श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10, अध्याय 9: माता यशोदा शिशु कृष्ण को बाँधती हैं — दामोदर-लीला और सदा दो अंगुल छोटी पड़ती रस्सी की मधुर कथा।
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माता यशोदा अपने नन्हे लाला की चपलता देखकर उन्हें प्रेमपूर्वक ऊखल से बाँध देती हैं — और समस्त लोकों के स्वामी, माँ के प्रेम से बँधकर, सदा के लिए ‘दामोदर’ कहलाते हैं।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद्भागवतम् विज़्डम में पुनः स्वागत है — श्रीमद्भागवत महापुराण की पवित्र कथाओं और शिक्षाओं की हमारी भक्तिमयी यात्रा। दशम स्कन्ध का यह नवाँ अध्याय भगवान् की सबसे प्रिय बाललीलाओं में से एक का वर्णन करता है — वही लीला जिससे श्रीकृष्ण को ‘दामोदर’ नाम मिलता है, अर्थात् ‘जिनके उदर (कमर) में रस्सी बँधी है।’ एक प्रातःकाल माता यशोदा अपने ही हाथों से दही मथकर मक्खन निकालती हैं और अपने लाला के गीत गाती हैं; बालक स्तनपान के लिए आता है, अतृप्त ही छोड़ दिया जाता है, और रूठकर दही की मटकी फोड़ देता है तथा मक्खन चुरा लेता है। जब माता उसे पकड़कर ऊखल से बाँधना चाहती हैं, तो उन्हें ज्ञात होता है कि घर की कोई भी रस्सी पूरी नहीं पड़ती — हर बार वह ठीक दो अंगुल छोटी रह जाती है। जब वे थक जाती हैं, तभी भगवान् कृपावश स्वयं को बँधने देते हैं। इस कोमल लीला में समस्त ब्रह्माण्ड को अपने भीतर धारण करने वाले परमात्मा माँ के शुद्ध प्रेम से स्वेच्छा से बँध जाते हैं, और अध्याय के अन्त में वे दो विशाल वृक्षों की ओर दृष्टि डालते हैं जिनमें एक चिर-प्रतीक्षित मुक्ति छिपी है।
आठवें अध्याय में गर्ग ऋषि ने बलराम और कृष्ण का गुप्त नामकरण संस्कार किया, दोनों बालकों ने घुटनों चलकर व्रज भर में खेल और माखनचोरी की, और मिट्टी खाने के आरोप पर माता यशोदा ने अपने बालक के मुख में समस्त ब्रह्माण्ड के दर्शन किए। यह नवाँ अध्याय उन्हीं शिशु-वर्षों को मक्खन मथने और भगवान् के बन्धन की लीला के साथ आगे बढ़ाता है — वही लीला जिससे उन्हें दामोदर नाम प्राप्त होता है।
एक दिन, जब उनकी दासियाँ अन्य घरेलू कार्यों में लगी हुई थीं, नन्दरानी यशोदा स्वयं अपने हाथों से दही मथकर मक्खन निकालने लगीं। मथानी चलाते-चलाते वे अपने लाला की बाललीलाओं के अनेक प्रिय गीत गुनगुनाती रहीं। शुकदेवजी माँ का चित्र बड़े वात्सल्य से खींचते हैं: चौड़े कटिप्रदेश पर करधनी से बँधा रेशमी वस्त्र धारण किए, पुत्र-स्नेह से दूध बहाते और काँपते हुए स्तन, रस्सी खींचने के परिश्रम से हिलते हुए बाजूबन्द और कुण्डल, पसीने से भीगा मुख और चोटी से खिसकते मालती के पुष्प।

जब वे इसी में तल्लीन थीं, तभी शिशु कृष्ण स्तनपान की इच्छा से मथती हुई माँ के पास आए और अपने नन्हे हाथों से मथानी पकड़कर उन्हें प्रेमपूर्वक रोक दिया — जिससे माँ का हृदय आनन्द से भर उठा।
तां स्तन्यकाम आसाद्य मथ्नन्तीं जननीं हरि: ।
गृहीत्वा दधिमन्थानं न्यषेधत् प्रीतिमावहन् ॥ ४ ॥
tāṁ stanya-kāma āsādya mathnantīṁ jananīṁ hariḥ gṛhītvā dadhi-manthānaṁ nyaṣedhat prītim āvahan
अर्थ: स्तनपान की इच्छा से बालक हरि मथती हुई अपनी माता के पास आए और मथानी पकड़कर उन्हें रोक दिया, जिससे उन्हें बड़ा आनन्द हुआ। (स्कन्ध 10, अध्याय 9, श्लोक 4)
यशोदा ने अपने लाला को गोद में उठा लिया और मुस्कुराते हुए उनके सुन्दर मुख को निहारते हुए स्तनपान कराने लगीं। तभी उन्होंने देखा कि चूल्हे पर रखा दूध उफनकर गिर रहा है, और अतृप्त बालक को नीचे बैठाकर वे दूध सँभालने दौड़ पड़ीं। अपनी इच्छा में बाधा पड़ने से नन्हे प्रभु को क्रोध आ गया; उनके लाल-लाल ओठ फड़कने लगे, और दाँतों से दही की मटकी काटकर उन्होंने पत्थर से उसे फोड़ डाला। फिर झूठे आँसू बहाते हुए वे चुपके से भीतर के कमरे में जाकर ताजा मक्खन खाने लगे।
सञ्जातकोप: स्फुरितारुणाधरं
सन्दश्य दद्भिर्दधिमन्थभाजनम् ।
भित्त्वा मृषाश्रुर्दृषदश्मना रहो
जघास हैयङ्गवमन्तरं गत: ॥ ६ ॥
sañjāta-kopaḥ sphuritāruṇādharaṁ sandaśya dadbhir dadhi-mantha-bhājanam bhittvā mṛṣāśrur dṛṣad-aśmanā raho jaghāsa haiyaṅgavam antaraṁ gataḥ
अर्थ: क्रोध से भरकर और लाल ओठ फड़काते हुए उन्होंने दाँतों से दही की मटकी काटकर पत्थर से फोड़ डाली; फिर झूठे आँसू बहाते हुए एकान्त कमरे में जाकर ताजा मक्खन खाने लगे। (स्कन्ध 10, अध्याय 9, श्लोक 6)
दूध चूल्हे से उतारकर लौटी यशोदा ने दही की मटकी फूटी हुई पाई। वे तुरन्त समझ गईं कि यह उनके लाला का ही काम है, और यद्यपि वे उन्हें कहीं देख नहीं पा रही थीं, फिर भी उनकी शरारत पर हँसे बिना न रह सकीं। शीघ्र ही उन्होंने कृष्ण को खोज लिया: वे एक उलटे ऊखल पर चढ़कर छींके पर टँगे मक्खन को प्रसन्नतापूर्वक एक बन्दर को बाँट रहे थे, और चोरी के भय से आँखें इधर-उधर घुमा रहे थे। यशोदा चुपचाप पीछे से उनके पास पहुँचीं।

उलूखलाङ्घ्रेरुपरि व्यवस्थितं
मर्काय कामं ददतं शिचि स्थितम् ।
हैयङ्गवं चौर्यविशङ्कितेक्षणं
निरीक्ष्य पश्चात् सुतमागमच्छनै: ॥ ८ ॥
ulūkhalāṅghrer upari vyavasthitaṁ markāya kāmaṁ dadataṁ śici sthitam haiyaṅgavaṁ caurya-viśaṅkitekṣaṇaṁ nirīkṣya paścāt sutam āgamac chanaiḥ
अर्थ: उन्होंने देखा कि उनका लाला उलटे ऊखल पर खड़ा होकर छींके पर टँगे मक्खन को स्वच्छन्दता से एक बन्दर को बाँट रहा है, और चोरी पकड़े जाने के भय से उसकी आँखें इधर-उधर घूम रही हैं; तब वे धीरे से पीछे से उसके पास आईं। (स्कन्ध 10, अध्याय 9, श्लोक 8)
जैसे ही कृष्ण ने हाथ में छड़ी लिए आती हुई माँ को देखा, वे नीचे कूदकर ऐसे भागे मानो सचमुच डर गए हों — वही प्रभु जिन्हें दीर्घ तपस्या से पवित्र हुए बड़े-बड़े योगी भी अपने मन से नहीं पा सकते। यशोदा अपने लाला के पीछे दौड़ीं। पतली कमर और भारी नितम्बों के कारण धीमी पड़ती हुई, बाल बिखरते और पुष्प गिरते हुए, अन्ततः उन्होंने कृष्ण को पकड़ लिया। रोते और हाथों से आँखें मलते हुए — जिससे काजल मुख पर फैल गया था — तथा भय से व्याकुल दृष्टि से ऊपर देखते हुए अपने अपराधी लाला को देखकर उन्होंने उसका हाथ पकड़ लिया और केवल शरारत सुधारने के लिए उसे धीरे से डाँटा-धमकाया।
फिर छड़ी को दूर फेंककर और अपने लाला को इतना भयभीत देखकर वात्सल्यमयी माता ने — जो अपने बालक की सच्ची महिमा नहीं जानती थीं — निश्चय किया कि वे उसे किसी साधारण चंचल बालक की भाँति लकड़ी के ऊखल से बाँध देंगी।
यहाँ भागवत हमें स्मरण कराता है कि यह ‘साधारण बालक’ वस्तुतः कौन है। उसका न कोई भीतर है न बाहर, न आदि है न अन्त; वही समस्त जगत् का आदि-अन्त और बाहर-भीतर है — वही स्वयं जगत् है। इसी अव्यक्त, इन्द्रियातीत भगवान् को अपना नन्हा लाला मानकर यशोदा उसे रस्सी से बाँधने चलीं।
न चान्तर्न बहिर्यस्य न पूर्वं नापि चापरम् ।
पूर्वापरं बहिश्चान्तर्जगतो यो जगच्च य: ॥ १३ ॥
तं मत्वात्मजमव्यक्तं मर्त्यलिङ्गमधोक्षजम् ।
गोपिकोलूखले दाम्ना बबन्ध प्राकृतं यथा ॥ १४ ॥
na cāntar na bahir yasya na pūrvaṁ nāpi cāparam pūrvāparaṁ bahiś cāntar jagato yo jagac ca yaḥ taṁ matvātmajam avyaktam martya-liṅgam adhokṣajam gopikolūkhale dāmnā babandha prākṛtaṁ yathā
अर्थ: जिसका न भीतर है न बाहर, न आदि है न अन्त; जो स्वयं समस्त जगत् का आदि-अन्त और बाहर-भीतर है, और जो स्वयं जगत्-रूप है — उस अव्यक्त, अविनाशी, इन्द्रियातीत भगवान् को अपना पुत्र मानकर गोपी ने उसे साधारण बालक की भाँति रस्सी से ऊखल से बाँध दिया। (स्कन्ध 10, अध्याय 9, श्लोक 13-14)
किन्तु जब उन्होंने अपने अपराधी लाला के चारों ओर रस्सी बाँधनी चाही, तो वह दो अंगुल छोटी पड़ गई। अतः उन्होंने उसमें दूसरी रस्सी जोड़ी — और वह भी दो अंगुल छोटी रही। उन्होंने एक और, फिर एक और जोड़ी, घर की सारी रस्सियाँ इकट्ठी कर लीं; परन्तु जितनी भी रस्सियाँ जोड़ीं, हर बार वह ठीक दो अंगुल छोटी रह गई। देखने आई गोपियाँ मुस्कुराने लगीं, और स्वयं यशोदा भी, पसीने से भीगी और बिखरी चोटी से गिरी माला के साथ, आश्चर्यचकित हो उठीं।

तद् दाम बध्यमानस्य स्वार्भकस्य कृतागस: ।
द्व्यङ्गुलोनमभूत्तेन सन्दधेऽन्यच्च गोपिका ॥ १५ ॥
tad dāma badhyamānasya svārbhakasya kṛtāgasaḥ dvy-aṅgulonam abhūt tena sandadhe ’nyac ca gopikā
अर्थ: किन्तु अपने अपराधी लाला को बाँधने के लिए जो रस्सी उन्होंने ली, वह दो अंगुल छोटी पड़ गई, इसलिए गोपी ने उसमें दूसरी रस्सी जोड़ी। (स्कन्ध 10, अध्याय 9, श्लोक 15)
अन्ततः अपनी माँ के पसीने से भीगे शरीर, बालों से खिसकते पुष्पों और उनके व्यर्थ परिश्रम की सारी थकान देखकर बालक कृष्ण को दया आ गई, और उन्होंने स्वेच्छा से स्वयं को बँधने दिया। इसमें भगवान् ने एक महान् रहस्य प्रकट किया: जो समस्त ब्रह्माण्ड को उसके शासकों सहित अपने वश में रखते हैं, वही अपने भक्तों के शुद्ध प्रेम के वश में हो जाते हैं। वे बल से नहीं, केवल प्रेम से वश में होते हैं।
स्वमातु: स्विन्नगात्राया विस्रस्तकबरस्रज: ।
दृष्ट्वा परिश्रमं कृष्ण: कृपयासीत् स्वबन्धने ॥ १८ ॥
sva-mātuḥ svinna-gātrāyā visrasta-kabara-srajaḥ dṛṣṭvā pariśramaṁ kṛṣṇaḥ kṛpayāsīt sva-bandhane
अर्थ: अपनी माता के पसीने से भीगे शरीर, बिखरी चोटी से गिरती माला और उनकी सारी थकान देखकर कृष्ण ने दयावश स्वयं को बँधने दिया। (स्कन्ध 10, अध्याय 9, श्लोक 18)
शुकदेवजी आश्चर्य से कहते हैं कि जो कृपा इस सरल गोप-माता को मुक्तिदाता भगवान् से प्राप्त हुई, वह न ब्रह्मा को मिली, न शिव को, और न भगवान् के वक्षःस्थल पर सदा निवास करने वाली लक्ष्मी को ही। क्योंकि गोपी के पुत्र बने परमात्मा को देहाभिमानी जन, तथा ज्ञानी और आत्मदर्शी भी उतनी सहजता से नहीं पाते, जितनी सहजता से प्रेमी भक्तजन पा लेते हैं।
नायं सुखापो भगवान्देहिनां गोपिकासुत: ।
ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ २१ ॥
nāyaṁ sukhāpo bhagavān dehināṁ gopikā-sutaḥ jñānināṁ cātma-bhūtānāṁ yathā bhaktimatām iha
अर्थ: गोपी के पुत्र रूप में यह परमात्मा देहधारियों को, तथा ज्ञानियों और आत्मदर्शियों को भी उतनी सहजता से प्राप्त नहीं होते, जितने प्रेमपूर्ण भक्तिमान् जनों को। (स्कन्ध 10, अध्याय 9, श्लोक 21)
ऊखल से बँधे और माँ के घरेलू कार्यों में लौट जाने पर अकेले छोड़े गए प्रभु ने आँगन में पास-पास खड़े दो विशाल यमलार्जुन वृक्षों की ओर दृष्टि डाली। शुकदेवजी बताते हैं कि ये कोई साधारण वृक्ष न थे। ये कभी देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के दो वैभवशाली पुत्र नलकूवर और मणिग्रीव थे; अपार धन-वैभव के मद में चूर होकर इन्होंने एक दिन मर्यादा लाँघ दी थी, और इसी दुष्कर्म के कारण देवर्षि नारद ने इन्हें शाप देकर वृक्ष-रूप में बाँध दिया था। अब माँ के प्रेम से बँधे बालक ने उनकी ओर देखा — और उस मौन दृष्टि में उनकी मुक्ति का वचन छिपा था, जिस कथा को अगला अध्याय खोलेगा।

कृष्णस्तु गृहकृत्येषु व्यग्रायां मातरि प्रभु: ।
अद्राक्षीदर्जुनौ पूर्वं गुह्यकौ धनदात्मजौ ॥ २२ ॥
पुरा नारदशापेन वृक्षतां प्रापितौ मदात् ।
नलकूवरमणिग्रीवाविति ख्यातौ श्रियान्वितौ ॥ २३ ॥
kṛṣṇas tu gṛha-kṛtyeṣu vyagrāyāṁ mātari prabhuḥ adrākṣīd arjunau pūrvaṁ guhyakau dhanadātmajau purā nārada-śāpena vṛkṣatāṁ prāpitau madāt nalakūvara-maṇigrīvāv iti khyātau śriyānvitau
अर्थ: जब उनकी माता घर के कार्यों में व्यस्त थीं, तब प्रभु कृष्ण ने उन दो अर्जुन वृक्षों को देखा जो पूर्वकाल में कुबेर के पुत्र दो गुह्यक थे। बहुत पहले मद से उन्मत्त होकर वे नारद के शाप से वृक्ष बना दिए गए थे; महान् ऐश्वर्य से सम्पन्न वे दोनों नलकूवर और मणिग्रीव नाम से प्रसिद्ध थे। (स्कन्ध 10, अध्याय 9, श्लोक 22-23)
1. अनन्त प्रभु प्रेम से बँधना स्वीकार करते हैं। जिसका न भीतर है न बाहर, जो समस्त जगत् को धारण करते हैं, वही एक माँ की रस्सी से बँध जाते हैं (श्लोक 13-18)। भगवान् बल या ज्ञान से नहीं पकड़े जाते, किन्तु शुद्ध प्रेम के आगे स्वयं समर्पित हो जाते हैं।
2. दामोदर नाम कृपा का नाम है। ‘दाम’ (रस्सी) और ‘उदर’ (पेट) से कृष्ण ‘दामोदर’ कहलाते हैं। उनके श्रेष्ठतम नाम उनकी विजयों से नहीं, अपितु भक्तों के प्रेम के आगे उनके मधुर समर्पण से उत्पन्न होते हैं।
3. दो अंगुल छोटी रस्सी। जो रस्सी कभी उन्हें पूरी तरह घेर न सकी (श्लोक 15-16), वह सिखाती है कि हमारा प्रयास सदा कुछ अधूरा रह जाता है; भगवान् तभी बँधते हैं जब हमारा प्रेम-श्रम उनकी कृपा से जुड़ जाता है।
4. भक्ति सबसे बड़ों से भी बढ़कर है। यशोदा को वह मिला जो ब्रह्मा, शिव और लक्ष्मी को भी न मिला (श्लोक 20-21)। प्रेममयी भक्ति भगवान् को बल, तप या ज्ञान से कहीं अधिक निकट ले आती है।
5. भगवान् की शरारत भी कृपा है। माखनचोरी, झूठे आँसू, भागना और बँधना — सब भगवान् की लीला है, जो भक्तों को गहरी आत्मीयता में खींचती है और अध्याय के अन्त में दो पतित आत्माओं की मुक्ति की भूमिका रचती है।
परम भगवान् का, एक ऐसी माँ के हाथों ऊखल से बँध जाना जो पूर्णतः नहीं जानती कि वह कौन है — यह दृश्य अत्यन्त हृदयस्पर्शी है। हर बार दो अंगुल छोटी पड़ने वाली वह रस्सी समस्त शास्त्रों की सबसे कोमल शिक्षाओं में से एक है: हमारे प्रयास चाहे कितने ही सच्चे क्यों न हों, वे अनन्त को कभी पूरी तरह घेर नहीं सकते; कुछ न कुछ सदा अधूरा रह जाता है — और वह ‘कुछ’ है उनकी कृपा, जिसे वे उसी क्षण मुक्त हस्त से देते हैं जब वे हमारे प्रेममय परिश्रम को देखते हैं। यशोदा कृष्ण को रस्सियों के बल से नहीं बाँधतीं; वे उन्हें अपने माथे के पसीने और हृदय के प्रेम से बाँधती हैं, और वे, यह देखकर, स्वयं को बाँध लेते हैं। यही भक्ति का सम्पूर्ण रहस्य है। हमसे यह नहीं कहा जाता कि हम भगवान् को पकड़ने योग्य बलवान् या ज्ञानी बनें। हमसे केवल इतना कहा जाता है कि हम अपने सर्वस्व से उन्हें प्रेम करें, जब तक कि वे, उस प्रेम से द्रवित होकर, स्वयं पकड़े जाने को तैयार न हो जाएँ।
आज ‘दामोदर’ नाम का ध्यान करें — वे भगवान् जिन्होंने स्वयं को प्रेम से बँधने दिया। अपने कार्यों में लगे रहते हुए अपने दिन के हर छोटे परिश्रम को, चाहे वह कितना ही साधारण क्यों न हो, यशोदा के मक्खन-मथन की भाँति भगवान् के प्रति प्रेम के रूप में समर्पित करें, इस विश्वास के साथ कि जहाँ आपकी शक्ति दो अंगुल छोटी पड़े, वहाँ उनकी कृपा बन्धन को पूरा कर देगी। आरम्भ में धीरे-धीरे जपें: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
दशम स्कन्ध का यह नवाँ अध्याय हमें वह लीला देता है जो भगवान् को दामोदर नाम देती है और उनके हृदय का गूढ़तम नियम प्रकट करती है: कि परम भगवान्, जो बल, तप या ज्ञान से अगम्य हैं, शुद्ध प्रेम से सहज ही और आनन्दपूर्वक वश में हो जाते हैं। यशोदा मक्खन मथती और लाला के गीत गाती हैं; बालक मटकी फोड़कर मक्खन चुराकर भाग जाता है; माँ पीछा करती हैं और घर की सारी रस्सियों से भी उसे न बाँध पाकर अन्ततः तभी बाँध पाती हैं जब वह स्वयं चाहता है। उनके थके, प्रेममय हाथों में अनन्त प्रभु स्नेह के बन्दी बन जाते हैं, और शुकदेवजी घोषित करते हैं कि उनका सौभाग्य ब्रह्मा, शिव और लक्ष्मी से भी बढ़कर था। अध्याय के अन्त में वह बँधा बालक दो विशाल वृक्षों की ओर देखता है, और हम अनुभव करते हैं कि उसका प्रेम शाप से ग्रस्त दो अभिमानी आत्माओं तक भी पहुँचने को है। हम भी, बँध जाने वाले भगवान् की कथा सुनकर, उन्हें उस एक रस्सी से बाँधना सीखें जिसका वे कभी विरोध नहीं कर सकते — प्रेम की रस्सी।
श्रीमद्भागवतम् का दिव्य ज्ञान हमारे हृदयों में शुद्ध भक्ति जगाए।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
जय श्री माधव।
यह लेखक के अपने शब्दों में एक मौलिक, श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन है, जिसमें संक्षिप्त उद्धृत श्लोक देवनागरी एवं लिप्यन्तरण सहित दिए गए हैं और उनके अर्थ सारांश रूप में प्रस्तुत हैं। यह किसी एक प्रकाशक के सतत अनुवाद या टीका का पुनरुत्पादन नहीं है। किसी प्रकाशक के संबंध या समर्थन का दावा नहीं किया गया है।
जय श्री माधव
यह श्रृंखला प्रतिदिन आगे बढ़ती है — पूज्य पंडित डॉ. श्री काशीनाथ मिश्र के मार्गदर्शन में, शास्त्र के क्रम में।