Srimad Bhagavatam Wisdom · स्कन्ध 10 · अध्याय 83 · 5 October 2026

श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 अध्याय 83 — द्रौपदी और रानियाँ

श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10, अध्याय 83: द्रौपदी श्रीकृष्ण की रानियों से पूछती हैं कि प्रभु ने उन्हें कैसे वरा, और हर उत्तर एक ही प्रार्थना में समाप्त होता है — उनके चरणों की धूलि।

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कुरुक्षेत्र के मण्डप में श्रीकृष्ण की रानियों के बीच बैठी द्रौपदी, हाथ जोड़े बोलती रुक्मिणी को सुनती हुईं

कुरुक्षेत्र के अन्तःपुर में द्रौपदी श्रीकृष्ण की पटरानियों से पूछती हैं कि प्रभु ने उन्हें कैसे वरण किया — और एक-एक रानी एक ही लालसा के साथ उत्तर देती है: न राज्य, न स्वर्ग, केवल उनके चरणकमलों की धूलि।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

श्रीमद्भागवतम् विज़्डम में पुनः स्वागत है — श्रीमद्भागवत महापुराण की पवित्र कथाओं और शिक्षाओं की हमारी भक्तिमयी यात्रा। दशम स्कन्ध के इस तिरासीवें अध्याय में, कुरुक्षेत्र में युधिष्ठिर और उनके साथियों द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति के बाद, द्रौपदी श्रीकृष्ण की रानियों से पूछती हैं कि प्रभु ने उनसे विवाह कैसे किया; और उनके उत्तर भौमासुर के बन्दीगृह से मुक्त हुई सोलह हज़ार रानियों के एक स्वर में पूर्ण होते हैं।

अध्याय-परिचय

  • शास्त्र: श्रीमद्भागवत महापुराण
  • स्कन्ध: 10 (दशम स्कन्ध, उत्तरार्ध)
  • अध्याय: 83 (त्र्यशीतितम अध्याय)
  • अध्याय शीर्षक: द्रौपदी और श्रीकृष्ण की रानियों की भेंट
  • मुख्य वक्ता: श्री शुकदेव गोस्वामी; अध्याय के भीतर श्रीकृष्ण की रानियाँ
  • मुख्य श्रोता: राजा परीक्षित; अध्याय के भीतर द्रौपदी
  • मुख्य स्थल: सूर्यग्रहण के महासमागम में पुण्यक्षेत्र कुरुक्षेत्र
  • केंद्रीय विषय: द्रौपदी का प्रश्न और प्रत्येक रानी का अपने विवाह का वृत्तान्त, जो प्रभु की चरण-धूलि की प्रार्थना में समाप्त होता है
  • मुख्य श्लोक-सीमा: स्कन्ध 10, अध्याय 83, श्लोक 1–43
  • मूल संस्करण: गीता प्रेस श्रीमद्भागवत महापुराण

पूर्व अध्याय का संदर्भ

बयासीवें अध्याय में यदुवंशी सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र आए और पाण्डवों से, नन्द तथा व्रजवासियों से और गोपियों से मिले, जिन्हें श्रीकृष्ण ने उपदेश देकर अपने चरणों की अखण्ड स्मृति का वरदान दिया। यह अध्याय उसी पावन समागम में आगे बढ़ता है।

प्रभु युधिष्ठिर और अपने सुहृदों से मिलते हैं

शुकदेवजी ने कथा आगे बढ़ाई। जो प्रभु गोपियों के गुरु भी थे और उनकी गति भी, उन्होंने गोपियों पर इस प्रकार कृपा करके युधिष्ठिर और अपने अन्य सुहृदों से कुशल पूछी। उनके चरणों के दर्शन से ही उन सबके पाप धुल चुके थे; त्रिलोकीनाथ से सम्मानित होकर वे आनन्दित हो उत्तर देने लगे।

उन्होंने कहा — जो लोग कानों की अंजलि से आपके चरणकमलों का वह मधु पीते हैं जो महापुरुषों के मुख से झरता है और जीव को अपने रचयिता की विस्मृति से छुड़ा देता है, उनका अमंगल भला कैसे हो सकता है?

कुतोऽशिवं त्वच्चरणाम्बुजासवं महन्मनस्तो मुखनिःसृतं क्वचित् ।
पिबन्ति ये कर्णपुटैरलं प्रभो देहंभृतां देहकृदस्मृतिच्छिदम् ॥ ३ ॥

kuto ‘śivaṁ tvac-caraṇāmbujāsavaṁ mahan-manasto mukha-niḥsṛtaṁ kvacit pibanti ye karṇa-puṭair alaṁ prabho dehaṁ-bhṛtāṁ deha-kṛd-asmṛti-cchidam

अर्थ: हे प्रभो! जो अपने कर्णपुटों से आपके चरणकमलों के उस आसव को भरपूर पीते हैं, जो महात्माओं के मन से उनके मुख द्वारा कभी-कभी बाहर आता है और देहधारियों की देह-रचयिता विषयक विस्मृति को काट देता है — उनका अशुभ कहाँ से होगा? (स्कन्ध 10, अध्याय 83, श्लोक 3)

फिर उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया — जो अखण्ड और अकुण्ठित बोधस्वरूप हैं, आनन्द के समुद्र हैं, जिनके तेज के आगे जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति टिक नहीं पातीं, जो परमहंसों की गति हैं और जिन्होंने काल से क्षीण हुए वेदों की रक्षा के लिए अपनी योगमाया से मनुष्य-रूप धारण किया है।

स्त्रियों का मिलन और द्रौपदी का प्रश्न

जब युधिष्ठिर आदि इस प्रकार प्रभु की स्तुति कर रहे थे, तब यदु और कुरु कुलों की स्त्रियाँ परस्पर मिलकर त्रिलोकी में गाई जाने वाली श्रीकृष्ण-कथाएँ एक-दूसरे को सुनाने लगीं; शुकदेवजी अब वही सुनाते हैं।

द्रौपदी ने रानियों को नाम ले-लेकर सम्बोधित किया — विदर्भराजकुमारी, भद्रा, जाम्बवती, कोसलराजकुमारी, सत्यभामा, कालिन्दी, शैब्या, रोहिणी, लक्ष्मणा और श्रीकृष्ण की अन्य पत्नियाँ — और पूछा कि साक्षात् भगवान् होकर भी अपनी माया से लोकरीति का अनुकरण करने वाले प्रभु ने उनमें से प्रत्येक का पाणिग्रहण कैसे किया।

रुक्मिणी: सिंह के भाग की भाँति हरण

सबसे पहले रुक्मिणी बोलीं। जरासन्ध आदि राजा धनुष उठाए इसलिए जुटे थे कि उन्हें चेदिराज शिशुपाल को दे दिया जाए; किन्तु जिनकी चरण-धूलि अजेय योद्धाओं के मुकुटों पर विराजती है, वे प्रभु उन सबके बीच से उन्हें वैसे ही हर ले गए जैसे सिंह बकरियों और भेड़ों के झुंड से अपना भाग ले जाता है। उन्होंने प्रार्थना की कि लक्ष्मी के निवास वे चरण सदा उनकी पूजा के लिए सुलभ रहें।

चैद्याय मार्पयितुमुद्यतकार्मुकेषु राजस्वजेयभटशेखरिताङ्घ्रिरेणुः ।
निन्ये मृगेन्द्र इव भागमजावियूथात् तच्छ्रीनिकेतचरणोऽस्तु ममार्चनाय ॥ ८ ॥

caidyāya mārpayitum udyata-kārmukeṣu rājasv ajeya-bhaṭa-śekharitāṅghri-reṇuḥ ninye mṛgendra iva bhāgam ajāvi-yūthāt tac-chrī-niketa-caraṇo ‘stu mamārcanāya

अर्थ: जब राजालोग मुझे चेदिराज को अर्पित करने के लिए धनुष चढ़ाए खड़े थे, तब अजेय वीरों के शिरोभूषण-रूप चरणरज वाले प्रभु मुझे ऐसे ले गए जैसे मृगेन्द्र अजा-अवि के यूथ से अपना भाग ले जाता है; श्री के निकेतन वे चरण मेरी अर्चना के लिए हों। (स्कन्ध 10, अध्याय 83, श्लोक 8)

रथ पर अपने साथ बैठी रुक्मिणी को लेकर दूर जाते श्रीकृष्ण, पीछे झुके धनुष लिए देखते एकत्र राजा
रुक्मिणी स्मरण करती हैं कि प्रभु उन्हें जरासन्ध और एकत्र राजाओं के बीच से वैसे ही ले गए जैसे सिंह बकरियों और भेड़ों के झुंड से अपना भाग ले जाता है।

सत्यभामा और जाम्बवती: मणि और गुफा

फिर सत्यभामा बोलीं। उनके पिता अपने भाई प्रसेन की मृत्यु से दुखी होकर प्रभु पर उसकी हत्या का दोष लगा बैठे थे; उस कलंक को धोने के लिए श्रीकृष्ण ने ऋक्षराज को जीतकर मणि लौटाई, और मिथ्या आरोप से भयभीत पिता ने, यद्यपि वे उन्हें किसी और को देने का वचन दे चुके थे, मणि के साथ अपनी पुत्री भी प्रभु को समर्पित कर दी।

इसके बाद जाम्बवती ने कहा। उनके पिता जाम्बवान् यह नहीं जानते थे कि उनके सामने खड़े प्रभु उनके अपने आराध्य सीतापति ही हैं, इसलिए वे सत्ताईस दिन तक उनसे लड़ते रहे। परीक्षा के बाद जब उन्होंने प्रभु को पहचाना, तब उनके चरण पकड़कर मणि के साथ उन्हें भेंट-रूप में अर्पित कर दिया। “मैं उनकी दासी हूँ,” उन्होंने सरलता से कहा।

अपनी गुफा में श्रीकृष्ण के चरणों में झुके ऋक्षराज जाम्बवान् स्यमन्तक मणि अर्पित करते हुए, पास में लज्जा से खड़ी उनकी पुत्री जाम्बवती
सत्ताईस दिन बाद जाम्बवान् प्रभु को अपने आराध्य सीतापति के रूप में पहचानते हैं, उनके चरण पकड़ते हैं और मणि के साथ अपनी पुत्री जाम्बवती को भी अर्पित कर देते हैं।

कालिन्दी, मित्रविन्दा और सत्या

कालिन्दी का वृत्तान्त सबसे छोटा था। यह जानकर कि वे उनके चरण-स्पर्श की आशा में तप कर रही हैं, प्रभु अपने सखा अर्जुन के साथ आए और उनका हाथ थाम लिया; अब, उन्होंने कहा, वे उनके घर में झाड़ू लगाती हैं।

मित्रविन्दा ने अपने स्वयंवर का स्मरण किया: प्रभु आए, एकत्र राजाओं को जीतकर उन्हें ऐश्वर्य की निवास-भूमि द्वारका ले गए, जैसे सिंह कुत्तों के झुंड से अपना भाग छीन ले जाता है; उनके अपने भाइयों को भी, जो उनका अहित चाहते हुए प्रभु को रोकने आए, पराजित किया। उन्होंने माँगा कि जन्म-जन्म में उन्हें प्रभु के चरण धोने की सेवा मिले।

कोसलराजकुमारी सत्या ने बताया कि वरों के बल की परीक्षा के लिए उनके पिता ने अत्यन्त बलशाली और तीखे सींगों वाले सात बैल रखे थे, जिन्होंने अनेक वीरों का घमण्ड तोड़ा था। प्रभु ने खेल-खेल में उन्हें पकड़कर क्षण भर में बाँध लिया, जैसे बच्चे बकरी के बच्चों को बाँध लेते हैं। इस प्रकार वीर्य-शुल्क में उन्हें जीतकर वे उन्हें दासियों और चतुरंगिणी सेना के साथ द्वारका ले गए और मार्ग में रोकने वाले राजाओं को हराया। उनकी एक ही कामना थी कि उन्हें प्रभु की सेवा मिलती रहे।

कोसल की रंगभूमि में सात शान्त बैलों की नकेल खेल-खेल में थामे श्रीकृष्ण, राजमहल के झरोखे से देखते राजा नग्नजित् और राजकुमारी सत्या
कोसलराजकुमारी सत्या स्मरण करती हैं कि प्रभु ने उनके पिता के सात प्रचण्ड बैलों को खेल-खेल में पकड़कर क्षण भर में बाँध लिया, जैसे बच्चे बकरी के बच्चों को बाँध लेते हैं।

भद्रा, प्रभु की बुआ की पुत्री

भद्रा ने बताया कि श्रीकृष्ण उनके मामा के पुत्र हैं; यह जानकर कि उनका मन प्रभु को समर्पित हो चुका है, उनके पिता ने स्वयं प्रभु को बुलाकर एक अक्षौहिणी सेना और अनेक सखियों के साथ उन्हें सौंप दिया। कर्मवश वे किसी भी जन्म में कहीं भी जाएँ, उन्होंने यही माँगा कि प्रभु के चरणों का स्पर्श ही उनका परम कल्याण हो।

लक्ष्मणा: परदे के पीछे छिपी मछली

बृहत्सेन की पुत्री लक्ष्मणा ने सबसे विस्तार से कहा। देवर्षि नारद से प्रभु के अवतार और लीलाओं का गान सुनकर, और यह विचार कर कि स्वयं लक्ष्मी ने लोकपालों को छोड़कर उन्हें वरा है, उन्होंने अपना चित्त मुकुन्द में लगा दिया। उनके स्नेही पिता ने उनका संकल्प जानकर एक उपाय रचा: जिस प्रकार द्रौपदी के पिता ने मत्स्य-लक्ष्य से अर्जुन को पाया था, उसी प्रकार उन्होंने भी मछली को लक्ष्य बनाया — किन्तु वह पूरी तरह ढकी हुई थी और नीचे जल में केवल उसकी परछाईं दिखती थी।

धनुर्विद्या में निपुण राजा सहस्रों की संख्या में आए और यथायोग्य सम्मानित हुए। कोई धनुष उठा ही न सका; कोई प्रत्यंचा खींचकर उसी के झटके से गिर पड़ा। जरासन्ध, शिशुपाल, अम्बष्ठराज, भीम, दुर्योधन और कर्ण ने धनुष चढ़ा तो लिया, पर मछली को ढूँढ़ न सके। अर्जुन ने परछाईं से उसे पहचानकर सावधानी से बाण चलाया, किन्तु बाण केवल उसे छूकर रह गया।

जब मानमर्दित राजकुमार अपने आसनों पर लौट गए, तब प्रभु ने धनुष उठाकर खेल-खेल में उस पर डोरी चढ़ाई, जल में एक बार दृष्टि डाली और एक ही बाण से मछली को गिरा दिया — उस समय सूर्य अभिजित् मुहूर्त में मध्याकाश में थे। पृथ्वी पर जय-जयकार गूँज उठा, आकाश में दुन्दुभियाँ बजीं और प्रसन्न देवताओं ने पुष्पवर्षा की।

जलपात्र में छिपी मछली की परछाईं देखते हुए विशाल धनुष खींचते श्रीकृष्ण, रत्नमाला लिए प्रतीक्षा करती राजकुमारी लक्ष्मणा और देखते राजा
राजा बृहत्सेन की सभा में प्रभु खेल-खेल में धनुष चढ़ाते हैं, जल में मछली की परछाईं पर एक बार दृष्टि डालते हैं और एक ही बाण से छिपे लक्ष्य को गिरा देते हैं।

तब लक्ष्मणा रंगभूमि में आईं — पैरों में झंकारते नूपुर, नए रेशमी वस्त्र, वेणी में फूल, होठों पर लजीली मुसकान और हाथों में सोने में जड़ी रत्नों की चमकती माला — और प्रेम से छलकते हृदय से उन्होंने वह माला प्रभु के गले में डाल दी; मृदंग, शंख और नगाड़े बज उठे, नर्तक नाचे और गायक गाने लगे, जबकि कामी राजा अपनी हार से जल-भुन गए।

चतुर्भुज प्रभु ने उन्हें अपने रथ पर बिठाया, धनुष और कवच धारण किया और दारुक के सारथ्य में देखते राजाओं के बीच से ऐसे निकल गए जैसे सिंह हिरनों के झुंड के बीच से चलता है। जिन राजाओं ने पीछा किया, उनकी दशा सिंह को रोकते कुत्तों जैसी हुई: कुछ शार्ङ्ग धनुष के बाणों से गिर पड़े और शेष भाग खड़े हुए।

जैसे सूर्य अपने आकाश में प्रवेश करता है, वैसे यदुपति ने तोरणों और पताकाओं से सजी द्वारका में प्रवेश किया। पिता ने अपने स्वजनों का उपहारों से सत्कार किया और उन प्रभु को, जिन्हें किसी वस्तु की कमी नहीं और जो आत्मा में ही रमण करते हैं, प्रेमवश दासियाँ, धन, पैदल सेना, हाथी, रथ, घोड़े और अस्त्र भेंट किए। आत्माराम प्रभु के घर की दासियाँ बनने का सौभाग्य, लक्ष्मणा ने कहा, निश्चय ही पूर्वजन्मों में समस्त आसक्ति छोड़कर की गई कठोर तपस्या का ही फल है।

आत्मारामस्य तस्येमा वयं वै गृहदासिकाः ।
सर्वसङ्गनिवृत्त्याद्धा तपसा च बभूविम ॥ ३९ ॥

ātmārāmasya tasyemā vayaṁ vai gṛha-dāsikāḥ sarva-saṅga-nivṛttyāddhā tapasā ca babhūvima

अर्थ: अपने स्वरूप में रमण करने वाले उन प्रभु की गृहदासियाँ हम सब निश्चय ही सम्पूर्ण संग के त्याग और तप के द्वारा ही हुई हैं। (स्कन्ध 10, अध्याय 83, श्लोक 39)

सोलह हज़ार रानियों का एक स्वर

अन्त में सोलह हज़ार रानियों ने उत्तर दिया, जिनकी ओर से रोहिणी बोलीं। दिग्विजय करते हुए भौमासुर ने अनेक राजाओं को हराकर उनकी कन्याओं को अपने महल में बन्दी बना रखा था। जब प्रभु ने युद्ध में भौम और उसकी सेना का वध किया और उनके बन्दी होने की बात जानी, तब उन्हें मुक्त किया; और स्वयं आप्तकाम होते हुए भी उन सबसे विवाह किया, क्योंकि वे जानते थे कि ये सदा उनके उन चरणकमलों का स्मरण करती हैं जो जन्म-मृत्यु के बन्धन से छुड़ाते हैं।

फिर आई उनकी प्रार्थना — पूरे अध्याय का हृदय। उन्हें न पृथ्वी का साम्राज्य चाहिए था, न इन्द्र का सिंहासन, न सिद्धियाँ, न ब्रह्मा का पद, न मोक्ष, न हरि का नित्य धाम ही — केवल प्रभु के चरणों की वह धूलि अपने सिर पर धारण करनी थी, जो लक्ष्मी के वक्ष के केसर से सुगन्धित है।

न वयं साध्वि साम्राज्यं स्वाराज्यं भौज्यमप्युत ।
वैराज्यं पारमेष्ठ्यं च आनन्त्यं वा हरेः पदम् ॥ ४१ ॥
कामयामह एतस्य श्रीमत्पादरजः श्रियः ।
कुचकुङ्कुमगन्धाढ्यं मूर्ध्ना वोढुं गदाभृतः ॥ ४२ ॥

na vayaṁ sādhvi sāmrājyaṁ svārājyaṁ bhaujyam apy uta vairājyaṁ pārameṣṭhyaṁ ca ānantyaṁ vā hareḥ padam kāmayāmaha etasya śrīmat-pāda-rajaḥ śriyaḥ kuca-kuṅkuma-gandhāḍhyaṁ mūrdhnā voḍhuṁ gadā-bhṛtaḥ

अर्थ: हे साध्वी! हम साम्राज्य, स्वर्ग का राज्य, उसके भोग, परम ऐश्वर्य, ब्रह्मा का पद, अमरत्व अथवा हरि का धाम — इनमें से कुछ भी नहीं चाहतीं; हम तो गदाधारी श्रीहरि के चरणों की उस श्रीमयी रज को, जो श्री के कुच-कुंकुम की गन्ध से भरी है, अपने मस्तक पर धारण करना चाहती हैं। (स्कन्ध 10, अध्याय 83, श्लोक 41–42)

द्रौपदी के सामने हाथ जोड़े और सिर झुकाए बैठी श्रीकृष्ण की रानियों की पंक्तियाँ, ऊपर प्रभु के चरणकमलों की कोमल दीप्तिमान छवि
भौमासुर के बन्दीगृह से मुक्त होकर प्रभु द्वारा वरी गईं सोलह हज़ार रानियाँ द्रौपदी से कहती हैं कि वे कुछ नहीं माँगतीं — न साम्राज्य, न स्वर्ग, न मोक्ष — केवल उनके चरणकमलों की धूलि।

और उन्होंने बताया कि वे किनकी पंक्ति में खड़ी होना चाहती हैं: व्रज की स्त्रियाँ, वन की पुलिन्द-कन्याएँ, तृण और लताएँ, और महात्मा प्रभु के साथ गायें चराने वाले गोप — जो सब उनके चरण-स्पर्श के लिए तरसते थे।

व्रजस्त्रियो यद् वाञ्छन्ति पुलिन्द्यस्तृणवीरुधः ।
गावश्चारयतो गोपाः पादस्पर्शं महात्मनः ॥ ४३ ॥

vraja-striyo yad vāñchanti pulindyas tṛṇa-vīrudhaḥ gāvaś cārayato gopāḥ pāda-sparśaṁ mahātmanaḥ

अर्थ: व्रजवनिताएँ, पुलिन्द-स्त्रियाँ, तृण-लताएँ तथा गो-चारण करते गोप उस महात्मा के जिस पद-स्पर्श की अभिलाषा करते हैं, वही हमारी कामना है। (स्कन्ध 10, अध्याय 83, श्लोक 43)

इस अध्याय की प्रमुख शिक्षाएँ

1. भगवत्कथा का श्रवण विस्मृति को काटता है। श्लोक 3 में कहा गया है कि महापुरुषों के मुख से कानों द्वारा ग्रहण किया गया श्रीकृष्ण के चरणों का मधु जीव की ईश्वर-विस्मृति को काट देता है। भक्तिपूर्ण श्रवण ही देहधारी जीवन के मूल रोग की औषधि है।

2. भगवान् संसार में लीला करते हुए भी भगवान् ही रहते हैं। द्रौपदी कहती हैं कि प्रभु साक्षात् भगवान् होकर भी अपनी माया से मनुष्यों का अनुकरण करते हैं। उनके विवाह उनकी लीला हैं, उनकी आवश्यकता नहीं।

3. तपस्या का फल सेवा है। श्लोक 39 में रानियों का त्याग और तप आत्माराम प्रभु के घर में सेवा के अवसर के रूप में फलित होता है। हर रानी किसी विनम्र सेवा को — झाड़ू लगाना, चरण धोना, दासी होना — अपना धन बताती है।

4. चरण-धूलि मोक्ष से भी ऊपर है। श्लोक 41 और 42 में रानियाँ साम्राज्य, स्वर्ग, ब्रह्मपद, मोक्ष और प्रभु के अपने धाम तक को ठुकरा देती हैं। यही वह एक बात है जो कोई वैष्णव इस अध्याय से ग्रहण करता है: आत्माराम और आप्तकाम प्रभु ने ये विवाह संगिनियाँ पाने के लिए नहीं रचे, बल्कि पृथ्वी की सबसे सौभाग्यशाली स्त्रियों को अपने चरणों में सबसे नीचा स्थान देने के लिए रचे, क्योंकि वही स्थान, कोई सिंहासन नहीं, भक्ति का सर्वोच्च फल है। पुरस्कार के ऊपर सेवा की यही प्राथमिकता उनके प्रेम को शुद्ध बनाती है।

5. रानियाँ व्रज की ओर देखती हैं। श्लोक 43 में द्वारकाधीश की पटरानियाँ गोपियों, वनवासिनी स्त्रियों, गोपों, यहाँ तक कि वृन्दावन की घास से भी ईर्ष्या करती हैं। श्रीकृष्ण की निकटता पद से नहीं, लालसा से नापी जाती है।

एक भक्तिमय चिन्तन

हर रानी से एक ही सीधा प्रश्न पूछा गया — उन्होंने आपसे विवाह कैसे किया? — और हर एक ने एक कथा सुनाई जो प्रार्थना में समाप्त हुई। परिस्थितियाँ इससे अधिक भिन्न नहीं हो सकती थीं, फिर भी हर स्वर प्रभु के चरणों पर पहुँचता है और वहीं रहने की याचना करता है। सबसे अधिक हमें यह बात छूती है कि बोल कौन रहा है: सृष्टि की सबसे भाग्यशाली स्त्रियाँ, स्वयं परम पुरुष की पत्नियाँ। यदि कोई अपने पास जो है उसी में तृप्त रह सकता था, तो वे थीं। किन्तु वे अपने को झाड़ू लगाने वाली और दासी कहती हैं, और व्रज की घास से ईर्ष्या करती हैं। सौभाग्य बढ़ने से भक्ति घटती नहीं; वह और विनम्र हो जाती है। प्रभु की कृपा मिलने का सबसे पक्का चिह्न तृप्ति नहीं, सेवा की निरन्तर गहराती इच्छा है।

एक दैनिक भक्ति-अभ्यास

आज सेवा का कोई एक छोटा कार्य चुनें — जहाँ आप पूजा करते हैं उस स्थान को सँवारना, या घर में किसी की चुपचाप सहायता करना — और उसे प्रभु के घर में झाड़ू लगाती कालिन्दी के भाव से करें, यह स्मरण रखते हुए कि द्वारका की रानियों ने ऐसी सेवा को हर राज्य से ऊपर माना। प्रार्थना करें कि उनकी चरण-धूलि आपके सिर पर विराजे, और धीरे-धीरे जपें: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

उपसंहार

द्रौपदी का प्रश्न भागवत की सबसे अन्तरंग साक्षी का द्वार खोलता है: श्रीकृष्ण की रानियाँ स्वयं बताती हैं कि प्रभु उनके लिए कैसे आए और अब वे उनसे क्या माँगती हैं। हरण, परीक्षा, तप और भौमासुर के बन्दीगृह से मुक्ति के द्वारा प्रभु ने अपनी वधुएँ एकत्र कीं, और रुक्मिणी से लेकर सोलह हज़ार तक सबने उनकी चरण-धूलि को हर पुरस्कार, यहाँ तक कि मोक्ष से भी ऊपर रखा। उनकी विनम्रता हमारी बने, और हम भी उनकी सेवा से बड़ा कोई सौभाग्य न खोजें।

श्रीमद्भागवतम् का दिव्य ज्ञान हमारे हृदयों में शुद्ध भक्ति जगाए।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

जय श्री माधव।


संदर्भ एवं आभार

  • मूल संस्करण: गीता प्रेस, श्रीमद्भागवत महापुराण (अंग्रेज़ी), दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध), त्र्यशीतितम अध्याय, पृष्ठ 465–470।
  • श्रृंखला: श्रीमद्भागवतम् विज़्डम · बिस्व सनातन धर्म सेवा ट्रस्ट।
  • पण्डित डॉ. श्री काशीनाथ मिश्र के आध्यात्मिक मार्गदर्शन एवं अनुशंसा के अनुसार प्रस्तुत।

यह लेखक के अपने शब्दों में एक मौलिक, श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन है, जिसमें संक्षिप्त उद्धृत श्लोक देवनागरी एवं लिप्यन्तरण सहित दिए गए हैं और उनके अर्थ सारांश रूप में प्रस्तुत हैं। यह किसी एक प्रकाशक के सतत अनुवाद या टीका का पुनरुत्पादन नहीं है। किसी प्रकाशक के संबंध या समर्थन का दावा नहीं किया गया है।

॥ हरि ॐ तत्सत् ॥

जय श्री माधव

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यह श्रृंखला प्रतिदिन आगे बढ़ती है — पूज्य पंडित डॉ. श्री काशीनाथ मिश्र के मार्गदर्शन में, शास्त्र के क्रम में।