श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10, अध्याय 36: कृष्ण द्वारा वृषभासुर अरिष्ट का अन्त, नारदजी का कंस को रहस्य बताना, और अक्रूरजी का व्रज प्रेषण।
एक असुर विशाल वृषभ का रूप धरकर व्रज की शान्त गोचर-भूमि में घुस आता है, और गौओं के बीच खेलता वह गोपबालक दुष्टों के शासक के रूप में सामने आ खड़ा होता है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद्भागवतम् विज़्डम में पुनः स्वागत है — श्रीमद्भागवत महापुराण की पवित्र कथाओं और शिक्षाओं की हमारी भक्तिमयी यात्रा। दशम स्कन्ध का यह छत्तीसवाँ अध्याय एक ही प्रवाह में हमें व्रज की गोचर-भूमि से मथुरा की राजसभा तक ले जाता है, जहाँ अब वृन्दावन की लीलाओं पर कंस की छाया पड़ने लगती है।
पिछले अध्याय में व्रज की गोपियाँ युगल-श्लोकों में परस्पर गाती रहीं कि कृष्ण अपनी वंशी और गौओं के साथ वन में कैसे विचरते हैं। अब वे उसी वन से लौटते हैं, और मथुरा से भेजा हुआ एक शत्रु उनकी प्रतीक्षा में खड़ा है।
शुकदेवजी ने कहा — वन से कृष्ण के लौटने के कुछ ही समय बाद गोकुल में अरिष्ट नामक असुर आया, जो वृषभ का रूप धारण किए हुए था; विशाल देह, ऊँचा ककुद्, और खुरों से धरती को चीरता हुआ वह उसे कँपा रहा था।
अथ तर्ह्यागतो गोष्ठमरिष्टो वृषभासुर: ।
महीं महाककुत्काय: कम्पयन्खुरविक्षताम् ॥ १ ॥
atha tarhy āgato goṣṭham ariṣṭo vṛṣabhāsuraḥ mahīṁ mahā-kakut-kāyaḥ kampayan khura-vikṣatām
अर्थ: उस समय गोकुल में वृषभ के रूप में अरिष्टासुर आया, जिसका शरीर विशाल और ककुद् ऊँचा था, और जो अपने खुरों से विदीर्ण पृथ्वी को कँपा रहा था। (स्कन्ध 10, अध्याय 36, श्लोक 1)

वह अत्यन्त कठोर स्वर में डकराता और पैरों से भूमि खोदता था; पूँछ उठाकर सींगों की नोक से मेड़ों को उछालता, थोड़ा-थोड़ा गोबर और मूत्र गिराता, और अपलक दृष्टि से घूरता जाता था। उसकी गर्जना इतनी भयंकर थी कि व्रज की गौओं और स्त्रियों के गर्भ, चाहे नए हों या पूर्ण, भय से गिर गए; और बादल उसके ककुद् को पर्वत समझकर उस पर उतर आए। उन तीखे सींगों को देखकर गोप और गोपियाँ भयभीत हो उठे, और गौएँ व्रज छोड़कर दूर भाग गईं। ‘कृष्ण! हे सर्वमोहन!’ पुकारते हुए सब गोविन्द की शरण में दौड़े।
भय से बिखरे गोकुल को देखकर प्रभु ने ‘डरो मत’ कहकर सबको आश्वस्त किया, और फिर उस वृषभासुर को स्वयं अपनी ओर बुलाकर फटकारा।
गोपालै: पशुभिर्मन्द त्रासितै: किमसत्तम ।
मयि शास्तरि दुष्टानां त्वद्विधानां दुरात्मनाम् ॥ ७ ॥
gopālaiḥ paśubhir manda trāsitaiḥ kim asattama mayi śāstari duṣṭānāṁ tvad-vidhānāṁ durātmanām
अर्थ: अरे मूढ़! अरे अधमतम! इन गोपों और पशुओं को डराकर तुझे क्या मिलेगा, जबकि तुझ जैसे दुष्ट और दुरात्माओं का शासन करने वाला मैं यहाँ उपस्थित हूँ? (स्कन्ध 10, अध्याय 36, श्लोक 7)

इतना कहकर अविनाशी प्रभु ने ताल ठोककर उस शब्द से असुर को और क्रुद्ध किया, और अपनी भुजंग-सी भुजा एक सखा के कन्धे पर रखकर निश्चिन्त खड़े हो गए। क्रोध से जलता अरिष्ट खुरों से धरती खोदता हुआ झपटा, और उसकी उठी हुई पूँछ से बादल छितरा गए।
सींगों की नोकें आगे किए, रक्त-लाल अपलक आँखों से तिरछी दृष्टि डालता वह इन्द्र के छोड़े वज्र के समान कृष्ण पर टूट पड़ा। प्रभु ने उसे सींगों से पकड़कर अठारह पग पीछे ऐसे ढकेल दिया जैसे एक गज दूसरे गज को हटा देता है। गिराया गया वह वृषभ तुरन्त उठा और पसीने से तर, हाँफता हुआ फिर झपटा।
तमापतन्तं स निगृह्य शृङ्गयो:
पदा समाक्रम्य निपात्य भूतले ।
निष्पीडयामास यथार्द्रमम्बरं
कृत्वा विषाणेन जघान सोऽपतत् ॥ १३ ॥
tam āpatantaṁ sa nigṛhya śṛṅgayoḥ padā samākramya nipātya bhū-tale niṣpīḍayām āsa yathārdram ambaraṁ kṛtvā viṣāṇena jaghāna so ‘patat
अर्थ: झपटते हुए उसे सींगों से पकड़कर प्रभु ने पैर से दबाया, भूमि पर पटका और गीले वस्त्र की भाँति निचोड़ दिया; फिर उसका सींग उखाड़कर उसी से प्रहार किया और वह गिर पड़ा। (स्कन्ध 10, अध्याय 36, श्लोक 13)
रक्त वमन करता, मल-मूत्र त्यागता, पैर पटकता और आँखें घुमाता वह असुर महान् पीड़ा भोगकर मृत्यु के धाम को चला गया; और देवताओं ने श्रीहरि पर पुष्पों की वर्षा करते हुए उनकी स्तुति की। इस प्रकार वृषभासुर का अन्त कर, अपने स्वजनों से प्रशंसित होकर, गोपियों के नयनों का उत्सव बने कृष्ण बलरामजी के साथ पुनः व्रज में प्रविष्ट हुए।
अरिष्ट का पतन व्रज के बाहर भी अनदेखा न रहा। दिव्य दृष्टि से सम्पन्न देवर्षि नारद कंस के पास पहुँचे और वह सब कह सुनाया जो वर्षों से उससे छिपा था — कि जो कन्या उसके हाथ से छूट गई थी वह वस्तुतः यशोदा की पुत्री थी; कि कृष्ण देवकी के ही पुत्र हैं; कि बलराम रोहिणी के पुत्र हैं; और कि भयभीत वसुदेव ने दोनों बालकों को अपने मित्र नन्द के पास रख दिया था — और इन्हीं दोनों ने उसके भेजे अनुचरों का अन्त किया है।

यह सुनते ही भोजराज कंस की इन्द्रियाँ क्रोध से काँप उठीं और उसने वसुदेव को मारने के लिए तीखी तलवार उठा ली। नारदजी ने उसे रोका; और उन्हीं से यह जानकर कि वसुदेव के वे दोनों पुत्र ही उसकी मृत्यु हैं, उसने वसुदेव और देवकी को फिर से लोहे की बेड़ियों में जकड़ दिया।
देवर्षि के लौट जाने पर कंस ने केशी को बुलाकर एक ही आदेश के साथ व्रज भेजा — बलराम और केशव का वध तुम्हारे हाथों हो। फिर उसने मुष्टिक, चाणूर, शल, तोशलक आदि प्रसिद्ध मल्लों को, तथा अपने मन्त्रियों और हस्तिपालों को बुलाकर अपनी योजना उनके सामने रखी।

उसने कहा, ‘मैंने सुना है कि आनकदुन्दुभि वसुदेव के दोनों पुत्र बलराम और कृष्ण नन्द के व्रज में रह रहे हैं, और उन्हीं के हाथों मेरी मृत्यु नियत है। वे यहाँ आएँ तो मल्लयुद्ध में तुम्हारे द्वारा मारे जाएँ। अखाड़े के चारों ओर भाँति-भाँति के मंच बनाए जाएँ, और नगर तथा जनपद के सब लोग इस द्वन्द्व को देखें।’ हस्तिपाल से उसने कहा, ‘हे भद्र! बलशाली कुवलयापीड को रंगभूमि के द्वार पर खड़ा करो और उसी से मेरे दोनों शत्रुओं का वध कराओ।’ साथ ही उसने आज्ञा दी कि आने वाली चतुर्दशी को विधिपूर्वक धनुर्यज्ञ आरम्भ हो, और पुरोहित वरदायक भगवान् शिव को यज्ञ-योग्य पशुओं की बलि दें।
सेवकों को आदेश देकर, अपना स्वार्थ साधने में निपुण उस राजा ने यदुश्रेष्ठ और वसुदेव के बन्धु अक्रूरजी को बुलाया। उनका हाथ अपने हाथ में लेकर वह मीठे स्वर में बोला, ‘हे दानपते! मेरे साथ यह मित्रता का काम कीजिए। भोज और वृष्णि वंश में आपसे अधिक माननीय और आपसे अधिक हितैषी मेरा कोई नहीं।’

अतस्त्वामाश्रित: सौम्य कार्यगौरवसाधनम् ।
यथेन्द्रो विष्णुमाश्रित्य स्वार्थमध्यगमद् विभु: ॥ २९ ॥
atas tvām āśritaḥ saumya kārya-gaurava-sādhanam yathendro viṣṇum āśritya svārtham adhyagamad vibhuḥ
अर्थ: इसलिए हे सौम्य! एक महान् कार्य की सिद्धि के साधन के रूप में मैं आपका आश्रय लेता हूँ, जैसे महान् इन्द्र ने भगवान् विष्णु का आश्रय लेकर अपना प्रयोजन सिद्ध किया था। (स्कन्ध 10, अध्याय 36, श्लोक 29)
गच्छ नन्दव्रजं तत्र सुतावानकदुन्दुभे: ।
आसाते ताविहानेन रथेनानय मा चिरम् ॥ ३० ॥
gaccha nanda-vrajaṁ tatra sutāv ānakadundubheḥ āsāte tāv ihānena rathenānaya mā ciram
अर्थ: नन्द के व्रज में जाइए, जहाँ वसुदेव के दोनों पुत्र रह रहे हैं, और उन्हें इस रथ पर बिठाकर बिना विलम्ब यहाँ ले आइए। (स्कन्ध 10, अध्याय 36, श्लोक 30)
राजा ने आगे कहा — विष्णु के शरणागत देवताओं ने उनमें छोटे के हाथों मेरी मृत्यु नियत कर रखी है; अतः उन्हें नन्द तथा गोपों सहित, नाना प्रकार की भेंटों के साथ ले आइए। यहाँ आते ही साक्षात् काल-सदृश मेरा गज उन्हें समाप्त कर देगा, और यदि वे उससे बच गए तो वज्र-सदृश मल्ल उन्हें नहीं छोड़ेंगे। दोनों भाइयों के मिट जाने पर वह वसुदेव आदि शोकग्रस्त वृष्णि, भोज और दशार्हों का, सिंहासन की आशा रखने वाले अपने वृद्ध पिता उग्रसेन का, उनके भाई देवक का और शेष सब शत्रुओं का नाश कर देगा, जिससे पृथ्वी निष्कण्टक हो जाए। जरासन्ध उसके लिए पिता तुल्य है, द्विविद उसका प्रिय मित्र, और शम्बर, नरक तथा बाण उसके सहयोगी; उन्हीं के बल पर वह देवपक्षीय राजाओं को हटाकर सारी पृथ्वी पर स्वयं राज्य करेगा। ‘यह सब जानकर भी वहाँ कुछ न कहिए, और उन दोनों किशोरों को शीघ्र ले आइए — धनुर्यज्ञ देखने और यदुपुरी की शोभा निहारने के बहाने’।
सारी योजना सुनकर अक्रूरजी ने वैसे ही उत्तर दिया जैसे कोई भक्त उस राजा को देता है जिसका हृदय वह बदल नहीं सकता।
राजन् मनीषितं सध्र्यक् तव स्वावद्यमार्जनम् ।
सिद्ध्यसिद्ध्यो: समं कुर्याद्दैवं हि फलसाधनम् ॥ ३८ ॥
rājan manīṣitaṁ sadhryak tava svāvadya-mārjanam siddhy-asiddhyoḥ samaṁ kuryād daivaṁ hi phala-sādhanam
अर्थ: हे राजन्! अपने ऊपर आए संकट को दूर करने की आपकी योजना सुविचारित है। फिर भी मनुष्य को सिद्धि और असिद्धि में समान रहना चाहिए, क्योंकि फल का साधन तो दैव ही है। (स्कन्ध 10, अध्याय 36, श्लोक 38)
उन्होंने जोड़ा — मनुष्य ऊँचे मनोरथ बाँधता है, चाहे दैव उन्हें पहले ही काट चुका हो, और इसी से वह हर्ष और शोक में झूलता रहता है; फिर भी मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
इस अध्याय में दो हृदय एक ही समाचार सुनते हैं और परस्पर विपरीत उत्तर देते हैं। नारदजी राजा को स्पष्ट बता देते हैं कि वे बालक किसके पुत्र हैं और किसकी मृत्यु बनकर आए हैं; और वह राजा उसी ज्ञान को लेकर मल्ल तैयार करता है, द्वार पर गज खड़ा करता है, यज्ञ की आज्ञा देता है और रथ भेजता है — प्रभु का सत्य उन्हीं के विरुद्ध यन्त्र बन जाता है। अक्रूरजी वही योजना सुनकर चुपचाप दैव को उससे ऊपर रख देते हैं, क्योंकि किसी भी प्रयत्न का फल छीना नहीं जाता, दिया जाता है। और यह योजना देने में ही पलट जाती है: जो रथ दो बालकों को मृत्यु तक लाने भेजा जा रहा है, वही रथ स्वयं प्रभु को उस नगर में ले आएगा जिसका राजा उनसे थरथराता है।
एवमादिश्य चाक्रूरं मन्त्रिणश्च विसृज्य स: ।
प्रविवेश गृहं कंसस्तथाक्रूर: स्वमालयम् ॥ ४० ॥
evam ādiśya cākrūraṁ mantriṇaś ca visṛjya saḥ praviveśa gṛhaṁ kaṁsas tathākrūraḥ svam ālayam
अर्थ: इस प्रकार अक्रूरजी को आदेश देकर और मन्त्रियों को विदा कर कंस अपने अन्तःपुर में चला गया, और अक्रूरजी भी अपने घर लौट गए। (स्कन्ध 10, अध्याय 36, श्लोक 40)
1. पुकार पहले, रक्षा उसके पीछे। व्रजवासियों के पास न शस्त्र था, न कोई उपाय; उन्होंने बस उनका नाम पुकारा और दौड़ पड़े। शरण असहायों का अन्तिम उपाय नहीं, प्रेमी हृदय की सहज गति है।
2. प्रभु स्वयं दुष्टों के शासक हैं। ‘मैं शास्ता यहाँ हूँ’ — वे असुर से कहते हैं (श्लोक 7)। जो हाथ वंशी उठाते हैं वही क्रूरता को रोकते भी हैं: सौम्य की रक्षा और हिंसक का दमन दो काम नहीं, एक ही काम हैं।
3. निर्बल को डराने वाला बल पहले ही टूट चुका है। गौओं और स्त्रियों को भयभीत करने वाला वह वृषभ गीले वस्त्र की तरह निचोड़ दिया गया (श्लोक 13)। धर्महीन शक्ति कितनी ही गरजे, प्रभु के सामने उसका कोई आधार नहीं।
4. सत्य सुन लेना और उसे स्वीकार कर लेना एक नहीं। कंस को ठीक-ठीक बता दिया गया कि कृष्ण कौन हैं, और उसने उसी से अपने षड्यन्त्र तेज कर लिए। प्रभु का समाचार तभी कृपा बनता है जब विनम्रता से ग्रहण हो।
5. कर्म करें, फल उन्हें सौंप दें। सिद्धि-असिद्धि में समता का अक्रूरजी का वचन (श्लोक 38) इस अध्याय का शान्त केन्द्र है: करना हमारा है, फल किसी ऊँचे हाथ में है।
क्षण भर उसी स्थान पर खड़े होकर देखिए जहाँ गोप खड़े थे — भयभीत गौओं के बीच, धूल में से कुछ विकराल आता हुआ, और भरोसे के लिए केवल एक बालक जो कहता है, ‘डरो मत।’ भक्त की स्थिति भी यही है। हम बलवान् नहीं, हमारी रक्षा-पंक्तियाँ पतली हैं, और जो हमें डराता है वह प्रायः हमसे बड़ा होता है; फिर भी प्रभु हमसे कभी बलवान् होने को नहीं कहते। वे केवल अपने पास आने को कहते हैं, और फिर स्वयं हमारे और हमारे भय के बीच आ खड़े होते हैं। मथुरा जीने का दूसरा ढंग दिखाती है। वहाँ एक राजा के पास भगवान् के विषय में उतनी जानकारी है जितनी व्रज में किसी के पास नहीं, और उससे उसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती — केवल निद्राहीन गणनाएँ, और पहरे, और सन्धियाँ। समर्पण बिना थामा गया सत्य भय बन जाता है; वही सत्य प्रेम में थामा जाए तो आश्रय बन जाता है। हम उनमें गिने जाएँ जो उनकी ओर दौड़ते हैं, न कि उनमें जो उनके विरुद्ध हिसाब लगाते हैं।
आज एक काम चुनिए — कार्यालय का, घर का या सेवा का — और उसे पूरे मन से करते हुए उसके फल को छोड़ दीजिए, परिणाम प्रभु को अर्पित करते हुए, जैसे अक्रूरजी ने अपना कार्य अर्पित किया। और दिन ढलने से पहले यदि कोई बात डराए, तो वही कीजिए जो गोपों ने किया था: किसी योजना तक पहुँचने से पहले नाम पुकारिए। दिन का आरम्भ और अन्त धीरे-धीरे इस जप से कीजिए: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
यह अध्याय दो चित्र साथ-साथ रखता है: गौएँ चराते एक बालक के हाथों टूटता एक असुर-वृषभ, और रत्नजटित सभा में उसी बालक के विरुद्ध मल्ल, गज और रथ जुटाता एक राजा। एक दृश्य स्वर्ग से बरसते पुष्पों में पूर्ण होता है, दूसरा अपने भय को साथ लिए अन्तःपुर में लौटते मनुष्य पर। इन दोनों के बीच अक्रूरजी खड़े हैं, जो जानते हैं कि हर प्रयत्न का फल षड्यन्त्र नहीं, दैव देता है। हम उनसे फल को न पकड़ने वाला कर्म सीखें, और व्रजवासियों से उस प्रभु की ओर सीधा दौड़ना जो कहते हैं, ‘डरो मत।’
श्रीमद्भागवतम् का दिव्य ज्ञान हमारे हृदयों में शुद्ध भक्ति जगाए।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
जय श्री माधव।
यह लेखक के अपने शब्दों में एक मौलिक, श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन है, जिसमें संक्षिप्त उद्धृत श्लोक देवनागरी एवं लिप्यन्तरण सहित दिए गए हैं और उनके अर्थ सारांश रूप में प्रस्तुत हैं। यह किसी एक प्रकाशक के सतत अनुवाद या टीका का पुनरुत्पादन नहीं है। किसी प्रकाशक के संबंध या समर्थन का दावा नहीं किया गया है।
जय श्री माधव
यह श्रृंखला प्रतिदिन आगे बढ़ती है — पूज्य पंडित डॉ. श्री काशीनाथ मिश्र के मार्गदर्शन में, शास्त्र के क्रम में।