श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10, अध्याय 30: गोपियाँ चाँदनी-भरे वन में कृष्ण को खोजती हैं, वृक्षों से पूछती हैं और उनके चरण-चिह्न पाती हैं।
वृन्दावन के चाँदनी-भरे वन में अपने प्राणधन से बिछुड़कर गोपियाँ प्रत्येक वृक्ष और लता से उनका पता पूछती हैं, प्रेम में स्वयं कृष्ण बन जाती हैं, और अन्त में वन की मिट्टी पर अंकित उनके पावन चरण-चिह्न पा लेती हैं।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद्भागवतम् विज़्डम में पुनः स्वागत है — श्रीमद्भागवत महापुराण की पवित्र कथाओं और शिक्षाओं की हमारी भक्तिमयी यात्रा। दशम स्कन्ध का यह तीसवाँ अध्याय पवित्र वाङ्मय के सबसे कोमल प्रसंगों में से एक है। शुकदेवजी राजा परीक्षित को सुनाते हैं कि कृष्ण के सहसा अदृश्य हो जाने पर व्रज की स्त्रियों ने क्या किया — और कैसे उनका शोक भीतर सिमटने के बजाय बाहर बह निकला: गान में, प्रश्न में, अनुकरण में, और उस खोज में जो चाँदनी के बुझने तक चली।
पिछले अध्याय में प्रभु ने वंशी से व्रज की स्त्रियों को चाँदनी-भरे वन में बुलाया, उनका प्रेम स्वीकार किया और महारास आरम्भ किया। जब उस दुर्लभ सौभाग्य से उनके मन में तनिक गर्व उपजा, तब वे पल भर में अन्तर्धान हो गए — त्यागने को नहीं, उनके प्रेम को और गहरा करने को।
प्रभु के एकाएक अदृश्य हो जाने पर व्रज की स्त्रियाँ सन्ताप से जलने लगीं।
श्रीशुक उवाच
अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गना: ।
अतप्यंस्तमचक्षाणा: करिण्य इव यूथपम् ॥ १ ॥
śrī-śuka uvāca antarhite bhagavati sahasaiva vrajāṅganāḥ atapyaṁs tam acakṣāṇāḥ kariṇya iva yūthapam
अर्थ: श्री शुकदेवजी बोले — भगवान् के सहसा अन्तर्धान हो जाने पर व्रजांगनाएँ उन्हें न देख पाने से उसी प्रकार सन्तप्त हुईं जैसे अपने यूथपति को खो देने पर हथिनियाँ। (स्कन्ध 10, अध्याय 30, श्लोक 1)
उनका चित्त तो पहले ही प्रभु की चाल, प्रेमभरी मुस्कान, चंचल चितवन, मधुर वाणी और ललित विहार में बँध चुका था; अब बाहर उनका कुछ शेष न रहा, तो गोपियों ने उन्हें स्वयं बनकर भीतर पा लिया। उनके अंग प्रभु की गति, हँसी, दृष्टि और बोली धारण करने लगे, और प्रत्येक प्रियतमा कह उठी — “मैं ही कृष्ण हूँ!”
उन्हीं का यशोगान ऊँचे स्वर में करती और उन्मत्त स्त्रियों-सी वन-वन भटकती हुईं वे वनस्पतियों से उस पुरुष के विषय में पूछने लगीं जो आकाश की भाँति सब प्राणियों के भीतर-बाहर विराजते हैं। “हे अश्वत्थ, हे प्लक्ष, हे न्यग्रोध! क्या नन्दनन्दन इधर से गए, जो प्रेमभरी मुसकानों से हमारा मन हर ले गए? हे कुरबक, अशोक, नाग, पुन्नाग, चम्पक! क्या बलराम के छोटे भाई इधर से निकले, जिनकी मुसकान मानिनियों का मान हर लेती है? हे कल्याणी तुलसी, गोविन्द के चरणों को इतनी प्रिय! क्या तुमने अपने प्रियतम अच्युत को भ्रमरों सहित तुम्हें धारण किए जाते देखा? हे मालती, मल्लिका, जाती और यूथिका! क्या माधव ने अपने करस्पर्श से तुम्हें आनन्दित किया?” फिर उन्होंने यमुना-तट के समस्त वृक्षों से विनती की:
चूतप्रियालपनसासनकोविदार-
जम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्रकदम्बनीपा: ।
येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूला:
शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां न: ॥ ९ ॥
cūta-priyāla-panasāsana-kovidāra- jambv-arka-bilva-bakulāmra-kadamba-nīpāḥ ye ’nye parārtha-bhavakā yamunopakūlāḥ śaṁsantu kṛṣṇa-padavīṁ rahitātmanāṁ naḥ
अर्थ: हे चूत, प्रियाल, पनस, आसन, कोविदार, जम्बू, अर्क, बिल्व, बकुल, आम्र, कदम्ब और नीप! और हे यमुना-तट के अन्य सब वृक्षो, जो परोपकार के लिए ही जन्मे हो — हम जिनका आत्मा हर लिया गया है, उन्हें कृष्ण का मार्ग बताओ। (स्कन्ध 10, अध्याय 30, श्लोक 9)

उन्होंने पृथ्वी से पूछा कि उसने कौन-सा तप किया है, जो उसके तृण रोमांचित खड़े हैं — यह केशव के चरणों के स्पर्श से है, वामन के विशाल पगों से, या वराह रूप के आलिंगन से? उन्होंने एक हरिणी से पूछा कि क्या अच्युत अपनी प्रिया सहित इधर से गए, क्योंकि उनकी कुन्द-माला की सुगन्ध अब भी वायु में घुली है। उन्होंने वृक्षों से पूछा कि क्या प्रभु ने, हाथ में कमल लिए और भुजा प्रिया के कंधे पर रखे, उनके प्रणाम का उत्तर प्रेमभरी चितवन से दिया। “इन लताओं से भी पूछो — अपने स्वामी वृक्ष से लिपटी होने पर भी ये नई कोंपलों से पुलकित हैं; निश्चय ही इन्हें उनके नखों का स्पर्श मिला है।”
इस प्रकार बावली-सी बातें करती और उन्हीं में तन्मय हुई गोपियाँ प्रभु की लीलाओं का अभिनय करने लगीं। एक पूतना बनी और दूसरी वह शिशु जिसने स्तन के साथ उसके प्राण पी लिए; एक बालक-सी रोकर शकट बनी सखी को ठोकर मार बैठी। एक सखी को तृणावर्त-सी उड़ा ले गई; दूसरी नूपुर बजाती घुटनों के बल सरकने लगी। दो ने कृष्ण और बलराम का रूप धरा, कुछ ग्वालबाल बनीं, और वत्सासुर तथा बकासुर पुनः मारे गए। एक ने दूर गई गायों को उन्हीं के स्वर में पुकारा, वंशी बजाई, और शेष बोल उठीं — “साधु! साधु!” दूसरी ने सखी के कंधे पर भुजा रखकर कहा — “मेरी यह ललित चाल तो देखो, मैं ही कृष्ण हूँ!” एक ने बड़े परिश्रम का अभिनय करते हुए एक ही हाथ से उत्तरीय ऊपर उठा लिया — “आँधी-वर्षा से मत डरो, मैंने रक्षा का प्रबन्ध कर दिया है।” एक ने दूसरी के सिर पर पाँव रखकर कहा — “दुष्ट सर्प, हट जा! मैं तो दुष्टों को दण्ड देने के लिए ही जन्मा हूँ।” एक ने ग्वालों को सम्बोधित करने के भाव से पुकारा — “देखो, यह दावाग्नि! आँखें मूँद लो, मैं तुम्हें पार ले चलूँगा।” और एक सुकुमारी, जिसे माता का अभिनय करती सखी ने माला से ऊखल में बाँध दिया, मुँह ढककर डरने का मनोहर स्वाँग करने लगी।

लताओं और वृक्षों से उनका पता पूछती हुई गोपियाँ वन के एक भाग में पहुँचीं, जहाँ स्वयं धरती ने उत्तर दे दिया।
एवं कृष्णं पृच्छमाना वृन्दावनलतास्तरून् ।
व्यचक्षत वनोद्देशे पदानि परमात्मन: ॥ २४ ॥
evaṁ kṛṣṇaṁ pṛcchamānā vṛndāvana-latās tarūn vyacakṣata vanoddeśe padāni paramātmanaḥ
अर्थ: इस प्रकार वृन्दावन की लताओं और वृक्षों से कृष्ण के विषय में पूछती हुई उन्होंने वन के एक भाग में परमात्मा के चरण-चिह्न देखे। (स्कन्ध 10, अध्याय 30, श्लोक 24)
“ये तो स्पष्ट ही महात्मा नन्दनन्दन के चरण हैं,” वे बोलीं, “यह देखो ध्वजा, कमल, वज्र, अंकुश और यव का चिह्न।” उसी मार्ग पर उत्सुकता से चलती उन अबलाओं ने प्रभु के चरणों के साथ एक स्त्री के चिह्न देखे और उनके हृदय बैठ गए। “यह कौन है जो नन्दनन्दन के साथ इधर गई, जिसके कंधे पर उन्होंने भुजा रखी है, मानो गजराज के संग हथिनी? निश्चय ही इसने श्रीहरि की पूर्ण आराधना की है, तभी गोविन्द हम सबको छोड़कर इसे एकान्त में ले गए।”

फिर भी उस पीड़ा में उनका प्रेम कटु नहीं हुआ; वह उस रज की महिमा में बदल गया जिसे प्रभु के चरणों ने छुआ था।
धन्या अहो अमी आल्यो गोविन्दाङ्घ्र्यब्जरेणव: ।
यान् ब्रह्मेशौ रमा देवी दधुर्मूर्ध्न्यघनुत्तये ॥ २९ ॥
dhanyā aho amī ālyo govindāṅghry-abja-reṇavaḥ yān brahmeśau ramā devī dadhur mūrdhny agha-nuttaye
अर्थ: अहो सखियो, धन्य है गोविन्द के चरण-कमलों की यह रज, जिसे ब्रह्मा, शिव और देवी रमा अपने सन्ताप को दूर करने के लिए अपने मस्तक पर धारण करते हैं। (स्कन्ध 10, अध्याय 30, श्लोक 29)
तब भी वे दूसरे चिह्न उन्हें व्यथित करते रहे — “जो उन्हें हर ले गई और एकान्त में अच्युत के अधरामृत का सुख पा रही है, उसी के ये चिह्न हमारा मन मथ रहे हैं।” आगे बढ़कर वे बोलीं — “यहाँ उसके पद-चिह्न नहीं; निश्चय ही प्रियतम ने प्रिया को गोद में उठा लिया, जिसके कोमल तलवों में तृण चुभ रहे थे। देखो, यहाँ उनके चरण कितने गहरे धँसे हैं — उस भार से जिसे वे उठाए थे। यहाँ उन्होंने उसे पुष्प चुनने को उतारा; यहाँ पुष्प चुने — केवल पंजों के अग्रभाग की छाप पड़ी है। और यहाँ उसके केश सँवारे, यहाँ बैठकर वेणी में फूल गूँथे।”
जिन्हें किसी से कुछ भी अपेक्षित नहीं, वे प्रभु ऐसा आचरण करें ही क्यों? शुकदेवजी इसका कारण स्पष्ट कह देते हैं।
रेमे तया चात्मरत आत्मारामोऽप्यखण्डित: ।
कामिनां दर्शयन् दैन्यं स्त्रीणां चैव दुरात्मताम् ॥ ३४ ॥
reme tayā cātma-rata ātmārāmo ’py akhaṇḍitaḥ kāmināṁ darśayan dainyaṁ strīṇāṁ caiva durātmatām
अर्थ: यद्यपि वे आत्मा में ही रमण करने वाले आत्माराम और सदा अखण्ड हैं, तथापि उन्होंने उस गोपी के साथ विहार किया — जिससे कामी जनों की दीनता तथा स्त्री-हृदय में उत्पन्न हो सकने वाली दुरात्मता प्रकट हो जाए। (स्कन्ध 10, अध्याय 30, श्लोक 34)
यहीं इस अध्याय का हृदय है। प्रभु आत्माराम हैं — अपने ही में आनन्दित, पूर्ण और अखण्ड; किसी जीव का कोई कार्य उस पूर्णता में न कुछ जोड़ सकता है, न घटा सकता। अतः जब वे एक गोपी के साथ एकान्त में चलते हैं, उसे गोद में उठाते और उसकी वेणी में फूल गूँथते हैं, तब वे उससे पूर्ण नहीं हो रहे — वे वह दिखा रहे हैं जो अन्यथा हमें कभी न दिखता: कि आसक्ति अपने अधीन जनों को कितना दीन कर देती है, और सम्मान पाया हृदय कितनी शीघ्र प्रभु को निजी सम्पत्ति मानने लगता है। आगे की घटना इसी का प्रमाण है। जो सर्वाधिक अनुगृहीत हुई, वही गर्व से भर उठी, और जो सर्वथा उसी के प्रतीत होते थे, वे क्षण भर में अदृश्य हो गए। यह अन्तर्धान दण्ड नहीं, उस एक ही रोग की ठीक औषधि है जो स्वयं उनकी कृपा की भूमि में उग सकता है।
इधर जिस गोपी को कृष्ण एकान्त में ले गए थे, वह स्वयं को समस्त स्त्रियों में श्रेष्ठ मानने लगी थी — “मुझसे प्रेम करने वाली सब गोपियों को छोड़कर प्रियतम केवल मेरा ही संग कर रहे हैं।” वन के किसी भाग में पहुँचकर उसने गर्व से केशव से कहा, “अब मैं चल नहीं सकती; जहाँ मन हो वहाँ मुझे ले चलिए।” “तो मेरे कंधे पर चढ़ जाओ,” प्रभु ने उत्तर दिया — और जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया, कृष्ण अन्तर्धान हो गए और वह शोक में डूब गई।
हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज ।
दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम् ॥ ३९ ॥
hā nātha ramaṇa preṣṭha kvāsi kvāsi mahā-bhuja dāsyās te kṛpaṇāyā me sakhe darśaya sannidhim
अर्थ: हा नाथ! हे रमण, हे प्रियतम, हे महाबाहु, आप कहाँ हैं, कहाँ हैं? हे सखा, मुझ दीन दासी को अपनी सन्निधि दिखाइए। (स्कन्ध 10, अध्याय 30, श्लोक 39)

उसके शब्दों का परिवर्तन सुनिए। क्षण भर पहले वह उठाए जाने की माँग कर रही थी; अब केवल उनकी सन्निधि माँगती है और स्वयं को दासी कहती है। गर्व ने उसे स्वामिनी बनाया था; वियोग ने उन्हीं की बना दिया।
प्रभु के मार्ग पर आगे बढ़ती गोपियों ने अपनी उस सखी को थोड़ी ही दूर पाया, जो प्रियतम के वियोग से मोहित और दुखी थी। उसने सब कह सुनाया — माधव से मिला सम्मान, और अपनी ही दुर्बुद्धि से मिला अनादर — और वे परम विस्मय में पड़ गईं। फिर सब वन में उतनी दूर तक गईं जहाँ तक चाँदनी मार्ग दिखा सकी; और अन्धकार छाया देख वहीं से लौट आईं।
तन्मनस्कास्तदालापास्तद्विचेष्टास्तदात्मिका: ।
तद्गुणानेव गायन्त्यो नात्मगाराणि सस्मरु: ॥ ४३ ॥
tan-manaskās tad-alāpās tad-viceṣṭās tad-ātmikāḥ tad-guṇān eva gāyantyo nātmagārāṇi sasmaruḥ
अर्थ: उन्हीं में मन लगाए, उन्हीं की चर्चा करती, उन्हीं की चेष्टाएँ करती, उन्हीं में तन्मय और केवल उन्हीं के गुण गाती हुईं वे अपने शरीर तक को भूल गईं, घरों की तो बात ही क्या। (स्कन्ध 10, अध्याय 30, श्लोक 43)
अन्ततः कालिन्दी के पुलिन पर लौटकर, उनके आगमन की तीव्र आकांक्षा लिए, वे साथ बैठकर उन्हीं का गान करने लगीं — वही गान, जिसे अगला अध्याय सुरक्षित रखता है।
1. वियोग भी उनकी कृपा का ही एक रूप है। जो पहले से ही उनसे प्रेम करते हैं, उन्हीं से वे ओझल होते हैं (श्लोक 1), और वह सन्ताप ही वह अग्नि बन जाता है जिसमें स्मरण निर्मल होता है।
2. समस्त सृष्टि उनकी साक्षी है। वृक्ष, लताएँ, पृथ्वी और हरिणी तक ऐसे चेतन जनों की भाँति सम्बोधित हैं जो उन्हें जानते और परोपकार के लिए जीते हैं (श्लोक 9)। भक्त के लिए जगत् जड़ नहीं रह जाता।
3. निरन्तर स्मरण आत्मा को स्मरणीय के समान बना देता है। उन्हीं में डूबी गोपियाँ अपने शरीर और घर तक भूल जाती हैं (श्लोक 43) — यह अखण्ड प्रेम-स्मरण का सहज फल है, कोई साधा हुआ कौशल नहीं।
4. उनके चरणों की रज ही श्रेष्ठतम जनों की सम्पदा है। ब्रह्मा, शिव और देवी रमा उसी रज को शिरोधार्य करते हैं (श्लोक 29)। संसार की कोई उपलब्धि उस धूल के सामने नहीं ठहरती जो उनके पथ पर बिखरी है।
5. गर्व ही वह एक वस्तु है जिसे उनकी कृपा नहीं ढोती। आत्माराम प्रभु उघाड़ देते हैं कि ममता हृदय के साथ क्या करती है (श्लोक 34)। जिस क्षण हम उन्हें केवल अपना कहने लगते हैं, वे ओझल हो जाते हैं — ताकि हम स्वयं को उनका कहना सीखें।
इस प्रसंग में कुछ ऐसा है जो हमारी आँखें झुका देता है। गोपियों ने अपने प्रभु को खो दिया है, फिर भी वे न उलाहना देती हैं, न हताश बैठती हैं, न किसी दर्शन से स्वयं को समझाती हैं। वे अन्धकार में निकल पड़ती हैं और वृक्षों से पूछती हैं। वे तुलसी से, लता से, हरिणी से पूरी गम्भीरता से पूछती हैं, क्योंकि प्रेम ने समूचे वन को उनका परिवार बना दिया है और उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि जिसने उन्हें एक बार देख लिया, वह भूल सकेगा। और जब प्रश्न चुक जाते हैं, तब वे वही करती हैं जो प्रेम का अन्तिम उपाय है — स्वयं उन्हीं जैसी हो जाती हैं। हम भक्ति को इससे नापते हैं कि कोई नियम कितनी देर निभा लिया; वे कुछ नहीं नापतीं, बस रुक नहीं पातीं। फिर दूसरे चरण-चिह्नों की पीड़ा आती है — और वहाँ भी उनकी पहली प्रतिक्रिया उस रज को धन्य कहने की है।
आज अपने स्मरण को किसी एक नियत घड़ी में बाँधने के बजाय अपने चारों ओर की वस्तुओं के सहारे चलने दीजिए। तुलसी को जल देते समय, किसी वृक्ष के पास से निकलते समय, या किसी सुगन्ध भरी हवा के स्पर्श पर, उसे अपने से गोपियों का वही प्रश्न पूछने दीजिए — क्या वे इधर से गए? उसी क्षण उनका कोई एक नाम मुखर कर लीजिए। और यदि दिन आपको कोई हानि या उनका मौन दे, तो उसे भरने की जल्दी मत कीजिए; उसे शिकायत के बजाय आकांक्षा के साथ उन्हीं को अर्पित कर दीजिए। आरम्भ में धीरे-धीरे जपें: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
यह अध्याय सिखाता है कि प्रभु का छिप जाना भी उतना ही प्रेमपूर्ण है जितना उनका प्रकट होना। खोजती, गाती, अनुकरण करती व्रज की स्त्रियाँ ऐसा प्रेम दिखाती हैं जो शरीर और घर तक भुला देता है; और एकान्त में ले जाई गई गोपी वह एक भाव दिखा देती है जिसे ऐसे प्रेम को कभी नहीं पकड़ना चाहिए — कि वे केवल मेरे हैं। जो स्वयं में ही रमण करते हैं उन्हें इसमें से कुछ अपेक्षित नहीं, फिर भी वे सब स्वीकार करते हैं, केवल इसलिए कि हम उनके हो जाएँ। हम भी उन्हें वैसे ही खोजें, और वैसे ही थामें जैसे उस गोपी ने अन्त में थामा — विनम्रता के साथ।
श्रीमद्भागवतम् का दिव्य ज्ञान हमारे हृदयों में शुद्ध भक्ति जगाए।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
जय श्री माधव।
यह लेखक के अपने शब्दों में एक मौलिक, श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन है, जिसमें संक्षिप्त उद्धृत श्लोक देवनागरी एवं लिप्यन्तरण सहित दिए गए हैं और उनके अर्थ सारांश रूप में प्रस्तुत हैं। यह किसी एक प्रकाशक के सतत अनुवाद या टीका का पुनरुत्पादन नहीं है। किसी प्रकाशक के संबंध या समर्थन का दावा नहीं किया गया है।
जय श्री माधव
यह श्रृंखला प्रतिदिन आगे बढ़ती है — पूज्य पंडित डॉ. श्री काशीनाथ मिश्र के मार्गदर्शन में, शास्त्र के क्रम में।