गरुड़ पर आकर उसे मृत्यु से उबार लेते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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ग्राह उद्धरित गन्धर्व हूहू और हाथी भक्त राजा इन्द्रद्युम्न के रूप में प्रकट होता है। भगवान के स्पर्श से गजेन्द्र दिव्य रूप पाकर वैकुण्ठ को जाता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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दुर्वासा के शाप और असुरों से पराजित होकर देवता ब्रह्मा की शरण लेते हैं, जो उन्हें माया से परे दिव्य तट पर ले जाकर भगवान को एक भव्य स्तुति अर्पित करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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भगवान सहस्र सूर्यों के समान तेजोमय प्रकट होते हैं, मन्दराचल और वासुकि से क्षीरसागर-मन्थन की योजना बनाते हैं, और गिरे हुए पर्वत को गरुड़ पर उठाकर समुद्र-तट तक ले जाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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क्षीरसागर-मन्थन आरम्भ होता है, भगवान दिव्य कच्छप रूप में उसे धारण करते हैं, और जब लोक-विनाशक विष उठता है, तब भगवान शिव शुद्ध करुणा से उसे पी जाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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मथित क्षीरसागर से दिव्य रत्न और स्वयं देवी लक्ष्मी प्रकट होती हैं, जो समस्त सृष्टि को देखकर एकमात्र भगवान विष्णु का वरण करती हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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भगवान अपना अद्भुत मोहक रूप धारण कर अमृत पर असुरों के कलह को शान्त करते हैं, और उसे उन देवताओं को देते हैं जिन्होंने उनके चरणों की शरण ली थी। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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अमृत से वंचित असुर देवताओं पर आक्रमण कर भयंकर माया रचते हैं — जब तक देवता भगवान का स्मरण नहीं करते, जो गरुड़ पर प्रकट होकर उन्हें स्वप्न के समान विलीन कर देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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इन्द्र बली और असुर सेनापतियों को पराजित करते हैं, नमुचि समुद्र-फेन से मारा जाता है, और नारद युद्ध रोक देते हैं — फिर भी पराजित बली सब कुछ काल की गति मानकर शोकरहित रहते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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भगवान शिव वैकुण्ठ पधारकर विष्णु की गहन स्तुति करते हैं और उनका मोहक रूप देखने की प्रार्थना करते हैं — किन्तु क्षण भर के लिए वे भी भगवान की माया से अभिभूत हो जाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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श्रीशुकदेव वर्तमान और भावी मन्वन्तरों — आगामी मनुओं, ऋषियों, देवताओं और इन्द्रों — का उद्घाटन करते हैं, और प्रत्येक युग में भगवान का अवतरण, जहाँ बली इन्द्र रूप में शासन करेंगे। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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श्रीशुकदेव बताते हैं कि किस प्रकार मनु, ऋषि, इन्द्र और देवता परम पुरुष की आज्ञा से विश्व का शासन करते हैं, जो स्वयं प्रत्येक युग में असंख्य रूपों के द्वारा कार्य करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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अपने गुरुओं से पुनर्जीवित और यज्ञ से शक्तिसम्पन्न असुरराज बली स्वर्ग पर चढ़ाई करता है; बृहस्पति के परामर्श से देवता हट जाते हैं, और बली तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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स्वर्ग से वंचित अदिति को ऋषि कश्यप सांसारिक शक्ति की नहीं, बल्कि पवित्र पयोव्रत द्वारा शुद्ध भक्ति से परम भगवान की आराधना की सीख देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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द्वादश दिनों की भक्ति के पश्चात् परम भगवान अदिति के समक्ष प्रकट होते हैं और माँ के प्रेम से द्रवित होकर उसका अपना पुत्र बनने को सहमत होते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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परम भगवान अदिति से दिव्य वामन रूप में अवतरित होते हैं, एक छोटे ब्राह्मण बालक का रूप धारण कर बली के यज्ञ में पधारते हैं, जहाँ परम असुरराज उनका स्वागत कर जो चाहें वह देने का वचन देता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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समस्त लोकों के स्वामी बली से केवल तीन पग भूमि माँगते हैं, सन्तोष का अनमोल मूल्य सिखाते हैं, और राजा का वचन ग्रहण करते हैं — जबकि शुक्राचार्य वामन को विष्णु के रूप में पहचानकर चेतावनी देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठापूर्ण, भक्तिमय पुनर्कथन।
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वचन तोड़ने के बजाय बली राज्य के ऊपर सत्य को चुनते हैं, गुरु के शाप के बावजूद भूमि देते हैं, और भगवान के चरण धोते हैं — जबकि छोटा वामन विराट रूप में बढ़कर तीनों लोकों को डगों से नाप लेता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठावान भक्तिमय पुनर्कथन।
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ब्रह्मा सृष्टि के शिखर पर भगवान के चरण का पूजन करते हैं और पवित्र गंगा जन्मती है; असुर क्रोध से उठते हैं, बली काल की शक्ति के समक्ष उन्हें रोकते हैं, और गरुड़ महान राजा को वरुण के पाशों से बाँध देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठावान भक्तिमय पुनर्कथन।
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बँधे और तीनों लोकों से रहित, बली तीसरे चरण के लिए अपना मस्तक अर्पित करते हैं, केवल अपयश से डरते हुए। भगवान अपनी कृपा का रहस्य प्रकट करते हैं — कि वे प्रियतम भक्तों से धन प्रेमवश हरते हैं — और बली को सुतल प्रदान करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठावान भक्तिमय पुनर्कथन।
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बन्धन से मुक्त होकर बली उस कृपा की स्तुति करते हैं जो कभी लोकपालों को भी नहीं मिली और सुतल में प्रवेश करते हैं; प्रह्लाद भगवान की कृपा पर विस्मित होते हैं, शुक्राचार्य यज्ञ पूर्ण करते हैं, और उपेन्द्र बने दिव्य वामन इन्द्र को स्वर्ग लौटाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठावान भक्तिमय पुनर्कथन।
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जब हयग्रीव वेद चुराता है, भगवान दिव्य मत्स्य रूप में अवतरित होते हैं; वे दयालु सत्यव्रत से मिलते हैं, प्रत्येक पात्र से बड़े होते हैं, प्रलय में अपने सींग से बँधी नौका खींचते हैं, परम ज्ञान देते हैं, और वेदों का उद्धार करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक निष्ठावान भक्तिमय पुनर्कथन।
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भागवत के नवम स्कन्ध का आरम्भ वैवस्वत मनु के राजवंश से होता है, जो स्वयं भगवान् नारायण से अवतरित है, और सुद्युम्न की असाधारण कथा से — जो कन्या इला रूप में जन्मी, राजकुमार बनी, और पुरूरवा की जननी हुई। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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नवम स्कन्ध वैवस्वत मनु के पुत्रों से उत्पन्न कुलों के साथ आगे बढ़ता है — राजकुमार पृषध्र, जिन्होंने पद खोकर भगवान् को पाया; युवा वैरागी कवि; सम्राट् मरुत्त का अतुलनीय स्वर्णमय यज्ञ; और वैशाली बसाने वाला तृणबिन्दु का वंश। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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सुकन्या और ऋषि च्यवन की प्रिय कथा — उनकी निर्दोष भूल, अटल भक्ति, और च्यवन का चमत्कारी यौवन-लाभ — तत्पश्चात् राजा ककुद्मी की ब्रह्मलोक-यात्रा और रेवती का भगवान् बलराम से विवाह। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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नाभाग की सत्यनिष्ठा, राजा अम्बरीष की आदर्श भक्ति, उनका द्वादशी-व्रत, सुदर्शन चक्र द्वारा दुर्वासा की अग्निमयी कृत्या का लौटना, और भगवान् की यह घोषणा कि वे प्रेम-वश अपने भक्तों के अधीन हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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राजा अम्बरीष सुदर्शन चक्र से उसी ऋषि को बचाने की प्रार्थना करते हैं जिसने उनका अपकार किया; चक्र शान्त होता है, दुर्वासा भक्त की स्तुति करते हैं, और केवल जल पर बीते एक वर्ष के पश्चात् राजा भगवान् वासुदेव में मोक्ष पाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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इक्ष्वाकु का आरम्भिक सूर्यवंश उद्घाटित होता है: विकुक्षि अपना उत्तराधिकार खोता है, पुरंजय स्वयं इन्द्र को बैल बनाकर दैत्यों पर विजय पाता है, सम्राट् मान्धाता का जन्म नियति से होता है, और तपस्वी सौभरि एक ही इच्छा से पतित होकर अन्ततः मोक्ष पाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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सूर्यवंश मान्धाता से उतरता है: पुरुकुत्स विष्णु की शक्ति से सर्पों की सेवा करते हैं, त्रिशङ्कु तारों के बीच स्थिर होते हैं, और राजा हरिश्चन्द्र, वरुण को दिए व्रत एवं पुत्र रोहित के स्नेह से बँधे, एक ऐसी परीक्षा में खिंचते हैं जो अविचल सत्य की मुक्तिदायिनी शक्ति को प्रकट करती है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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विष के साथ उत्पन्न होकर भी महानता तक उठे सम्राट् सगर अपना नाम समुद्र को देते हैं। उनके साठ हज़ार अभिमानी पुत्र, खोए अश्व हेतु पृथ्वी खोदते हुए, दिव्य ऋषि कपिल का अपराध कर बैठते हैं और अपनी ही अग्नि से भस्म हो जाते हैं — जबकि विनम्र अंशुमान भगवान् की कृपा पाता है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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तीन पीढ़ियों की तपस्या के पश्चात्, राजा भगीरथ पवित्र गंगा को स्वर्ग से नीचे लाते हैं, और भगवान् शिव उनके प्रचण्ड वेग को अपने मस्तक पर धारण करते हैं। उनके पावन जल सगर के पुत्रों की भस्म का उद्धार करते हैं; और राजा खट्वाङ्ग, केवल एक घड़ी का जीवन पाकर, पूर्णतः भगवान् की ओर मुड़कर परम गति प्राप्त करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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परम भगवान् दशरथ के पुत्र रूप में अवतरित होते हैं: वे सीता को प्राप्त करने हेतु शिव का धनुष तोड़ते हैं, अपने पिता के वचन के लिए सिंहासन त्यागते हैं, समुद्र पर सेतु बाँधते हैं, अत्याचारी रावण का संहार करते हैं, और लौटकर राम-राज्य का परम शासन स्थापित करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् रामचन्द्र सम्पूर्ण पृथ्वी दान में दे देते हैं, अपनी प्रजा के संशयों का मान रखने के लिए सीता से वियोग सहते हैं, वाल्मीकि के आश्रम में कुश-लव का जन्म देखते हैं, और अन्ततः अपने शाश्वत धाम को लौट जाते हैं। जो कोई उनकी कथा कोमल हृदय से सुनता है, कर्म से मुक्त होता है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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इक्ष्वाकु का सूर्यवंश भगवान् राम के पुत्र कुश से आगे बहता है: याज्ञवल्क्य को योग सिखाने वाले योगाचार्य हिरण्यनाभ, कलापग्राम के सिद्ध योगी मरु जो एक दिन वंश को पुनर्जीवित करेंगे, योद्धा बृहद्बल, और आने वाले राजा, सुमित्र तक। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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राजा निमि एवं उनके गुरु वसिष्ठ एक-दूसरे को देह-पतन का शाप देते हैं; पुनः जीवन का प्रस्ताव पाकर, निमि विदेह रहना चुनते हैं, प्रत्येक प्राणी के नेत्रों के पलक झपकने में वास करते हुए। उनके मथे शरीर से जनक आते हैं, मिथिला के संस्थापक; उसी वंश में सीता एक हल से प्रकट होती हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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चन्द्रवंश चन्द्रदेव सोम, बुध के जन्म, और अप्सरा उर्वशी के प्रति राजा पुरूरवा के मार्मिक प्रेम से आरम्भ होता है। मोहित और फिर वियोगी होकर, पुरूरवा अन्ततः अपना विरह पवित्र की ओर मोड़ते हैं, पवित्र अग्नि के मन्थन की खोज करते हुए। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् विष्णु के आंशिक अवतार परशुराम भृगु के वंश में जन्म लेते हैं। जब अभिमानी सहस्रबाहु राजा कार्तवीर्य अर्जुन ऋषि जमदग्नि से पवित्र कामधेनु चुरा लेता है, तब परशुराम उस अत्याचारी का पीछा करके संहार करते हैं और गौ को लौटा देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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परशुराम अपने पिता की आज्ञा मानकर पुनर्जीवन का वरदान पाते हैं; किन्तु कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्र ऋषि जमदग्नि की हत्या कर देते हैं, और परशुराम पृथ्वी को अत्याचारी राजाओं से इक्कीस बार मुक्त करते हैं। जमदग्नि सप्तर्षियों में पुनर्स्थापित होते हैं, और परशुराम अन्ततः महेन्द्र पर्वत पर अपना परशु रख देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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चन्द्रवंश आयु के पुत्रों के माध्यम से विभक्त होता है। काशी के राजाओं में भगवान् धन्वन्तरि प्रकट होते हैं, दिव्य वैद्य एवं आयुर्वेद के प्रवर्तक, जिनका स्मरण दुःख को नष्ट करता है; राजा अलर्क छियासठ हज़ार वर्ष शासन करते हैं; और देवताओं की सेवा करने वाले राजा रजि की तुलना उनके ग्रसने वाले पुत्रों से की जाती है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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राजा ययाति देवयानी एवं शर्मिष्ठा से विवाह करते हैं, शुक्राचार्य द्वारा असमय वृद्धावस्था के शाप से ग्रस्त होते हैं, और अपनी वृद्धावस्था को पुत्र के यौवन से बदलना चाहते हैं। उनके चार बड़े पुत्र इनकार करते हैं, किन्तु सबसे छोटे पूरु शुद्ध भक्ति से सहर्ष पिता की वृद्धावस्था स्वीकार करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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एक हज़ार वर्ष के भोग के पश्चात् जिसने उन्हें अतृप्त छोड़ा, राजा ययाति बकरे की कथा से जागृत होते हैं, वह कालातीत सत्य कहते हैं कि कामना घृत से पोषित अग्नि के समान केवल ऊँची भड़कती है, अपने पुत्र का यौवन लौटाते हैं, संसार त्यागते हैं, और भगवान् वासुदेव में लीनता प्राप्त करते हैं — जबकि देवयानी भी मुक्त होती हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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पूरु का वंश दुष्मन्त एवं शकुन्तला तक ले जाता है, जिनके पुत्र भरत — श्री हरि के एक अंश से उत्पन्न एवं इस भूमि को अपना नाम देते हुए — अद्वितीय महिमा के चक्रवर्ती सम्राट् बनते हैं, अपने यज्ञों से माया को पार करते हैं, और अन्ततः समस्त प्रभुत्व को असत्य मानकर निवृत्त होते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भरत का वंश राजा रन्तिदेव की अमर कथा को प्रतिष्ठित करता है, जिन्होंने अड़तालीस दिन बिना अन्न-जल के सहे और प्रत्येक भाग एक ब्राह्मण, एक शूद्र, कुत्तों वाले मनुष्य को, और अन्ततः अपना अन्तिम जल एक मरणासन्न चाण्डाल को दे दिया — केवल समस्त प्राणियों का दुःख वहन करने की प्रार्थना करते हुए। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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अजमीढ के महान् वंश — पांचाल, कुरु एवं मगध के राजा — महाभारत के नायकों में खिलते हैं: राजा कुरु, कलापग्राम के योगी देवापि, महान् भक्त भीष्म, श्री हरि के अंश व्यास, पाँच पाण्डव, और कृष्ण की शक्ति से बचाए गए अजन्मे परीक्षित। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ययाति के बड़े पुत्रों के वंश प्रकट होते हैं — अंग के पूर्वी राज्य, सूखा समाप्त करने वाले ऋषि ऋष्यशृंग, कर्ण का दत्तक ग्रहण, और सर्वोपरि यदु का गौरवशाली वंश, जिसमें स्वयं भगवान् श्री कृष्ण के रूप में अवतरित हुए, और जिसे मात्र सुनना मनुष्य को समस्त पापों से मुक्त करता है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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यदु-वंश की वंशावली अपने सच्चे उद्देश्य तक पहुँचती है — शूर की पुत्री पृथा एवं सूर्यदेव का वरदान, वसुदेव की अनेक पत्नियाँ एवं पुत्र, एवं यह घोषणा कि वसुदेव एवं देवकी का आठवाँ पुत्र स्वयं भगवान् हरि है, जो पृथ्वी का भार हरने एवं उनकी महिमा सुनने वालों के कानों को स्वस्थ करने आए। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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दशम स्कन्ध का आरम्भ: अत्याचारी राजाओं से पीड़ित पृथ्वी माता देवताओं की शरण जाती है; क्षीरसागर पर भगवान् वसुदेव के घर अवतार लेने का वचन देते हैं। वसुदेव-देवकी का विवाह, यह आकाशवाणी कि आठवाँ पुत्र कंस का वध करेगा, वसुदेव का मृत्यु तथा आत्मा पर उपदेश, और कंस द्वारा दम्पति का बन्दीकरण — सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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जैसे ही परम भगवान् देवकी के गर्भ में स्थान ग्रहण करते हैं, कंस का उत्पीड़न यदुओं को तितर-बितर कर देता है, शिशु अनन्त बलराम के रूप में रोहिणी में स्थानान्तरित होता है, और ब्रह्मा, शिव, नारद तथा समस्त देवगण प्रसिद्ध गर्भ-स्तुति गाने उतरते हैं, भगवान् की सत्य-रूप में शरण लेते हुए — सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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अर्धरात्रि के घोरतम प्रहर में परम भगवान् वसुदेव और देवकी के समक्ष अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट होते हैं; दोनों माता-पिता उनकी स्तुति करते हैं, भगवान् अपने पूर्व अवतरणों का स्मरण कराते हैं, और शिशु बनकर शेष के फणों से सुरक्षित मार्ग देती यमुना को पार कर गोकुल पहुँचाए जाते हैं — सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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शिशु कंस की पकड़ से फिसलकर आठ भुजाओं वाली देवी के रूप में उठती है और घोषणा करती है कि उसका संहारक पहले ही जन्म ले चुका है; अत्याचारी पश्चात्ताप करके शाश्वत आत्मा का उपदेश देता है, फिर उसके दैत्य मन्त्री उसे साधुजनों के विरुद्ध क्रूरता की ओर मोड़ देते हैं — सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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नन्द पावन संस्कारों तथा असीम दान के साथ कृष्ण-जन्म मनाते हैं जब सम्पूर्ण व्रज आनन्दित होता है; भगवान् के आगमन से उनका ग्राम समृद्धि का आवास बन जाता है; और मथुरा जाकर नन्द अपने प्रिय मित्र वसुदेव से अपने पुत्रों तथा विधि के विषय में कोमल संवाद करते हैं — सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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कंस द्वारा एक सुन्दर स्त्री के वेश में भेजी गई शिशु-घातिनी पूतना हृदय में हत्या का भाव लिए शिशु भगवान् को गोद में उठा लेती है; किन्तु जिस भगवान् का वध वह करना चाहती है, वही उसके विष के साथ उसके प्राण खींच लेते हैं, और क्योंकि उसने अपना स्तन दिया, उसे साधुजनों की गति प्राप्त होती है — सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण, भक्तिपूर्ण पुनर्कथन।
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राजा परीक्षित भगवान् की और बाल-लीलाएँ सुनने को उत्कण्ठित हैं; श्रीशुकदेव सुनाते हैं कि कैसे शिशु कृष्ण ने एक भारी छकड़े को उलट दिया, कैसे बवण्डर-राक्षस तृणावर्त उन्हें आकाश में उड़ा ले गया पर स्वयं निर्जीव गिर पड़ा जबकि शिशु अक्षत लौट आया, और कैसे माता यशोदा ने उनके जँभाई लेते मुख में समस्त ब्रह्माण्ड देखा — सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ऋषि गर्ग गुप्त रूप से बलराम और कृष्ण का नामकरण करते हैं और बालक के असंख्य नाम तथा महिमा प्रकट करते हैं; दोनों बालक घुटनों से चलते, खेलते और समस्त व्रज में माखन चुराते हैं; और जब मिट्टी खाने के आरोपित शिशु अपना मुख खोलते हैं, तब माता यशोदा उसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देखती हैं — सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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दामोदर-लीला: समस्त लोकों के स्वामी माँ के प्रेम से स्वयं बँध जाते हैं, यह सिखाते हुए कि भक्ति वह जीत लेती है जो बल नहीं कर सकता।
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ऊखल से बँधे बालक कृष्ण यमलार्जुन वृक्षों को उखाड़कर नारद के शाप से वृक्ष बने कुबेर के दो अभिमानी पुत्रों को मुक्त करते हैं।
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कृष्ण ऊखल से मुक्त होते हैं, समस्त व्रज वृन्दावन जाता है, और बालक उन्हें मारने आए वत्सासुर तथा बकासुर का वध करते हैं।
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असुर अघासुर विशाल अजगर बनकर कृष्ण के साथियों को निगल लेता है; प्रभु उन्हें बचाने भीतर प्रवेश करते हैं, असुर का वध करते हैं और उसे भी मुक्ति देते हैं।
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जब ब्रह्मा ग्वालबालों और बछड़ों को छिपा देते हैं, तब कृष्ण एक वर्ष तक स्वयं सब बन जाते हैं, और मोहित स्रष्टा नन्हे ग्वाल के चरणों में गिर पड़ते हैं।
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विनम्र स्रष्टा शास्त्रों की सबसे प्रिय स्तुतियों में से एक अर्पित करते हैं, प्रेममयी भक्ति और व्रज के गोपों के असीम सौभाग्य का गान करते हुए।
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बलराम गधा-असुर धेनुक का वध कर तालवन को मुक्त करते हैं, और कृष्ण यमुना के विष से गिरे गौओं और बालकों को एक दृष्टि से जिला देते हैं।
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कृष्ण यमुना को शुद्ध करने सर्प कालिय के सौ फणों पर नृत्य करते हैं, उसकी पत्नियों की प्रार्थना पर उसे क्षमा कर नदी को मधुर बना देते हैं।
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शुकदेवजी बताते हैं कि कालिय यमुना में क्यों छिपा, और कृष्ण, व्रज के आनन्द के बीच निकलकर, अपने जनों को बचाने अर्धरात्रि की दावाग्नि पी जाते हैं।
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गोपबालक के वेश में दानव प्रलम्ब बलराम को आकाश में हर ले जाता है — और एक ही तेजोमय आघात से गिरा दिया जाता है।
पाठ जारी रखें →
अकस्मात् दावाग्नि से घिरे व्रज के गोपों से कृष्ण केवल आँखें मूँदने को कहते हैं, फिर समूची भीषण ज्वाला पी जाकर सबकी रक्षा करते हैं।
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शुकदेवजी वृन्दावन में वर्षा और उसके बाद आने वाली शरद ऋतु का वर्णन करते हैं, प्रकृति के हर चिह्न में भक्ति की शिक्षा पाते हुए, जबकि कृष्ण-बलराम गोधन का पालन करते हैं।
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कृष्ण शरद-वन में वंशी बजाते हैं, और गोपियाँ गाती हैं कि कैसे मृग, नदियाँ, गौएँ और मुनि सभी उस संगीत से मोहित हो जाते हैं।
पाठ जारी रखें →
श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए मासभर देवी कात्यायनी की आराधना करने वाली व्रज की कुमारियाँ यमुना-तट पर प्रभु का वरदान पाती हैं — और ग्वालबाल परोपकारी वृक्षों की उनकी प्रशंसा सुनते हैं।
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भूखे ग्वालबालों को यज्ञ करते ब्राह्मण लौटा देते हैं; ब्राह्मण-पत्नियाँ भोजन लेकर नदियों की तरह कृष्ण की ओर दौड़ पड़ती हैं, और प्रभु उन पर कृपा करते हैं।
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कृष्ण विनम्रता से नन्द से इन्द्र-यज्ञ के विषय में पूछते हैं, भेंट को गौओं, ब्राह्मणों और गोवर्धन की ओर मोड़ते हैं, और पर्वत के रूप में उसे स्वयं ग्रहण करते हैं।
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इन्द्र व्रज पर प्रलय के मेघ भेजता है; कृष्ण एक हाथ से गोवर्धन पर्वत उठाकर सात दिन थामे रहते हैं, जब तक इन्द्र का गर्व नहीं टूट जाता।
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गोवर्धन के बाद गोप पूछते हैं कि सात वर्ष का बालक पर्वत कैसे उठा सकता है; नन्द ऋषि गर्ग के वचनों से उत्तर देते हैं, और विस्मय पूजा में बदल जाता है।
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लज्जित स्वर्गपति क्षमा माँगते हैं, प्रभु यज्ञ-भंग को अपनी कृपा बताते हैं, और कामधेनु अपने दूध से स्नान कराकर कृष्ण को गोविन्द कहकर पुकारती हैं।
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एकादशी-व्रत के समय वरुण का सेवक नन्दजी को ले जाता है; श्रीकृष्ण जल में उतरते हैं और फिर गोपों को अन्धकार से परे अपना धाम दिखाते हैं।
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शरद् की पूर्णिमा की रात कृष्ण की वंशी व्रज की स्त्रियों को पुकारती है। प्रभु उन्हें गृहस्थ-धर्म का स्पष्ट उपदेश देकर लौटाना चाहते हैं, और उनका उत्तर भक्ति का सार बन जाता है।
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प्रभु के अन्तर्धान होते ही व्रज की स्त्रियाँ प्रत्येक वृक्ष और लता से उनका पता पूछती हैं, उनकी लीलाओं का अभिनय करती हैं और वन में उनके चरण-चिह्नों का अनुसरण करती हैं।
पाठ जारी रखें →
कालिन्दी की चाँदनी बालू पर गोपियाँ गोपी-गीत गाती हैं, जो विरह के घाव से उठकर ऐसी प्रार्थना बन जाता है जो अपने लिए कुछ नहीं माँगती।
पाठ जारी रखें →
श्रीकृष्ण विरह में डूबी व्रज-गोपियों के बीच लौटते हैं, कालिंदी की चाँदनी-भरी बालू पर उनके साथ बैठते हैं, और बताते हैं कि वे दृष्टि से ओट क्यों हुए थे।
पाठ जारी रखें →
कृष्ण व्रज की प्रत्येक दो गोपियों के बीच विराजते हैं और आकाश देवताओं से भर उठता है; फिर शुकदेवजी बताते हैं कि यह लीला प्रभु को किसी बन्धन में नहीं डालती और श्रोता को शुद्ध कर देती है।
पाठ जारी रखें →
अम्बिकावन में भगवान् के चरण का एक स्पर्श नन्दजी को मुक्त करता है और एक शापित विद्याधर को सर्प-देह से उबार लेता है; फिर दोनों भाई व्रज की स्त्रियों को लौटा लाते हैं।
पाठ जारी रखें →
जब कृष्ण गौओं के साथ वन में होते हैं, व्रज की गोपियाँ उनका सारा दिन गाकर जीती हैं — अधरों की वंशी, ठहरी नदियाँ, और सन्ध्या की स्वर्ण-धूल में उनका लौटना।
पाठ जारी रखें →
वृषभ रूपधारी असुर व्रज को भयभीत करता है और कृष्ण के हाथों गिरता है; मथुरा में नारदजी सत्य खोलते हैं और कंस अपना रथ लेकर अक्रूरजी को भेजता है।
पाठ जारी रखें →
कंस का अश्वरूपी असुर गरजता हुआ व्रज में आता है और एक मुसकराती भुजा से गिर जाता है; फिर नारदजी प्रभु का प्रयोजन कहते हैं, और कृष्ण बन्द गुफा खोलकर अपने सखाओं को मुक्त करते हैं।
पाठ जारी रखें →
कंस के भेजे अक्रूरजी सारा मार्ग दर्शन की तड़प में बिताते हैं, श्रीकृष्ण के चरण-चिह्नों की धूल में रोते हैं, और कृष्ण तथा बलराम के आलिंगन को पाते हैं।
पाठ जारी रखें →
अक्रूरजी कृष्ण और बलराम को रथ में मथुरा ले चलते हैं और व्रज रो पड़ता है; मध्याह्न में कालिन्दी में स्नान करते हुए वे सहस्रफण अनन्त पर विराजमान चतुर्भुज भगवान् का दर्शन पाते हैं।
पाठ जारी रखें →
कालिन्दी में खड़े अक्रूरजी प्रभु को सबका मूल कहकर स्तुति करते हैं, मत्स्य से कल्कि तक उनके अवतारों को नमन करते हैं, अपना मोह स्वीकारते हैं और उनके चरणों में शरण लेते हैं।
पाठ जारी रखें →
दोनों भाई मथुरा के स्वर्णिम द्वारों से चलते हैं और नगर के लोगों से एक-एक करके मिलते हैं — एक धोबी, एक दर्जी और मालाकार सुदामा, जो केवल भक्ति माँगता है।
पाठ जारी रखें →
त्रिवक्रा पर कृष्ण की कृपा, ईख की तरह टूटा कंस का धनुष, राजा की अपशकुनों से भरी निद्राहीन रात, और प्रभात में सजी मल्ल-रंगभूमि।
पाठ जारी रखें →
कंस की रंगशाला के द्वार पर कृष्ण हाथी कुवलयापीड के साथ क्रीड़ा कर उसका वध करते हैं, फिर उस अखाड़े में प्रवेश करते हैं जहाँ हर हृदय उन्हें अपने ही ढंग से देखता है।
पाठ जारी रखें →
मथुरा की रंगशाला में दोनों भाई कंस के मल्लों को परास्त करते हैं, कृष्ण अत्याचारी का अन्त करते हैं, रानियों को ढाढ़स देते हैं और मुक्त माता-पिता के चरणों में झुकते हैं।
पाठ जारी रखें →
कंस-वध के बाद कृष्ण-बलराम माता-पिता का सम्मान करते हैं, उग्रसेन को राजा बनाते हैं, सान्दीपनि के आश्रम में पढ़ते हैं, और गुरु के खोए पुत्र को यमपुरी से लौटा लाते हैं।
पाठ जारी रखें →
कृष्ण अपने सखा उद्धव को नन्द, यशोदा और व्रज की गोपियों को सान्त्वना देने भेजते हैं, और उद्धव प्रकट करते हैं कि व्रज का पुत्र सब प्राणियों का आत्मा है।
पाठ जारी रखें →
व्रज की एक गोपी भ्रमर को कृष्ण का दूत मानकर अपना हृदय उँडेल देती है; उद्धव विरह पर भगवान् का सन्देश सुनाते हैं और गोपियों की चरण-रज को प्रणाम करते हैं।
पाठ जारी रखें →
मथुरा में दिए दो वचन निभाते हुए प्रभु त्रिवक्रा और फिर अक्रूर के घर जाते हैं; अक्रूर की स्तुति माया की रस्सी काटने की प्रार्थना में चरम पर पहुँचती है और वे पाण्डवों का हाल जानने भेजे जाते हैं।
पाठ जारी रखें →
श्रीकृष्ण के भेजे अक्रूर कुन्ती की अश्रुपूर्ण प्रार्थना सुनते हैं और धृतराष्ट्र से पाण्डवों को अपने पुत्रों-सा मानने का आग्रह करते हैं; राजा स्वीकार करते हैं कि आसक्ति उन्हें ऐसा नहीं करने देती।
पाठ जारी रखें →
जरासन्ध की तेईस अक्षौहिणी सेनाएँ मथुरा से टकराती हैं, आकाश से रथ उतरते हैं, और कृष्ण यदुओं की रक्षा के लिए समुद्र में द्वारका दुर्ग-नगरी रचते हैं।
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कालयवन निःशस्त्र प्रभु का पीछा करते हुए गुफा में घुसता है और जागे हुए राजा मुचुकुन्द की दृष्टि से भस्म हो जाता है, जो फिर चतुर्भुज प्रभु का दर्शन पाकर केवल उनकी सेवा माँगते हैं।
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जरासन्ध प्रवर्षण पर्वत में आग लगाता है, दोनों भाई कूदकर बच निकलते हैं, और एक ब्राह्मण रुक्मिणी का गुप्त संदेश समुद्र पार द्वारका में कृष्ण तक पहुँचाता है।
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कृष्ण रुक्मिणी के सन्देश का उत्तर देते हैं, एक रात में कुण्डिनपुर पहुँचते हैं और जरासन्ध के मित्र राजाओं के देखते-देखते उन्हें अपने गरुड़-ध्वज रथ पर बिठा लेते हैं।
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कृष्ण पीछा करते राजाओं को खदेड़ते हैं, रुक्मिणी की प्रार्थना पर रुक्मी को छोड़ते हैं, बलराम सबमें एक आत्मा का उपदेश देते हैं, और द्वारका प्रभु का विवाह मनाती है।
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दस दिन के होने से पहले समुद्र में फेंके गए कृष्ण-पुत्र प्रद्युम्न शम्बर के घर में रति के हाथों पलते हैं, दैत्य का वध करते हैं और उस माँ के पास लौटते हैं जो उन्हें तुरन्त पहचान लेती है।
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स्यमन्तक मणि के लिए प्रसेन के वध का मिथ्या आरोप लगने पर श्रीकृष्ण मणि का पीछा जाम्बवान की गुफा तक करते हैं, ऋक्षराज उन्हें पहचानता है और वे जाम्बवती के साथ लौटते हैं; फिर सत्राजित सत्यभामा अर्पित करता है।
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सत्यभामा का शोक, कृष्ण-बलराम का शतधन्वा का पीछा, मिथिला में बलराम, द्वारका के अपशकुन और अन्ततः प्रभु के बन्धुओं के सामने प्रकट स्यमन्तक।
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इन्द्रप्रस्थ में कुन्ती की प्रार्थना, यमुना के भीतर प्रतीक्षारत कालिन्दी, और काठ के खिलौनों की तरह खींचे गए कोसल के सात बैल — प्रभु प्रेम से स्वयं को जीते जाने देते हैं।
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सत्यभामा सहित गरुड़ पर आरूढ़ श्रीकृष्ण नरकासुर के दुर्ग तक जाते हैं, असुर का वध करते हैं, पृथ्वी देवी की स्तुति स्वीकारते हैं, बन्दिनी राजकुमारियों को मुक्त करते हैं और पारिजात द्वारका लाते हैं।
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रुक्मिणी के महल में श्रीकृष्ण ऐसा परिहास करते हैं जो रानी को झकझोर देता है, फिर उन्हें उठाकर वह उत्तर सुनते हैं जो शुद्ध भक्ति का हृदय प्रकट करता है।
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अनिरुद्ध के विवाह में रुक्मी बलराम से द्यूत में कपट करता है, आकाशवाणी को ठुकराता है और उनका उपहास करता है; बलराम का परिघ गिरता है, और कृष्ण प्रेम का मौन धारण करते हैं।
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बाणासुर शिव से योग्य शत्रु माँगता है; उत्तर उसकी पुत्री ऊषा के स्वप्न से आरम्भ होता है, जब चित्रलेखा कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध को द्वारका से आकाश-मार्ग से ले आती है।
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शिव अपने भक्त बाण के लिए नन्दी पर निकलते हैं; कृष्ण उनसे युद्ध करते हैं, प्रह्लाद के वचन के कारण असुर को जीवित छोड़ते हैं, और अनिरुद्ध-ऊषा को द्वारका ले आते हैं।
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सूखे कुएँ का गिरगिट श्रीकृष्ण के स्पर्श से तेजस्वी राजा बन जाता है। एक भटकी गौ की नृग की कथा, यम का प्रश्न, और ब्राह्मण-धन की पवित्रता पर श्रीकृष्ण का उपदेश।
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बलराम व्रज लौटते हैं, रोती गोपियों को कृष्ण के अपने सन्देशों से धीरज बँधाते हैं, और यमुना का मान मर्दन करते हैं, जो उनके चरणों में शरण लेती है।
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एक राजा प्रभु के चिह्नों की नकल धारण कर स्वयं को वासुदेव कहता है; श्रीकृष्ण हँसी से, सुदर्शन से और एक अप्रत्याशित कृपा से उत्तर देते हैं।
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शुकदेवजी बताते हैं कि महाबली वानर द्विविद ने कैसे नगर जलाए और ऋषियों को सताया, फिर रैवतक पर बलराम का उपहास किया — और हलधर प्रभु ने देवताओं की पुष्पवर्षा के बीच उसका अन्त कैसे किया।
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एकादश स्कन्ध के आरम्भ में भगवान् श्रीकृष्ण की पार्थिव लीला पूर्ण हो चुकी है। वे मौन भाव से अपने ही परम शक्तिशाली कुल को उठा लेने तथा शाश्वत धाम लौटने का संकल्प करते हैं — और चंचल यादव-कुमारों पर ऋषियों के शाप को उस दिव्य इच्छा का साधन बनने देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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देवर्षि नारद एक प्राचीन संवाद का स्मरण करते हैं: प्रबुद्ध राजा निमि नौ सिद्ध ऋषियों से शाश्वत कल्याण का मार्ग पूछते हैं, और ऋषि कवि भागवत-धर्म प्रकट करते हैं — भगवान् के चरणों की प्रेममयी सेवा जो समस्त भय को नष्ट कर देती है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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राजा निमि के यज्ञ में नौ योगीन्द्रों में से चार भगवान् की मोहिनी शक्ति के स्वरूप, सच्चे गुरु के आश्रय, अविनाशी आत्मा तथा उस प्रेममयी उपासना को प्रकट करते हैं जो आत्मा को माया के पार ले जाती है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →राजा निमि के यज्ञ में ऋषि द्रुमिल भगवान् के अवतारों का एक तेजस्वी स्मरण प्रस्तुत करते हैं — विराट् पुरुष, नर तथा नारायण, मत्स्य, कूर्म, वराह तथा नृसिंह, राम और यदुवंश में अवतार। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ऋषि चमस तथा करभाजन प्रकट करते हैं कि जो भगवान् की उपेक्षा करते हैं उनकी क्या गति होती है और वे चार युगों में किन रूपों में पूजे जाते हैं — कलियुग में उनके पावन नामों के कीर्तन की महिमा से मुकुटित। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ब्रह्मा तथा शिव के नेतृत्व में देवगण द्वारका में उतरकर श्रीकृष्ण की स्तुति करते हैं और उनसे अपने धाम लौटने की प्रार्थना करते हैं; भगवान् स्वीकार करते हैं, यदुगण को प्रभास भेजते हैं, और उद्धव प्रेमपूर्वक उनके समीप आते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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श्रीकृष्ण उद्धव को वैराग्य तथा समदृष्टि का आह्वान करते हैं, और राजा यदु तथा एक अवधूत की कथा सुनाते हैं जिसने संसार में चौबीस गुरु पाए — पृथ्वी से लेकर कपोत तक। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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परिव्राजक अवधूत राजा यदु को अपने नौ और गुरुओं से सीखी शिक्षा बताते हैं — अजगर, समुद्र, पतंगा, भ्रमर, हाथी, मधु निकालने वाला, हरिण तथा मछली — और पिंगला वेश्या के जागरण की कथा सुनाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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परिव्राजक अवधूत अपना उपदेश पूर्ण करते हैं, राजा यदु को अपने अन्तिम सात गुरुओं तथा गुरु के रूप में स्वयं शरीर के विषय में बताते हैं, और दुर्लभ मानव जन्म के उपहार का सम्मान करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव को कामना रहित कर्म, आत्मा को शरीर से भिन्न जानना, तथा सांसारिक एवं स्वर्गीय दोनों भोगों की रिक्तता सिखाते हैं — क्योंकि स्वर्ग भी पतन में समाप्त होता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव को बन्धन तथा मुक्ति का उत्तर देते हैं, एक वृक्ष पर दो पक्षियों की चिरन्तन उपमा देते हैं, सच्चे साधु का वर्णन करते हैं, और प्रेममयी भक्ति के अनेक रूप प्रकट करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण प्रकट करते हैं कि सन्तों का संग समस्त साधनों से बढ़कर उन्हें प्राप्त कराता है, स्मरण करते हैं कि गोपियों ने केवल शुद्ध प्रेम से उन्हें पाया, और उद्धव को केवल उनकी शरण लेकर समस्त भय से मुक्त होने का आह्वान करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव को सत्त्व के अभ्यास से प्रकृति के गुणों पर विजय सिखाते हैं, और बताते हैं कि कैसे वे एक तेजस्वी हंस के रूप में प्रकट होकर सनक तथा उनके भाइयों को आत्मा को समस्त अवस्थाओं की साक्षी बताते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव को बताते हैं कि भक्ति अकेली ही समस्त मार्गों से ऊपर स्वयं में सम्पूर्ण है, उसकी पाप-नाशक शक्ति तथा द्रवित हृदय के लक्षण प्रकट करते हैं, और हृदय-कमल में अपने ही कृपा-पूर्ण स्वरूप के ध्यान की सम्पूर्ण विधि सिखाते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव को अठारह दिव्य सिद्धियाँ बताते हैं, प्रत्येक को प्राप्त करने वाला ध्यान समझाते हैं, और सिखाते हैं कि केवल उन्हीं को चाहने वाले भक्त के लिए ये सिद्धियाँ लक्ष्य नहीं, बाधा हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव की उत्कण्ठा का उत्तर अपनी विभूतियाँ प्रकट करते हुए देते हैं — गंगा तथा हिमालय, ॐ तथा वेद, देवता तथा ऋषि, और स्वयं अपने भक्त उद्धव में — तत्पश्चात् वाणी, मन, प्राण तथा इन्द्रियों को वश में करने का आह्वान करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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उद्धव प्रार्थना करते हैं कि कर्तव्य का पावन मार्ग लुप्त न हो, और श्रीकृष्ण चार वर्णों तथा चार आश्रमों को अपने ही विराट रूप से उत्पन्न बताते हैं, तथा अहिंसा और सत्य के उस एक धर्म को प्रकट करते हैं जो प्रत्येक आत्मा को बाँधता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव को वानप्रस्थ की तपस्या, संन्यासी के वास्तविक आन्तरिक लक्षण, तथा गृहस्थ-भक्त के सरल कर्तव्य सिखाते हैं — सभी केवल भगवद्-भक्ति से मुकुटित। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव को भक्ति की सीढ़ियाँ सिखाते हैं, भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को दिए गए उपदेश का स्मरण करते हैं, और बारह यम, बारह नियम तथा प्रत्येक गुण की परिभाषा देते हैं जिसे एक निष्ठावान् हृदय पूछ सकता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव के वेद के विषय में प्रश्न का उत्तर ज्ञान, कर्म तथा भक्ति के तीन मार्ग सिखाकर देते हैं, मानव-शरीर की तुलना भवसागर पार करने वाली दुर्लभ नौका से करते हैं, तथा उद्घाटित करते हैं कि उनके प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति ज्ञान तथा वैराग्य से भी श्रेष्ठ क्यों है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव को सिखाते हैं कि शुद्धि-अशुद्धि, गुण-दोष वस्तुओं में स्थिर नहीं अपितु शास्त्रीय विधान से निर्धारित हैं, वेद स्वर्ग की प्रतिज्ञा से अपनी गहन सत्यता को क्यों मीठा करते हैं, और वेदों को अपने ही पावन नाद-स्वरूप के रूप में प्रकट करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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उद्धव पूछते हैं कि ऋषिगण सृष्टि के मूल तत्त्वों की संख्या इतनी भिन्न-भिन्न क्यों बताते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण प्रत्येक गणना का समन्वय करते हैं, फिर प्रकट करते हैं कि पुरुष तथा प्रकृति, नित्य भिन्न होते हुए भी, कैसे एक प्रतीत होते हैं, और आत्मा शान्तिपूर्वक एक शरीर से दूसरे शरीर में कैसे संचरण करती है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव को बताते हैं कि कैसे अवन्ति का एक धनवान परन्तु कंजूस ब्राह्मण सब कुछ खोकर, अपने ही घर से निकाला जाकर, एक परिव्राजक भिक्षु बन गया, जिसने गाया कि मन ही समस्त सुख-दुःख का वास्तविक कारण है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव को सृष्टि तथा प्रलय का प्राचीन सांख्य-दर्शन प्रकट करते हैं — कैसे प्रकृति तथा पुरुष, गुण, ब्रह्माण्ड तथा त्रिलोक उत्पन्न होते हैं, और कैसे समस्त विस्तार समेटे जाने पर केवल आत्मा शेष रहती है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव को दिखाते हैं कि सत्त्व, रजस् तथा तमस् देहधारी जीव के जीवन के प्रत्येक कोने को कैसे शासित करते हैं, और प्रकट करते हैं कि भक्ति ही जीव को इन तीनों गुणों से परे, स्वयं उनके पास ले जाती है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव को राजा पुरूरवा का गीत सुनाते हैं, जो अप्सरा उर्वशी के मोह से व्यथित होकर निष्कपट वेदना से मुक्त हुए, तथा बताते हैं कि सन्तों का संग ही हृदय को क्यों भरता है। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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उद्धव भगवान् श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि उनकी आराधना कैसे की जाए, और भगवान् क्रियायोग का सम्पूर्ण मार्ग सिखाते हैं — पवित्र प्रतिमा में उपस्थिति का आवाहन, स्नान-शृंगार, पावन अग्नि, तथा भक्त का समर्पण। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव को सभी प्राणियों में एक आत्मा देखने की शिक्षा देते हैं, स्वप्न तथा प्रतिबिम्ब के माध्यम से इस संसार की अवास्तविकता दर्शाते हैं, और प्रकट करते हैं कि समस्त ज्ञान अन्ततः भगवद्भक्ति में ही सुरक्षित विश्राम पाता है। एक श्रद्धापूर्ण, सत्यापित पुनर्कथन।
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भगवान् कृष्ण उद्धव-गीता को सबसे सरल मार्ग से समाप्त करते हैं — प्रत्येक प्राणी में स्वयं को देखना तथा समस्त सृष्टि के समक्ष नतमस्तक होना — और फिर उद्धव को बदरिकाश्रम के वन भेजते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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प्रभास में एक प्राचीन शाप पूर्ण होता है और यदुवंश का अन्त होता है। बलराम योग द्वारा प्रस्थान करते हैं, और पिप्पल वृक्ष के नीचे विराजमान श्रीकृष्ण शिकारी जरा को आशीर्वाद देकर अपने सारथी दारुक को अन्तिम सन्देश देते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित एक श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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ब्रह्मा, शिव तथा देवतागण फूलों की वर्षा के साथ श्रीकृष्ण के अपने नित्य धाम में लौटने का दर्शन करते हैं। सुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को सिखाते हैं कि भगवान् का तिरोधान उनकी ही माया है, कोई अन्त नहीं। एक श्रद्धापूर्ण, सत्यापित पुनर्कथन।
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श्रीकृष्ण के अपने धाम प्रस्थान के पश्चात् राजा परीक्षित पूछते हैं कि पृथ्वी पर कौन राज्य करेगा। श्रीशुकदेव कलियुग के वंशों — प्रद्योतन, शिशुनाग, नन्द, मौर्य, शुंग, कण्व, आन्ध्र आदि — की भविष्यसूचक वंशावली खोलते हैं, जो गहराते युग के म्लेच्छ राजाओं के निर्भीक चित्रण के साथ समाप्त होती है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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श्रीशुकदेव लक्षण-दर-लक्षण उघाड़ते हैं कि कलियुग में सद्गुण कैसे क्षीण होते हैं — धन मूल्य का और बल न्याय का मापदण्ड बनता है — जब तक कि भगवान् कल्कि रूप में अवतरित होकर पृथ्वी को शुद्ध करते और सत्ययुग के स्वर्णिम काल की पुनर्स्थापना करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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धरती माता उन राजाओं पर हँसती हैं जो उसे जीतने के लिए भागदौड़ करते हैं, जो मृत्यु के खिलौने-मात्र हैं। इसी दृष्टि से श्रीशुकदेव चारों युगों के फेरे का अनुरेखण करते और कलि-युग में छिपी एक महान् कृपा प्रकट करते हैं: कि केवल श्रीकृष्ण के नामों का कीर्तन करने-मात्र से आत्मा समस्त बन्धन से पार हो जाती है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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श्रीशुकदेव गोस्वामी प्रलय के चार प्रकार — नित्य, नैमित्तिक, प्राकृतिक तथा आत्यन्तिक — को उघाड़ते हैं और प्रकट करते हैं कि जन्म-मृत्यु के सागर के समक्ष एक अचूक नौका है: भगवान् की अपनी कथा का अमृत। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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मृत्यु के ठीक किनारे पर श्रीशुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को अपनी अन्तिम शिक्षा देते हैं: आत्मा अजन्मा और अमर है, देह से उतनी भिन्न जितनी अग्नि ईंधन से, और सर्प के दंत केवल देह को छू सकते हैं, ‘मैं ब्रह्म हूँ’ के ज्ञान में स्थित आत्मा को कभी नहीं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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राजा परीक्षित अपनी आत्मा को ब्रह्म में लीन कर देते हैं, भले ही तक्षक का विष उनकी देह को भस्म कर दे; बृहस्पति इस सत्य से जनमेजय का शोक शान्त करते हैं कि प्रत्येक प्राणी अपने ही कर्म का फल भोगता है; और पावन ओंकार से एक शाश्वत वेद उन्मीलित होकर वेदव्यास द्वारा उसकी शाखाओं में विभक्त होता है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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सूत गोस्वामी बताते हैं कि किस प्रकार अथर्ववेद श्रद्धालु शिष्यों के माध्यम से आगे बढ़ा, पुराणों को सुरक्षित रखने वाले छह ऋषियों के नाम लेते हैं, पुराण के दस लक्षण उघाड़ते हैं, और अठारह महापुराणों के नाम लेते हैं — जिनमें भागवत भी है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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सूत, दीर्घायु ऋषि मार्कण्डेय के विषय में शौनक के प्रश्न का उत्तर देते हैं: किस प्रकार उन्होंने आजीवन तपस्या तथा श्रीहरि की उपासना से मृत्यु को जीता, किस प्रकार कामदेव के माध्यम से इन्द्र का परीक्षण ईश्वर में लीन आत्मा के समक्ष विफल हुआ, और किस प्रकार भगवान् नर तथा नारायण के रूप में अपने भक्त को आशीर्वाद देने प्रकट हुए। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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कोई भी वर पाने पर, ऋषि मार्कण्डेय केवल भगवान् की माया देखने की याचना करते हैं। भगवान् उन्हें उसके सम्पूर्ण अनुभव में से ले चलते हैं — एक प्रलय-जल जिसमें वे युगों तक एकाकी बहते हैं, फिर एक वटपत्र पर देदीप्यमान शिशु-रूप में स्वयं को दिखाते हैं, जिसकी देह में सम्पूर्ण विश्व धारित है। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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देवी उमा के साथ यात्रा करते हुए, भगवान् शिव मार्कण्डेय को समाधि में लीन देखते हैं, उन्हें जगाते हैं, और शुद्ध-हृदय सन्तों की महिमा गाते हैं जो एक ही दर्शन में पवित्र कर देते हैं। कोई भी वर पाने पर, ऋषि केवल भगवान्, उनके भक्तों, तथा शिव की अटूट भक्ति माँगते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
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सूत गोस्वामी विराट पुरुष को प्रकट करते हैं जिसकी देह ही विश्व है, भगवान् के ध्यान-रूप को खोलते हैं जिसमें प्रत्येक चिह्न सत्ता का जीवन्त तत्त्व है, और सूर्य-देव की महिमा का वर्णन करते हैं — जो स्वयं श्रीहरि ही हैं — बारह मासों में अपने पावन परिकर सहित। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →
जैसे महान् कथा समापन के निकट आती है, सूत गोस्वामी सम्पूर्ण भागवत पर दृष्टि डालते हैं — पुस्तक-दर-पुस्तक, परीक्षित से कृष्ण तक और जगत् के प्रलय तक — भगवान् के नाम की पवित्रकारी शक्ति की महिमा गाते हैं, और विष्णु एवं शुक को श्रद्धापूर्ण प्रणाम करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन।
पाठ जारी रखें →
सम्पूर्ण भागवत का अन्तिम अध्याय: सूत गोस्वामी अठारह पुराणों का विस्तार बताते हैं, भागवत की परम महिमा — उपनिषदों का सार — की घोषणा करते हैं, गुरु-परम्परा पर महान् ध्यान प्रस्तुत करते हैं, और श्रीहरि को प्रणाम से समापन करते हैं। सत्यापित श्लोकों सहित श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन तथा शृंखला का उपयुक्त समापन।
पाठ जारी रखें →श्रृंखला का प्रत्येक कथा-भाग शास्त्र के क्रम में — पहले भागवत माहात्म्य, फिर स्कन्ध 1 अध्याय-दर-अध्याय। प्रत्येक कथा-भाग गीता प्रेस श्रीमद्भागवत महापुराण पर आधारित है और भगवान् वासुदेव के मंगलाचरण से आरम्भ होता है। (वाचन अंग्रेज़ी में है।)
🪔 स्कन्ध 12 तक के शेष अध्याय शीघ्र ही प्रकाशित किए जाएँगे। जय जगन्नाथ · जय श्री माधव