श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10, अध्याय 53: कुण्डिनपुर तक कृष्ण की रात्रि-यात्रा, रुक्मिणी की व्याकुल प्रतीक्षा, अम्बिका से उनकी प्रार्थना, और राजाओं के सामने प्रभु द्वारा उनका हरण।
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आनर्त से विदर्भ तक एक ही रात की यात्रा, और एक राजकुमारी जिसने देवी से कृष्ण के सिवा कुछ न माँगा — यह वह दिन है जब हज़ार राजाओं के देखते-देखते प्रभु रुक्मिणी को लेने आए।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद्भागवतम् विज़्डम में पुनः स्वागत है — श्रीमद्भागवत महापुराण की पवित्र कथाओं और शिक्षाओं की हमारी भक्तिमयी यात्रा। दशम स्कन्ध के इस त्रिपञ्चाशवें अध्याय में शुकदेवजी राजा परीक्षित को सुनाते हैं कि कृष्ण ने रुक्मिणी के सन्देश का क्या उत्तर दिया और शत्रु राजाओं के सामने ही उन्हें अपने रथ पर कैसे बिठा लिया।
अध्याय 52 में विदर्भराज भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी ने कृष्ण के गुण सुनकर उन्हें ही पति रूप में वरण कर लिया था। जब उनके बड़े भाई रुक्मी ने उन्हें शिशुपाल को देने का निश्चय किया, तो उन्होंने गुप्त रूप से एक विश्वस्त ब्राह्मण को द्वारका भेजा — यह प्रार्थना लेकर कि प्रभु विवाह से पूर्व अम्बिका-मन्दिर की यात्रा के समय आकर उन्हें ले जाएँ।
ब्राह्मण ने रुक्मिणी का सन्देश सुनाया तो यदुनन्दन श्रीकृष्ण खुलकर हँस पड़े, ब्राह्मण का हाथ अपने हाथ में लेकर स्नेह से दबाया और बोले — “मेरा मन भी उसी में लगा है और रात को मुझे नींद नहीं आती। मैं जानता हूँ कि रुक्मी ने मुझसे द्वेष के कारण यह विवाह रोका है।” फिर प्रभु ने अपना संकल्प कहा।
तामानयिष्य उन्मथ्य राजन्यापसदान् मृधे ।
मत्परामनवद्याङ्गीमेधसोऽग्निशिखामिव ॥ ३ ॥
tām ānayiṣya unmathya rājanyāpasadān mṛdhe mat-parām anavadyāṅgīm edhaso ‘gni-śikhām iva
अर्थ: युद्ध में उन नीच राजाओं को मथकर मैं उस निर्दोष अंगों वाली, मुझमें मन लगाए हुए राजकुमारी को वैसे ही ले आऊँगा, जैसे लकड़ी से अग्नि की शिखा निकाल ली जाती है। (स्कन्ध 10, अध्याय 53, श्लोक 3)
ब्राह्मण से यह जानकर कि विवाह किस नक्षत्र में होना है, कृष्ण ने अपने सारथि से कहा — “दारुक, तुरन्त रथ जोतो।” दारुक शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक — इन चार घोड़ों से जुता रथ ले आया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। कृष्ण रथ पर चढ़े, ब्राह्मण को भी साथ बिठाया, और उन तेज़ घोड़ों से आनर्त देश से विदर्भ तक की पूरी दूरी एक ही रात में पार कर ली।

इधर राजा भीष्मक पुत्र-स्नेह के वश उसकी इच्छा मानकर अपनी कन्या शिशुपाल को देने की तैयारी कर रहे थे और विवाह-पूर्व के मंगल कृत्य करवा चुके थे। नगर की सड़कें और चौराहे झाड़-बुहारकर जल से सींचे गए, रंग-बिरंगी पताकाएँ और तोरण सजाए गए, महल अगर की धूप से सुगन्धित थे, और नगरवासी चन्दन, मालाओं, श्वेत वस्त्रों और आभूषणों से सजे थे।
भीष्मक ने विधिपूर्वक पितरों और देवताओं का पूजन किया, ब्राह्मणों को भोजन कराया और पुत्री के मंगल के लिए स्वस्तिवाचन करवाया। रुक्मिणी को स्नान कराकर बीच में सोने के मनके वाला मंगलसूत्र, नया रेशमी जोड़ा और सुन्दर आभूषण पहनाए गए। श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने साम, ऋक् और यजुर्वेद के मन्त्रों से वधू की रक्षा की, और अथर्ववेद के ज्ञाता पुरोहित ने ग्रह-शान्ति के लिए अग्नि में आहुतियाँ दीं। राजा ने ब्राह्मणों को सोना, चाँदी, वस्त्र, गुड़ मिले तिल और गौएँ दान कीं।

चेदिराज दमघोष ने भी अपने पुत्र शिशुपाल के लिए सब मंगल कृत्य करवाए और मदमत्त हाथियों, सोने की मालाओं से सजे रथों, पैदल और घुड़सवार सेना के साथ कुण्डिनपुर की ओर चल पड़े। भीष्मक ने आगे जाकर सम्मानपूर्वक उनका स्वागत किया और बरात के लिए बने एक अलग भवन में उन्हें ठहराया।
शाल्व, जरासन्ध, दन्तवक्र, विदूरथ, पौण्ड्रक तथा कृष्ण और बलराम से बैर रखने वाले अन्य राजा शिशुपाल के पक्ष में हज़ारों की संख्या में कुण्डिनपुर आ पहुँचे। उन्होंने तय कर रखा था कि यदि कृष्ण बलराम और यादवों के साथ कन्या हरने आए तो सब मिलकर उनसे लड़ेंगे, और हर कोई पूरी सेना लेकर आया था।
बलराम ने यह गठबन्धन सुना, और यह भी कि कृष्ण अकेले निकले हैं। युद्ध की आशंका और भाई के प्रति प्रेम से विह्वल होकर वे हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना की विशाल वाहिनी लेकर तुरन्त कुण्डिनपुर की ओर चल पड़े।
महल के अन्तःपुर में रुक्मिणी श्रीहरि के आने की बाट जोह रही थीं, पर ब्राह्मण के लौटने का कोई चिह्न न था। भीष्मक की सुन्दरी पुत्री भय से मन-ही-मन सोचने लगीं।
अहो त्रियामान्तरित उद्वाहो मेऽल्पराधस: ।
नागच्छत्यरविन्दाक्षो नाहं वेद्म्यत्र कारणम् ।
सोऽपि नावर्ततेऽद्यापि मत्सन्देशहरो द्विज: ॥ २३ ॥
aho tri-yāmāntarita udvāho me ‘lpa-rādhasaḥ nāgacchaty aravindākṣo nāhaṁ vedmy atra kāraṇam so ‘pi nāvartate ‘dyāpi mat-sandeśa-haro dvijaḥ
अर्थ: हाय! मुझ अल्पभाग्या के विवाह में अब केवल एक रात शेष है। कमलनयन प्रभु नहीं आए, और इसका कारण मैं नहीं जानती; मेरा सन्देश ले जाने वाला ब्राह्मण भी अब तक नहीं लौटा। (स्कन्ध 10, अध्याय 53, श्लोक 23)
शायद, उन्होंने सोचा, निर्दोष प्रभु ने मुझमें कोई दोष देख लिया है और चलने को तैयार होकर भी अब नहीं आ रहे — इसीलिए ब्राह्मण भी हताश होकर धीरे-धीरे लौट रहा होगा। उन्हें लगा कि न ब्रह्मा उन पर प्रसन्न हैं, न शिव, न ही गिरिराज-कन्या, शिव की सती पत्नी गौरी। गोविन्द में मन खोए हुए उस किशोरी राजकुमारी ने अपनी अश्रुपूर्ण आँखें मूँद लीं, क्योंकि वह जानती थीं कि मंगल-बेला रोने का समय नहीं है।

वे प्रतीक्षा ही कर रही थीं कि उनकी बाईं जाँघ, बाईं भुजा और बाईं आँख फड़कने लगीं — ऐसे लक्षण जो प्रिय समाचार की सूचना देते हैं।
तभी कृष्ण द्वारा अपने आगमन की सूचना देने भेजे गए वह ब्राह्मण अन्तःपुर में पहुँचे और राजकुमारी को तेजस्विनी रूप में देखा। उनके प्रसन्न मुख और दृढ़ चाल से सब समझकर रुक्मिणी मुस्कुराईं और उनसे पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि कृष्ण आ गए हैं, और प्रभु का यह दृढ़ वचन भी सुनाया कि वे उन्हें अपनी वधू बनाकर ले जाएँगे। रुक्मिणी का हृदय उमड़ आया; ऐसे दूत को देने योग्य अपने पास कुछ न पाकर उन्होंने उन्हें प्रणाम किया।
भीष्मक ने सुना कि बलराम और कृष्ण विवाह देखने आए हैं, तो वे वाद्यों और पूजा-सामग्री के साथ उनकी अगवानी को निकले। उन्होंने मधुपर्क, नए वस्त्र और उपहार अर्पित किए, विधिपूर्वक उनका पूजन किया और उन्हें सेना सहित सब सुविधाओं से युक्त भवन में ठहराया। आए हुए सब राजाओं का भी उन्होंने पराक्रम, आयु, बल और वैभव के अनुसार यथोचित सत्कार किया।
कृष्ण के आने की बात सुनकर कुण्डिनपुर के लोग उनके दर्शन को निकल पड़े।
कृष्णमागतमाकर्ण्य विदर्भपुरवासिन: ।
आगत्य नेत्राञ्जलिभि: पपुस्तन्मुखपङ्कजम् ॥ ३६ ॥
kṛṣṇam āgatam ākarṇya vidarbha-pura-vāsinaḥ āgatya netrāñjalibhiḥ papus tan-mukha-paṅkajam
अर्थ: कृष्ण के आगमन का समाचार सुनकर विदर्भपुर के निवासी आए और अपने नेत्रों की अंजलि से उनके मुख-कमल का पान करने लगे। (स्कन्ध 10, अध्याय 53, श्लोक 36)
“रुक्मिणी ही इनकी पत्नी होने योग्य है,” वे आपस में कहने लगे, “और निर्दोष रूप वाले ये ही भीष्मक-कन्या के योग्य वर हैं। हमने जो भी थोड़ा-सा पुण्य किया हो, उससे प्रसन्न होकर त्रिलोक के रचयिता हम पर कृपा करें और अच्युत ही विदर्भ-राजकुमारी का पाणिग्रहण करें।” रुक्मिणी के प्रति गहरे स्नेह में बँधे नगरवासी यों कह रहे थे।
फिर वधू सैनिकों के पहरे में अन्तःपुर से निकलीं और रथ पर देवी अम्बिका के मन्दिर की ओर चलीं। द्वार पर उतरकर वे भवानी के कोमल चरणों के दर्शन के लिए पैदल आगे बढ़ीं।
पद्भ्यां विनिर्ययौ द्रष्टुं भवान्या: पादपल्लवम् ।
सा चानुध्यायती सम्यङ्मुकुन्दचरणाम्बुजम् ॥ ४० ॥
padbhyāṁ viniryayau draṣṭuṁ bhavānyāḥ pāda-pallavam sā cānudhyāyatī samyaṅ mukunda-caraṇāmbujam
अर्थ: वे भवानी के पल्लव-से कोमल चरणों के दर्शन के लिए पैदल चलीं, और इस बीच पूरी तरह मुकुन्द के चरण-कमलों का ध्यान करती रहीं। (स्कन्ध 10, अध्याय 53, श्लोक 40)
वे मौन-व्रत धारण किए चल रही थीं; माता और कुलवृद्धाएँ साथ थीं, सखियाँ चारों ओर थीं, और कवच पहने, शस्त्र उठाए राजा के वीर सैनिक रक्षा कर रहे थे। मृदंग, शंख, पणव और तुरही बज रहे थे। पूजा-सामग्री लिए हज़ारों नर्तकियाँ, मालाओं और रत्नों से सजी ब्राह्मण-पत्नियाँ, गायक-वादक, और उनका यश गाते सूत, मागध और वन्दी — सब वधू के साथ चल रहे थे।
मन्दिर पहुँचकर रुक्मिणी ने अपने कर-कमल और चरण धोए, आचमन किया और शुद्ध, शान्त चित्त से अम्बिका के समक्ष प्रवेश किया। विधि जानने वाली वृद्ध ब्राह्मण-स्त्रियों ने उनसे भव अर्थात् शिव सहित भवानी को प्रणाम करवाया; और राजकुमारी ने प्रार्थना की।
नमस्ये त्वाम्बिकेऽभीक्ष्णं स्वसन्तानयुतां शिवाम् ।
भूयात् पतिर्मे भगवान् कृष्णस्तदनुमोदताम् ॥ ४६ ॥
namasye tvāmbike ‘bhīkṣṇaṁ sva-santāna-yutāṁ śivām bhūyāt patir me bhagavān kṛṣṇas tad anumodatām
अर्थ: हे अम्बिके, हे कल्याणमयी माता, अपनी सन्तानों सहित आपको मैं बार-बार प्रणाम करती हूँ। भगवान् कृष्ण मेरे पति हों; आप इसका अनुमोदन करें। (स्कन्ध 10, अध्याय 53, श्लोक 46)
फिर उन्होंने जल, चन्दन, अक्षत, धूप, वस्त्र, मालाओं, आभूषणों, नैवेद्य और दीपमालाओं से देवी और उनके परिवार की पूजा की, और उन्हीं सामग्रियों के साथ नमकीन पकवान, पान, मंगलसूत्र, फल और ईख चढ़ाकर सौभाग्यवती ब्राह्मण-स्त्रियों का सत्कार किया। उन स्त्रियों ने देवी को चढ़ी सामग्री का अंश और आशीर्वाद दिया। रुक्मिणी ने उन्हें और देवी को प्रणाम किया, प्रसाद ग्रहण किया और मौन तोड़कर, रत्नजड़ित अँगूठियों से दमकते अपने हाथ से एक सखी का हाथ थामे मन्दिर से बाहर आईं।

वे बाहर आईं तो वहाँ जुटे वीरों ने उन्हें देखा — कुण्डलों से सुशोभित मुख, उज्ज्वल मुस्कान, हंसिनी-सी चाल, झनकते नूपुर — और वे ऐसे मोहित हो गए मानो प्रभु की ही मोहिनी माया के सामने हों। उनकी मृदु मुस्कान और लजीली चितवन से मन हर लिए गए राजाओं के हाथ से शस्त्र छूट गए और वे हाथियों, रथों और घोड़ों से स्तब्ध होकर गिर पड़े। परन्तु इस यात्रा के बहाने वे अपना सौन्दर्य केवल श्रीहरि को ही अर्पित कर रही थीं। कमल-कली से कोमल चरण धीरे-धीरे बढ़ाती, प्रभु की राह देखती, बाएँ हाथ से अलकें हटाकर उन्होंने लजाते हुए आए राजाओं पर दृष्टि डाली — और अच्युत को देख लिया।
तां राजकन्यां रथमारुरुक्षतीं जहार कृष्णो द्विषतां समीक्षताम् ।
रथं समारोप्य सुपर्णलक्षणं राजन्यचक्रं परिभूय माधव: ॥ ५५ ॥
ततो ययौ रामपुरोगम: शनै: शृगालमध्यादिव भागहृद्धरि: ॥ ५६ ॥
tāṁ rāja-kanyāṁ ratham ārurukṣatīṁ jahāra kṛṣṇo dviṣatāṁ samīkṣatām rathaṁ samāropya suparṇa-lakṣaṇaṁ rājanya-cakraṁ paribhūya mādhavaḥ tato yayau rāma-purogamaḥ śanaiḥ śṛgāla-madhyād iva bhāga-hṛd dhariḥ
अर्थ: राजकुमारी ज्यों ही अपने रथ पर चढ़ने को हुईं, कृष्ण ने शत्रुओं के देखते-देखते उन्हें हर लिया। उन्हें गरुड़-चिह्न वाले अपने रथ पर बिठाकर और समस्त राजमण्डल का तिरस्कार कर माधव बलराम को आगे किए धीरे-धीरे वैसे ही चल दिए, जैसे सिंह सियारों के बीच से अपना भाग ले जाता है। (स्कन्ध 10, अध्याय 53, श्लोक 55–56)
जरासन्ध आदि अभिमानी राजा इस पराजय और यश के नाश को सह न सके। श्लोक 57 में वे आपस में कहते हैं — “धिक्कार है हमें! धनुष हाथ में रहते भी हमारा यश ग्वालों ने वैसे ही छीन लिया, जैसे सिंहों का यश हिरन छीन लें।”
1. प्रभु प्रेम का उत्तर प्रेम से देते हैं। रुक्मिणी ने लिखा था कि उनका मन प्रभु में लगा है; श्लोक 2 में प्रभु उत्तर देते हैं कि उनका मन भी उसी में लगा है और उन्हें नींद नहीं आती। कृष्ण के लिए आत्मा की तड़प का उत्तर आत्मा के लिए उनकी तड़प से मिलता है।
2. जो उनका है, उसे कोई रोक नहीं सकता। प्रभु रुक्मिणी को मत्परा — अपने में मन लगाए हुई — कहते हैं और वचन देते हैं कि वे उन्हें लकड़ी से अग्नि की तरह निकाल लाएँगे। रुक्मी का षड्यन्त्र और जरासन्ध का गठबन्धन लकड़ी हैं; वे ज्वाला को रोक नहीं सकते।
3. श्रद्धा काँपकर भी श्रद्धा रहती है। रुक्मिणी की सन्देह-भरी रात बिना किसी भर्त्सना के लिखी गई है; मंगल-बेला में न रोने का उनका संयम और मुकुन्द के चरणों का अटूट ध्यान उन्हें पार लगाता है।
4. पूरी पूजा, एक प्रार्थना। अम्बिका के मन्दिर में रुक्मिणी पूरा विधान सावधानी से करती हैं, पर माँगती केवल एक वस्तु हैं — कृष्ण उनके पति हों। समस्त देव-परिवार का सम्मान करें; एक ही कामना को केन्द्र में रखें।
5. कथा के भीतर प्रभु की योजना। जो कृष्ण संकल्प-मात्र से सब कुछ कर सकते थे, वे रात भर अकेले रथ क्यों दौड़ाते हैं, भीष्मक का मधुपर्क क्यों स्वीकारते हैं और हर शत्रु राजा के सामने रुक्मिणी को रथ पर क्यों बिठाते हैं? श्लोक 31 का संकेत है कि रुक्मिणी स्वयं लक्ष्मी हैं; प्रभु अपनी नित्य संगिनी को वापस ले रहे हैं, और यह खुले में करते हैं ताकि राजा, नगरवासी और आगे का हर श्रोता देख ले कि जो स्वयं को पूर्णतः उन्हें सौंप देता है, उसे संसार के देखते-देखते उनके रथ पर बिठा लिया जाता है।
जिसने कभी भगवान् की प्रतीक्षा की है, उसके लिए इस अध्याय में एक विशेष कोमलता है। रुक्मिणी ने सब ठीक किया: प्रभु को चुना, सन्देश भेजा, ब्राह्मण पर भरोसा किया। फिर भी विवाह से पहले की रात उन्हें अकेली पाती है, यह सोचती हुई कि वे क्यों न आएँ। हम वह जानते हैं जो वे नहीं जानतीं — कि उनका पत्र सुनकर वे हँसे थे, कि उन्हें नींद नहीं आई, कि उनके घोड़े विदर्भ की राह पहले ही नाप रहे थे। रुक्मिणी के भय और प्रभु की उत्कण्ठा के बीच की दूरी वही है जिसमें हर भक्त अपने अँधेरे क्षण में खड़ा होता है, और अध्याय इसके लिए उन्हें डाँटता नहीं। हम भी उनकी प्रतीक्षा का ढंग सीखें: मौन रखें, ध्यान रखें, मन्दिर की ओर चलते रहें, और भरोसा रखें कि जिसकी हमें चाह है, वह पहले ही राह पर है।
आज अपनी एक अनुत्तरित प्रार्थना प्रभु के सामने वैसे ही रखें जैसे रुक्मिणी ने अम्बिका के सामने रखी: अपनी नित्य पूजा पूरी और बिना जल्दबाज़ी के करें, फिर जो आपका हृदय सबसे अधिक चाहता है वह एक वाक्य में माँगें और वहीं छोड़ दें। जब भी चिन्ता लौटे, ब्राह्मण का सन्देश याद करें — प्रभु आ चुके हैं और वचन दे चुके हैं — और जपें: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
दशम स्कन्ध का यह त्रिपञ्चाशवाँ अध्याय रुक्मिणी के पत्र को उसके उत्तर तक पहुँचाता है। द्वारका में कृष्ण की हँसी कुण्डिनपुर तक की रात्रि-यात्रा बन जाती है; वधू का सन्देह शुभ समाचार को मार्ग देता है; अम्बिका से उनकी प्रार्थना सुनी जाती है; और प्रभु, बिना हड़बड़ी और बिना रोक-टोक, जरासन्ध के गठबन्धन के देखते-देखते उन्हें अपने गरुड़-ध्वज रथ पर बिठा लेते हैं। एक सत्य सबको बाँधता है: जो हृदय कृष्ण में लग गया, वह उनका हो चुका, और उसे अपना बनाने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता।
श्रीमद्भागवतम् का दिव्य ज्ञान हमारे हृदयों में शुद्ध भक्ति जगाए।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
जय श्री माधव।
यह लेखक के अपने शब्दों में एक मौलिक, श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन है, जिसमें संक्षिप्त उद्धृत श्लोक देवनागरी एवं लिप्यन्तरण सहित दिए गए हैं और उनके अर्थ सारांश रूप में प्रस्तुत हैं। यह किसी एक प्रकाशक के सतत अनुवाद या टीका का पुनरुत्पादन नहीं है। किसी प्रकाशक के संबंध या समर्थन का दावा नहीं किया गया है।
जय श्री माधव
यह श्रृंखला प्रतिदिन आगे बढ़ती है — पूज्य पंडित डॉ. श्री काशीनाथ मिश्र के मार्गदर्शन में, शास्त्र के क्रम में।