श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10, अध्याय 58: इन्द्रप्रस्थ में पाण्डवों से भेंट, यमुना-तट पर कालिन्दी, सत्या के लिए सात बैलों का दमन, और पाँच राजकुमारियों से विवाह।
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जिन सात उन्मत्त बैलों ने राजकुमारों के अंग तोड़ डाले थे, उन्हें अयोध्या के राजांगण में काठ के खिलौनों की भाँति खींचा जा रहा है — और नग्नजित् की पुत्री अपने सामने उन्हीं प्रभु को वर रूप में खड़ा देखती है जिनके लिए उसने व्रत किया था।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद्भागवतम् विज़्डम में पुनः स्वागत है — श्रीमद्भागवत महापुराण की पवित्र कथाओं और शिक्षाओं की हमारी भक्तिमयी यात्रा। दशम स्कन्ध के इस अट्ठावनवें अध्याय में श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ में पाण्डवों के साथ वर्षा-ऋतु बिताते हैं; फिर कालिन्दी, मित्रविन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा के विवाह आते हैं, जिनमें प्रभु उन हृदयों द्वारा जीते जाने देते हैं जो केवल उन्हीं पर टिके थे।
शुकदेवजी ने परीक्षित से कहा — एक बार श्रीकृष्ण सात्यकि आदि साथियों के साथ इन्द्रप्रस्थ गए, लाक्षागृह से सकुशल निकले पाण्डुपुत्रों को देखने। सर्वेश्वर मुकुन्द को द्वार पर आया देख पृथा के वीर पुत्र एक साथ उठ खड़े हुए, जैसे प्राण लौटने पर इन्द्रियाँ जाग उठती हैं। अच्युत के आलिंगन-स्पर्श से उनके शेष पाप मिट गए, और स्नेहभरी मुस्कान से दमकते उनके मुख को निहारकर वे आनन्द से भर उठे।
श्रीकृष्ण ने अपने से बड़े युधिष्ठिर और भीम के चरणों में प्रणाम किया, अर्जुन को हृदय से लगाया, और नकुल-सहदेव का अभिवादन स्वीकार किया। तब द्रौपदी — जिनका नाम भी कृष्णा था, निर्दोष, नवविवाहिता और कुछ लजाती हुई — श्रेष्ठ आसन पर विराजमान प्रभु के पास धीरे-धीरे आईं और प्रणाम किया। सात्यकि और अन्य साथी भी आदर पाकर चारों ओर बैठ गए।

फिर प्रभु अपनी बुआ पृथा, अर्थात् कुन्ती के पास गए और उन्हें प्रणाम किया; कुन्ती ने स्नेह से भीगी आँखों के साथ उन्हें गले लगाया। उन्होंने बुआ और पुत्रवधू का कुशल पूछा, और कुन्ती ने सभी स्वजनों का हाल जाना।
पुराने कष्टों को स्मरण करती कुन्ती का कण्ठ प्रेम से रुँध गया और आँखें भर आईं; वे उन प्रभु से बोलीं जिनका दर्शन ही क्लेशों का अन्त कर देता है। “हे कृष्ण, जिस क्षण आपने हमें याद कर मेरे भाई अक्रूर को भेजा, उसी क्षण हमारा कल्याण हुआ और हम सनाथ हो गए।” फिर उन्होंने वे शब्द कहे जिन्हें हर भक्त हृदय में सँजोता है।
न तेऽस्ति स्वपरभ्रान्तिर्विश्वस्य सुहृदात्मनः ।
तथापि स्मरतां शश्वत् क्लेशान् हंसि हृदि स्थितः ॥ १० ॥
na te ‘sti sva-para-bhrāntir viśvasya suhṛd-ātmanaḥ tathāpi smaratāṁ śaśvat kleśān haṁsi hṛdi sthitaḥ
अर्थ: विश्व के सुहृद् और आत्मा आपमें “अपना” और “पराया” का भ्रम नहीं है; फिर भी जो आपका निरन्तर स्मरण करते हैं, उनके हृदय में स्थित होकर आप उनके क्लेशों का नाश कर देते हैं। (स्कन्ध 10, अध्याय 58, श्लोक 10)
युधिष्ठिर भी अपने सौभाग्य पर विस्मित थे — उन्होंने पूछा कि हम मन्दबुद्धियों ने ऐसा कौन-सा पुण्य किया कि योगेश्वरों के लिए भी दुर्लभ-दर्शन प्रभु हमारी आँखों के सामने आ गए। राजा के आग्रह पर प्रभु प्रसन्नतापूर्वक वर्षा के चारों मास वहीं रहे, और इन्द्रप्रस्थवासियों के नेत्र उनके दर्शन से तृप्त होते रहे।
एक दिन अर्जुन कवच पहनकर, गाण्डीव धनुष और दो अक्षय तूणीर लेकर, कपिध्वज रथ पर चढ़े और श्रीकृष्ण को साथ लेकर वन में आखेट के लिए गए। वहाँ उन्होंने बाघ, वराह, वनभैंसे, मृग, गैंडे, खरगोश और साही मारे; यज्ञ-योग्य पशु राजा युधिष्ठिर के पास पहुँचाए गए, क्योंकि पूर्णिमा निकट थी। प्यासे और थके अर्जुन यमुना-तट पर आए, जहाँ दोनों कृष्णों ने स्नान कर उसका निर्मल जल पिया।
वहीं तट पर उन्होंने एक सुन्दर कन्या को अकेले विचरते देखा। अपने दिव्य सखा के भेजने पर अर्जुन उस सुन्दर दाँतों और मनोहर मुख वाली कन्या के पास गए और पूछा: “तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो, कहाँ से आई हो और यहाँ क्या करना चाहती हो? मुझे लगता है तुम पति की खोज में हो — हे कल्याणी, सब कुछ कहो।”

कन्या ने उत्तर दिया कि वह तेजस्वी सूर्यदेव की पुत्री है और वरदायक भगवान् विष्णु को पति रूप में पाने की इच्छा से कठोर तप कर रही है।
नान्यं पतिं वृणे वीर तमृते श्रीनिकेतनम् ।
तुष्यतां मे स भगवान् मुकुन्दोऽनाथसंश्रयः ॥ २१ ॥
nānyaṁ patiṁ vṛṇe vīra tam ṛte śrī-niketanam tuṣyatāṁ me sa bhagavān mukundo ‘nātha-saṁśrayaḥ
अर्थ: हे वीर, श्री के निकेतन उन प्रभु को छोड़कर मैं किसी और को पति नहीं चुनूँगी; अनाथों के आश्रय वे भगवान् मुकुन्द मुझ पर प्रसन्न हों। (स्कन्ध 10, अध्याय 58, श्लोक 21)
“मेरा नाम कालिन्दी है,” उसने आगे कहा, “मेरे पिता ने यमुना के जल में मेरे लिए एक भवन बनवाया है; जब तक उन अच्युत के दर्शन न हों, मैं वहीं रहूँगी।” अर्जुन ने श्रीकृष्ण को बताया, जो पहले से जानते थे; प्रभु उसे रथ पर बिठाकर युधिष्ठिर के पास लौट आए।
यहाँ शुकदेवजी ने स्मरण कराया कि प्रभु ने पाण्डवों की कितनी सेवा की थी। उनके कहते ही उन्होंने विश्वकर्मा से वह अद्भुत नगर बनवाया था, और वहाँ रहते हुए खाण्डव वन अग्निदेव को अर्पित करते समय वे अर्जुन के सारथि बने थे। प्रसन्न अग्निदेव ने अर्जुन को गाण्डीव, चार श्वेत अश्वों वाला रथ, दो अक्षय तूणीर और अभेद्य कवच दिया; और दावानल से बचाए गए मय दानव ने अर्जुन के लिए वह सभा बनाई जिसमें एक दिन दुर्योधन जल को स्थल और स्थल को जल समझ बैठेगा।
वर्षा बीतने पर श्रीकृष्ण अर्जुन, युधिष्ठिर और अन्य प्रियजनों से विदा लेकर द्वारका लौट आए। फिर जिस दिन नक्षत्र, ग्रह और ऋतु सब अनुकूल थे, उस दिन स्वयं परमानन्दस्वरूप प्रभु ने कालिन्दी से विवाह किया और अपने जनों को महान् आनन्द दिया।
अवन्ती के राजा विन्द और अनुविन्द दुर्योधन के वशवर्ती थे; उन्होंने अपनी बहन मित्रविन्दा को — श्रीकृष्ण की बुआ राजाधिदेवी की पुत्री — स्वयंवर में प्रभु को चुनने से रोक दिया, यद्यपि उसका हृदय उन्हीं का था। श्रीकृष्ण एकत्र राजाओं के देखते-देखते मित्रविन्दा को हर ले गए; वे बस खड़े देखते रह गए।
कोसल में नग्नजित् नामक एक परम धार्मिक राजा थे, जिनकी पुत्री सत्या पिता के नाम से नाग्नजिती भी कहलाती थी। पिता की शर्त कोई राजकुमार पूरी न कर सका था — वीरों की गन्ध तक न सहने वाले सात प्रचण्ड, तीखे सींगों वाले बैलों को वश में किए बिना उसे कोई न पा सकता था। यह सुनकर श्रीकृष्ण विशाल सेना के साथ कोसल की राजधानी अयोध्या पहुँचे। प्रसन्न राजा ने आगे आकर उनका स्वागत किया, उच्च आसन और पूजा-सामग्री अर्पित की, और प्रभु ने भी उनका सादर अभिनन्दन किया।
लक्ष्मीपति को ऐसे वैभव से आते देख राजकुमारी का हृदय उन्हीं में रम गया; उसने मन ही मन प्रार्थना की — “यदि मैंने सचमुच उन्हें लक्ष्य बनाकर व्रत रखे हैं, तो वे मेरी आशा पूरी करें और मेरे पति बनें।”
यत्पादपङ्कजरजः शिरसा बिभर्ति श्रीरब्जजः सगिरिशः सहलोकपालैः ।
लीलातनुः स्वकृतसेतुपरीप्सया यः काले दधत् स भगवान् मम केन तुष्येत् ॥ ३७ ॥
yat-pāda-paṅkaja-rajaḥ śirasā bibharti śrīr abja-jaḥ sa-giriśaḥ saha loka-pālaiḥ līlā-tanuḥ sva-kṛta-setu-parīpsayā yaḥ kāle dadhat sa bhagavān mama kena tuṣyet
अर्थ: जिनके चरणकमलों की धूलि को लक्ष्मी, कमलजन्मा ब्रह्मा, गिरीश शिव और लोकपाल अपने सिर पर धारण करते हैं, और जो अपने ही बनाए धर्म-सेतु की रक्षा के लिए समय-समय पर लीला-विग्रह धारण करते हैं — वे भगवान् मेरे किस प्रयत्न से प्रसन्न होंगे? (स्कन्ध 10, अध्याय 58, श्लोक 37)
श्रीकृष्ण की पूजा कर चुकने पर राजा नग्नजित् ने विनम्रता से कहा — “हे नारायण, हे जगत्पति, आप तो आत्मानन्द से पूर्ण हैं; मुझ दीन के पास आपके लिए करने योग्य क्या है?”

आसन पर सुख से बैठे श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए मेघ-गर्जन-सी गम्भीर वाणी में उत्तर दिया।
नरेन्द्र याच्ञा कविभिर्विगर्हिता राजन्यबन्धोर्निजधर्मवर्तिनः ।
तथापि याचे तव सौहृदेच्छया कन्यां त्वदीयां न हि शुल्कदा वयम् ॥ ४० ॥
narendra yācñā kavibhir vigarhitā rājanya-bandhor nija-dharma-vartinaḥ tathāpi yāce tava sauhṛdecchayā kanyāṁ tvadīyāṁ na hi śulka-dā vayam
अर्थ: श्रीभगवान् ने कहा — हे नरेन्द्र, अपने धर्म में स्थित क्षत्रिय के लिए याचना को विद्वानों ने निन्दित कहा है। फिर भी तुम्हारी मित्रता की इच्छा से मैं तुमसे तुम्हारी कन्या माँगता हूँ — क्योंकि हम कोई शुल्क देने वाले नहीं हैं। (स्कन्ध 10, अध्याय 58, श्लोक 40)
राजा ने उत्तर दिया कि जिनके वक्ष पर स्वयं श्री सदा निवास करती हैं, उन प्रभु से बढ़कर वर कौन हो सकता है। किन्तु वरों के पराक्रम की परीक्षा के लिए एक प्रतिज्ञा की जा चुकी थी — ये सात भयंकर बल वाले बैल हैं, जिन्होंने अनेक राजकुमारों के अंग तोड़ डाले हैं। “हे यदुनन्दन, यदि आप अकेले इन्हें वश में कर लें, तो हे श्रीपति, आप ही मेरी पुत्री के अभीष्ट वर होंगे।”
यह शर्त सुनकर प्रभु ने कमर कसी, स्वयं को सात रूपों में प्रकट किया और खेल-खेल में सातों बैलों को वश में कर लिया।
बद्ध्वा तान् दामभिः शौरिर्भग्नदर्पान् हतौजसः ।
व्यकर्षल्लीलया बद्धान् बालो दारुमयान् यथा ॥ ४६ ॥
baddhvā tān dāmabhiḥ śaurir bhagna-darpān hataujasaḥ vyakarṣal līlayā baddhān bālo dāru-mayān yathā
अर्थ: जिनका दर्प टूट चुका था और बल क्षीण हो गया था, उन बैलों को रस्सियों से बाँधकर शौरि उन्हें लीलापूर्वक वैसे ही खींचने लगे जैसे कोई बालक काठ के बने बैलों को खींचता है। (स्कन्ध 10, अध्याय 58, श्लोक 46)
विस्मित और आनन्दित राजा नग्नजित् ने सत्या को श्रीकृष्ण को सौंप दिया, और सर्वशक्तिमान् प्रभु ने अपनी उस योग्य वधू को विधिपूर्वक ग्रहण किया; कोसल की रानियाँ हर्ष से भर उठीं। शंख और नगाड़े बजे, ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिए, और सुन्दर वस्त्रों से सजे नर-नारी उत्सव मनाने लगे। राजा ने दहेज में दस हज़ार गौएँ, स्वर्णहारों से सजी तीन हज़ार दासियाँ, नौ हज़ार हाथी, और उत्तरोत्तर सौ-सौ गुने रथ, घोड़े और सेवक दिए। फिर स्नेह से द्रवित हृदय राजा ने वर-वधू को रथ पर बड़ी सेना के साथ विदा किया।
जो ईर्ष्यालु राजा पहले यादवों से और अभी-अभी उन्हीं बैलों से हार चुके थे, वे वधू के साथ जाते प्रभु का मार्ग रोककर खड़े हो गए। गाण्डीवधारी अर्जुन साथ थे; बाणों की वर्षा करते आते उन राजाओं को उन्होंने ऐसे खदेड़ दिया जैसे सिंह छोटे पशुओं को भगा देता है। श्रीकृष्ण दहेज सहित द्वारका पहुँचे और सत्या के साथ सुखपूर्वक रहने लगे।
इसके बाद श्रीकृष्ण ने केकय की राजकुमारी भद्रा से विवाह किया, जो उनकी बुआ श्रुतकीर्ति की पुत्री थी; सन्तर्दन आदि उसके भाइयों ने स्वयं उसे प्रभु को अर्पित किया। फिर मद्रराज की पुत्री, सब शुभ लक्षणों वाली राजकुमारी लक्ष्मणा के स्वयंवर में प्रभु उसे अकेले ही उसी प्रकार हर लाए जैसे गरुड़ देवताओं का अमृत ले उड़े थे।

शुकदेवजी ने जोड़ा कि इनके अतिरिक्त प्रभु की हज़ारों अन्य सुन्दर पत्नियाँ थीं, जिन्हें वे भौमासुर का वध कर उसके बन्दीगृह से छुड़ाकर लाए थे।
1. प्रभु स्मरण करने वालों के हृदय में बसते हैं। कुन्ती स्वीकार करती हैं कि प्रभु में “मेरा-तेरा” का भेद नहीं, फिर भी जो उन्हें याद करता है उसके हृदय में बैठकर वे उसकी पीड़ा हर लेते हैं। रक्त-सम्बन्ध नहीं, स्मरण ही उनकी रक्षा खींच लाता है।
2. उनका सान्निध्य कृपा है, हमारी उपलब्धि नहीं। युधिष्ठिर एक भी ऐसा पुण्य नहीं गिना पाते जिसने उन्हें प्रभु का संग दिलाया हो; जो सचमुच प्रभु को देखता है, उसके पास केवल विस्मय और कृतज्ञता बचती है।
3. केवल प्रभु को लक्ष्य बनाकर किया तप फलता है। यमुना के भीतर कालिन्दी के तप का एक ही उद्देश्य है — मुकुन्द के सिवा किसी को पति न बनाना — और ऐसी एकनिष्ठ व्याकुलता का उत्तर स्वयं प्रभु देते हैं।
4. प्रभु अपने स्थापित धर्म की रक्षा के लिए अवतरित होते हैं। सत्या की प्रार्थना उन्हें पुकारती है जिनकी चरणधूलि लक्ष्मी, ब्रह्मा और शिव अपने सिर पर धरते हैं, और जो अपनी ही मर्यादा की रक्षा के लिए हर युग में लीला-विग्रह धरते हैं।
5. प्रभु प्रेम से स्वयं को जीते जाने देते हैं। नग्नजित् कहते हैं कि प्रभु आत्मानन्द से पूर्ण हैं और उन्हें किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं; फिर भी वही प्रभु क्षत्रिय की मर्यादा एक ओर रखकर, केवल मित्रता की इच्छा से, एक राजा से उसकी कन्या माँगते हैं। वे बैलों को वश में करते और दहेज स्वीकार करते हैं — उन हृदयों के लिए जिन्हें उनके सिवा कोई न चाहिए था। कालिन्दी ने उनके अतिरिक्त किसी को न वरने का व्रत लिया था; सत्या ने उन्हीं को लक्ष्य बनाकर व्रत निभाए थे। ये विवाह उनकी मधुर स्वीकृति हैं कि जिन्होंने उन्हें खोजा, उनकी भक्ति से वे बँध जाएँ।
यह अध्याय एक सुन्दर उलटफेर छोड़ जाता है। यहाँ जो भी श्रीकृष्ण से मिलता है, स्वयं को अयोग्य अनुभव करता है — कुन्ती इस पर रो पड़ती हैं कि उन्होंने उन्हें याद रखा, युधिष्ठिर अपने नाम कोई पुण्य नहीं पाते, सत्या पूछती है कि किस प्रयत्न से वह उन्हें प्रसन्न कर सकेगी। और जिनके आगे ये सब झुकते हैं, वे प्रभु बार-बार स्वयं झुकते हैं — बड़ों के चरण छूते हैं, एक पिता से उसकी पुत्री माँगते हैं, खेलते बालक की तरह रस्सी से बैल खींचते हैं। अनाथों के आश्रय स्वयं को इतना सुलभ बना लेते हैं कि अपने भक्तों से कृपा माँगने लगते हैं।
कालिन्दी का उदाहरण भक्त के हृदय से विशेष रूप से बोलता है। उसने प्रभु के पीछे दौड़ नहीं लगाई; वह एक स्थान पर प्रार्थना और तप में टिकी रही, इस निश्चय के साथ कि वे आएँगे। और वे आए — चुपचाप, नदी से ऊपर आते हुए, एक मित्र से उसका नाम पुछवाते हुए। एकनिष्ठ, धैर्यवान् व्याकुलता को उन्हें खोजना नहीं पड़ता; वे जानते हैं कि हम कहाँ प्रतीक्षा कर रहे हैं।
आज कुछ शान्त क्षण बैठकर प्रभु का वैसे ही स्मरण करें जैसे कुन्ती ने उन्हें बताया — स्मरण करने वाले के हृदय में बसे हुए। उनका नाम धीरे-धीरे दोहराते हुए उन्हें अपने भीतर विराजमान देखें, आपके हर दुःख को सुनते हुए; फिर कालिन्दी के भाव से उन्हें एक इच्छा अर्पित करें — वस्तुओं की नहीं, बस उन्हीं की। आरम्भ में धीरे-धीरे जपें: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
इस अट्ठावनवें अध्याय में प्रभु वर्षा-ऋतु भर पाण्डवों के पास रहते हैं, यमुना-तट पर प्रतीक्षारत कालिन्दी को पाते हैं, मित्रविन्दा को हर लाते हैं, सत्या के लिए कोसल के सात बैलों को वश में करते हैं, और भद्रा तथा लक्ष्मणा को स्वीकारते हैं। हर दृश्य में एक ही सत्य बहता है — जिन्हें किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, वे प्रभु उनसे जीते जाने देते हैं जिनके हृदय में उनके सिवा कुछ नहीं। हम भी कालिन्दी की तरह उनकी प्रतीक्षा करें और कुन्ती की तरह उन्हें याद करें, ताकि वे हमारे भीतर बसकर हमारी पीड़ा हर लें।
श्रीमद्भागवतम् का दिव्य ज्ञान हमारे हृदयों में शुद्ध भक्ति जगाए।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
जय श्री माधव।
यह लेखक के अपने शब्दों में एक मौलिक, श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन है, जिसमें संक्षिप्त उद्धृत श्लोक देवनागरी एवं लिप्यन्तरण सहित दिए गए हैं और उनके अर्थ सारांश रूप में प्रस्तुत हैं। यह किसी एक प्रकाशक के सतत अनुवाद या टीका का पुनरुत्पादन नहीं है। किसी प्रकाशक के संबंध या समर्थन का दावा नहीं किया गया है।
जय श्री माधव
यह श्रृंखला प्रतिदिन आगे बढ़ती है — पूज्य पंडित डॉ. श्री काशीनाथ मिश्र के मार्गदर्शन में, शास्त्र के क्रम में।