श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10, अध्याय 88: शिव-उपासक समृद्ध और विष्णु-भक्त निर्धन क्यों, कृपा पर श्रीकृष्ण की शिक्षा, और वृकासुर से शिवजी की प्रभु द्वारा रक्षा।
एक असुर भगवान् शिव से स्पर्श-मात्र से मार डालने का वर पाकर उसे वरदाता पर ही आज़माने चलता है — जब तक कि हाथ में कुश लिए एक छोटे ब्रह्मचारी के वेश में भगवान् नारायण केवल मीठे वचनों से उस आतंक को समाप्त नहीं कर देते।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीमद्भागवतम् विज़्डम में पुनः स्वागत है — श्रीमद्भागवत महापुराण की पवित्र कथाओं और शिक्षाओं की हमारी भक्तिमयी यात्रा। दशम स्कन्ध के इस अट्ठासीवें अध्याय में राजा परीक्षित पूछते हैं कि भगवान् शिव के उपासक प्रायः धनवान् क्यों होते हैं, जबकि स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु के भक्त प्रायः अभाव में क्यों रहते हैं। शुकदेवजी का उत्तर श्रीकृष्ण की कृपा-विषयक शिक्षा में और फिर वृकासुर के इतिहास में खुलता है, जिसने शिवजी का वर शिवजी पर ही तान दिया।
सतासीवें अध्याय में शुकदेवजी ने वह वेदस्तुति सुनाई जो नारदजी ने नारायण ऋषि से सुनी थी, और अन्त में त्रिगुणातीत श्रीहरि के निरन्तर ध्यान का उपदेश दिया।
राजा परीक्षित ने कहा — देवताओं, असुरों और मनुष्यों में जो लोग सब भोगों को त्याग चुके भगवान् शिव की उपासना करते हैं, वे प्रायः धनी और भोग-सम्पन्न देखे जाते हैं; किन्तु लक्ष्मी के स्वामी और समस्त ऐश्वर्य के अधीश्वर श्रीहरि के भक्त प्रायः ऐसे नहीं होते। दोनों प्रभु विपरीत स्वभाव के हैं, फिर भी उनके उपासकों की गति अपेक्षा के ठीक उलटी है। “इस विषय में हमें बड़ा सन्देह है,” राजा ने कहा, “हम इसे समझना चाहते हैं।”
शुकदेवजी ने पहले इस पहेली के मूल सिद्धान्त को खोला। भगवान् शिव सदा अपनी शक्ति से युक्त और तीनों गुणों से आवृत हैं; वे त्रिविध अहंकार — सात्त्विक, राजसिक और तामसिक — के अधिष्ठाता हैं, जिससे सोलह विकार उत्पन्न होते हैं: मन, दस इन्द्रियाँ और पाँच महाभूत। जो इनके अधिष्ठाता देव की उपासना करता है, उसे सब प्रकार की सांसारिक समृद्धि सुलभ हो जाती है, क्योंकि वह जगत् के उपादान के ही स्वामी के पास जाता है। किन्तु श्रीहरि भिन्न ही कोटि के हैं — प्रकृति से परे साक्षात् परम पुरुष, गुणों से अछूते, सबके द्रष्टा और हर हृदय के साक्षी; और उनका उपासक भी उन्हीं की भाँति निर्गुण हो जाता है।
हरिर्हि निर्गुण: साक्षात् पुरुष: प्रकृते: पर: ।
स सर्वदृगुपद्रष्टा तं भजन् निर्गुणो भवेत् ॥ ५ ॥
harir hi nirguṇaḥ sākṣāt puruṣaḥ prakṛteḥ paraḥ sa sarva-dṛg upadraṣṭā taṁ bhajan nirguṇo bhavet
अर्थ: श्रीहरि साक्षात् परम पुरुष हैं — प्रकृति से परे और गुणों से रहित; वे सब कुछ देखने वाले और सबके साक्षी हैं। जो उनका भजन करता है, वह भी निर्गुण हो जाता है। (स्कन्ध 10, अध्याय 88, श्लोक 5)
फिर शुकदेवजी ने राजा को स्मरण कराया कि यही प्रश्न कभी उनके पितामह ने भी पूछा था। अश्वमेध यज्ञों के समाप्त होने पर जब युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से धर्मों का उपदेश सुन रहे थे, तब उन्होंने यह सन्देह उनके सामने रखा; और मनुष्यों के परम कल्याण के लिए यदुकुल में अवतरित प्रभु ने प्रसन्न होकर उत्तर दिया।
भगवान् ने कहा, “जिस पर मैं अनुग्रह करना चाहता हूँ, उसका धन धीरे-धीरे हर लेता हूँ। तब निर्धन और दुःख-पर-दुःख से पीड़ित उस व्यक्ति को उसके अपने स्वजन भी छोड़ देते हैं।”
यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनै: ।
ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दु:खदु:खितम् ॥ ८ ॥
yasyāham anugṛhṇāmi hariṣye tad-dhanaṁ śanaiḥ tato ’dhanaṁ tyajanty asya svajanā duḥkha-duḥkhitam
अर्थ: श्रीभगवान् ने कहा: जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका धन मैं शनैः-शनैः हर लेता हूँ; फिर धनहीन और दुःख-पर-दुःख झेलते उस व्यक्ति का उसके बन्धु-बान्धव परित्याग कर देते हैं। (स्कन्ध 10, अध्याय 88, श्लोक 8)
प्रभु ने आगे कहा — जब वह पुनः धन के लिए प्रयत्न करके हर बार विफल होता है और निराश होकर मेरे भक्तों से मित्रता कर लेता है, तब मैं उस पर अपनी कृपा उँड़ेल देता हूँ; वह उस परम सूक्ष्म, अनन्त, चिन्मात्र और सत्य ब्रह्म को अपने आत्मरूप में जान लेता है और जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है। “इसीलिए,” श्रीकृष्ण बोले, “लोग मुझे अत्यन्त दुराराध्य मानकर छोड़ देते हैं और अन्य देवताओं को भजते हैं। उन शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवों से राज्यलक्ष्मी पाकर वे उद्धत और उन्मत्त हो जाते हैं, और मद में उन्हीं वरदाता देवों की अवहेलना करने लगते हैं।”
वैष्णव की निर्धनता प्रभु की उपेक्षा नहीं, उनकी शल्य-चिकित्सा है। धन, और उसके चारों ओर जुटने वाले स्वजन, वे काँटे हैं जिनसे संसार आत्मा को पकड़े रहता है; उन्हें निकालकर प्रभु अपने भक्त को मुक्त करते हैं और भक्तों के संग के द्वारा उसे उस एकमात्र निधि तक ले जाते हैं जो कभी खोती नहीं। शीघ्र वर देने वाले देवता ऐसी सम्पदा बरसाते हैं जो अहंकार को फुलाती है, यहाँ तक कि समृद्धि ही उपासक का पतन बन जाती है। प्रभु के भक्त में जो दुर्भाग्य-सा दिखता है, वह उनके प्रेम का सबसे सावधान रूप है।
अपनी वाणी में लौटकर शुकदेवजी ने एक दूसरा सत्य जोड़ा: ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि सभी देव शाप और अनुग्रह दोनों में समर्थ हैं, किन्तु शिव और ब्रह्मा दोनों में तुरन्त प्रवृत्त हो जाते हैं, जबकि अच्युत नहीं। इसे समझाने के लिए ज्ञानी एक प्राचीन इतिहास कहते हैं — कैलासपति गिरीश वृकासुर को वर देकर कैसे घोर संकट में पड़ गए।
शकुनि का दुर्बुद्धि पुत्र वृक एक बार मार्ग में नारदजी से मिला और पूछने लगा कि तीनों महादेवों में सबसे शीघ्र कौन प्रसन्न होता है। नारदजी ने उसे भगवान् शिव के पास भेजा, जो थोड़े से गुण से तुष्ट और थोड़े से दोष से रुष्ट हो जाते हैं। रावण और बाण ने भाटों की भाँति उनकी स्तुति-मात्र की थी, और उन्होंने प्रसन्न होकर उन्हें अतुल ऐश्वर्य दे दिया — पर परिणाम में संकट ही पाया, क्योंकि रावण ने उनके अपने कैलास को ही हिला डाला और बाण ने उन्हें अपने नगर का द्वारपाल बना लिया।
ऐसा उपदेश पाकर वह असुर हिमालय के केदार क्षेत्र में गया और अत्यन्त भयानक रीति से भगवान् हर की आराधना करने लगा — अपने अंगों का मांस काट-काटकर अग्निमुख में आहुति देता हुआ। छह दिन बीत गए, देव के दर्शन न हुए। सातवें दिन निराश होकर उसने वहाँ के तीर्थजल में स्नान किया और गीले केशों सहित अपना सिर अन्तिम आहुति-रूप में काटने के लिए तलवार उठाई।

उसी क्षण परम कारुणिक जटाधारी धूर्जटि भगवान् शिव अग्नि में से अग्नि के ही समान प्रकट हुए, उन्होंने असुर की दोनों भुजाएँ पकड़कर उसे रोक लिया — जैसे कोई मित्र अपने मित्र को आत्मघात से रोके। उनके मंगलमय स्पर्श से वृक का क्षत-विक्षत शरीर फिर पूर्ण हो गया।
फिर प्रभु बोले, “बस, प्रिय, बस! मुझसे जो चाहो वर माँग लो, मैं दूँगा। मेरी शरण में आने वालों के जल-मात्र के अर्पण से मैं प्रसन्न हो जाता हूँ। हाय, तुमने व्यर्थ ही इस शरीर को इतनी निर्दयता से कष्ट दिया।”
तमाह चाङ्गालमलं वृणीष्व मे यथाभिकामं वितरामि ते वरम् ।
प्रीयेय तोयेन नृणां प्रपद्यतामहो त्वयात्मा भृशमर्द्यते वृथा ॥ २० ॥
tam āha cāṅgālam alaṁ vṛṇīṣva me yathābhikāmaṁ vitarāmi te varam prīyeya toyena nṛṇāṁ prapadyatām aho tvayātmā bhṛśam ardyate vṛthā
अर्थ: उन्होंने उससे कहा: प्रिय, बस करो, बस! मुझसे मनचाहा वर चुन लो, मैं उसे दे दूँगा। जो मनुष्य मेरी शरण लेते हैं, उनके थोड़े से जल से ही मैं तुष्ट हो जाता हूँ; अहो, तुमने निष्प्रयोजन अपनी देह को इतना पीड़ित किया। (स्कन्ध 10, अध्याय 88, श्लोक 20)
उस पापी असुर ने ऐसा वर माँगा जो समस्त प्राणियों के लिए भयावह था: “जिस-जिसके सिर पर मैं हाथ रखूँ, वह मर जाए।” हे भरतवंशी, यह सुनकर भगवान् रुद्र क्षण-भर को खिन्न-से हुए; फिर हँसते हुए “ॐ” — ऐसा ही हो — कहकर उन्होंने वह वर दे दिया, मानो साँप को अमृत पिला दिया हो।

वृक ने देर न की। उसकी पापी दृष्टि देवी पार्वती पर जा टिकी थी, और वर की परीक्षा के लिए वह स्वयं शंकर के सिर पर हाथ रखने बढ़ा। अब कल्याणस्वरूप प्रभु अपने ही किए से भयभीत हो उठे। काँपते हुए, पीछे लगे असुर से बचते हुए वे समूची पृथ्वी पर, स्वर्ग की सीमा और दिशाओं के अन्त तक भागे, और फिर उत्तर की ओर बढ़ गए। बड़े-बड़े देवता कोई उपाय न जानकर मौन रह गए। अन्त में शंकर प्रकृति के अन्धकार से परे प्रकाशमान वैकुण्ठ पहुँचे — स्वयं नारायण का धाम, शान्त संन्यासियों की परम गति, जहाँ से कोई लौटता नहीं।

दूर से शिवजी की यह दुर्दशा देखकर भक्तों का संकट हरने वाले भगवान् अपनी योगमाया से एक छोटे ब्रह्मचारी बन गए और असुर से मिलने आगे आए। मूँज की मेखला, काला मृगचर्म, दण्ड और रुद्राक्ष धारण किए, अपने तेज से अग्नि के समान जाज्वल्यमान, हाथ में कुश लिए उन्होंने विद्यार्थी की विनम्रता से असुर का अभिवादन किया। “शाकुनेय,” वे बोले, “आप स्पष्ट ही थके हुए हैं। क्या दूर से आए हैं? क्षण-भर विश्राम कीजिए — यह शरीर ही पुरुष की सब कामनाएँ पूरी करता है। हे महाबली, यदि हमारे सुनने योग्य हो तो बताइए कि आपका क्या अभिप्राय है; लोग प्रायः दूसरों की सहायता से ही अपने कार्य सिद्ध करते हैं।” अमृत बरसाते इन वचनों से असुर की थकान मिट गई और उसने उस बालक को आदि से अन्त तक सब कुछ कह सुनाया।
प्रभु ने सुना, फिर बनावटी अविश्वास से बोले, “यदि ऐसा है तो हम शिव की बात पर विश्वास नहीं कर सकते। क्या आप नहीं जानते कि दक्ष के शाप से वे पिशाचों का आचरण पा चुके हैं और अब प्रेतों-पिशाचों के राजा हैं? पर हे दानवेन्द्र, यदि आपको अब भी उन जगद्गुरु पर भरोसा है, तो इसी क्षण परीक्षा कर लीजिए — अपने ही सिर पर हाथ रखिए। और यदि शंकर का वचन किसी भी प्रकार झूठा निकले, तो उस मिथ्यावादी को मार डालिए, ताकि वह फिर कभी असत्य न बोले।”
यदि वस्तत्र विश्रम्भो दानवेन्द्र जगद्गुरौ ।
तर्ह्यङ्गाशु स्वशिरसि हस्तं न्यस्य प्रतीयताम् ॥ ३३ ॥
yadi vas tatra viśrambho dānavendra jagad-gurau tarhy aṅgāśu sva-śirasi hastaṁ nyasya pratīyatām
अर्थ: हे दानवेन्द्र, यदि आपको उन जगद्गुरु पर विश्वास है, तो हे प्रिय, तुरन्त अपने सिर पर हाथ रखकर स्वयं देख लीजिए। (स्कन्ध 10, अध्याय 88, श्लोक 33)
प्रभु के चतुर और मनोहर वचनों से भ्रमित, बुद्धि-भ्रष्ट उस मूर्ख असुर ने सुध-बुध खोकर अपने ही सिर पर हाथ रख दिया। क्षण-भर में वह वज्र से टूटे सिर-सा गिर पड़ा, और आकाश में “जय!”, “नमः!” और “साधु!” की ध्वनियाँ गूँज उठीं। देवता, ऋषि, पितर और गन्धर्व पापी वृकासुर के गिरते ही पुष्पवर्षा करने लगे, और भगवान् शिव संकट से मुक्त हो गए।

तब पुरुषोत्तम भगवान् ने संकट-मुक्त गिरीश से कहा, “हे देव, हे महादेव! यह पापी अपने ही पाप से मारा गया। महापुरुषों का अपराध करके कौन प्राणी कुशल रह सकता है — फिर आप विश्वेश्वर और जगद्गुरु का अपराध करने वाले की तो बात ही क्या?”
शुकदेवजी ने इस इतिहास के श्रवण-फल के साथ कथा समाप्त की।
य एवमव्याकृतशक्त्युदन्वत: परस्य साक्षात् परमात्मनो हरे: ।
गिरित्रमोक्षं कथयेच्छृणोति वा विमुच्यते संसृतिभिस्तथारिभि: ॥ ४० ॥
ya evam avyākṛta-śakty-udanvataḥ parasya sākṣāt paramātmano hareḥ giritra-mokṣaṁ kathayec chṛṇoti vā vimucyate saṁsṛtibhis tathāribhiḥ
अर्थ: अचिन्त्य शक्तियों के सागर, परात्पर, साक्षात् परमात्मा श्रीहरि द्वारा किए गए शिवजी के इस उद्धार को जो इस प्रकार कहता या सुनता है, वह बार-बार के जन्म-मरण से और शत्रुओं से भी छूट जाता है। (स्कन्ध 10, अध्याय 88, श्लोक 40)
1. प्रभु की कृपा हानि के रूप में भी आ सकती है। श्रीकृष्ण अपने कृपापात्र का धन हर लेते हैं, ताकि संसार से त्यागा गया वह जीव भक्तों से मित्रता करे और ब्रह्म को पाए। विपरीत परिस्थितियाँ प्रभु का हाथ हैं।
2. उपासना उपासक को गढ़ती है। शिव गुणों के अधिष्ठाता हैं, इसलिए उनके उपासक गुणों की वस्तुएँ पाते हैं; हरि निर्गुण हैं, इसलिए उनका उपासक निर्गुण हो जाता है।
3. शीघ्र मिले वर अपने साथ संकट लाते हैं। रावण, बाण और वृक — तीनों ने तुरन्त मिले वर को वरदाता के विरुद्ध ही मोड़ा। बिना शुद्धि के मिली सम्पदा मदान्ध कर देती है।
4. प्रभु रक्षक की भी रक्षा करते हैं। जब देवता मौन खड़े रहे, नारायण ने बिना किसी शस्त्र के, केवल कुछ मधुर वचनों से महादेव को बचा लिया।
5. महापुरुषों का अपराध अपराधी को ही नष्ट करता है। वृक अपने ही हाथ और अपने ही पाप से मरा; महान् आत्माओं का अहित करने वाला कोई भी कुशल नहीं रह सकता।
इस इतिहास में प्रभु अपने दोनों संकटग्रस्त सेवकों के साथ कितनी कोमलता से पेश आते हैं। असीम दया में भयंकर वर दे बैठे शिवजी को वे बिना एक शब्द की फटकार के बचा लेते हैं; और युधिष्ठिर को, तथा उनके माध्यम से हर चिन्तित भक्त को, वे भागवत की सबसे कठोर सान्त्वना देते हैं — कि जब वे हमसे कुछ छीनते हैं, तो इसलिए कि वे हमें स्वयं को देना चाहते हैं। नारदजी ने जिन शीघ्र वरों की बात कही, प्रभु की अपनी कृपा उनसे धीमी और गहरी है। वह हाथों को खाली करती है ताकि वे अन्ततः समर्पण में जुड़ सकें; वह स्वजनों को दूर जाने देती है ताकि भक्तों का संग ही हमारा परिवार बन जाए। वृक ने अपना मांस चढ़ाया और ऐसा वर पाया जिसने उसे मार डाला; भक्त सच्चे हृदय से थोड़ा-सा जल चढ़ाता है और स्वयं प्रभु को पा लेता है। हम केवल उन्हीं को चाहें।
आज जब कोई छोटी-सी हानि आपको छुए — योजना बिगड़े, धन निकल जाए, कोई मित्र रूखा हो जाए — तो शिकायत से पहले रुककर युधिष्ठिर को कहे प्रभु के वचन याद कीजिए। उस हानि को उन्हीं का किया मानकर अर्पित कीजिए, और कुछ क्षण किसी भक्त के संग, भागवत के एक पृष्ठ या हरिनाम में बिताइए। आरम्भ में धीरे-धीरे जपें: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
दशम स्कन्ध का यह अट्ठासीवाँ अध्याय भक्त की सबसे पुरानी शिकायत — सांसारिक लोग फलते-फूलते क्यों हैं और श्रद्धालु अभाव में क्यों रहते हैं — को प्रभु के हृदय में झाँकने की एक खिड़की बना देता है। श्रीकृष्ण अपने प्रियजनों को ब्रह्म तक ले जाने के लिए निर्धन करते हैं, जबकि शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता ऐसा धन बरसाते हैं जो अभिमान में समाप्त होता है; और वृकासुर का इतिहास दिखाता है कि जल्दबाज़ी का वर उसके दिव्य दाता को भी क्या मूल्य चुकवा सकता है — जब तक प्रभु एक मुस्कान और एक प्रश्न से शिवजी को बचा नहीं लेते। हम हर तुरन्त मिलने वाले पुरस्कार से अधिक उनकी धीमी, पूर्ण कृपा पर भरोसा करें।
श्रीमद्भागवतम् का दिव्य ज्ञान हमारे हृदयों में शुद्ध भक्ति जगाए।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
जय श्री माधव।
यह लेखक के अपने शब्दों में एक मौलिक, श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन है, जिसमें संक्षिप्त उद्धृत श्लोक देवनागरी एवं लिप्यन्तरण सहित दिए गए हैं और उनके अर्थ सारांश रूप में प्रस्तुत हैं। यह किसी एक प्रकाशक के सतत अनुवाद या टीका का पुनरुत्पादन नहीं है। किसी प्रकाशक के संबंध या समर्थन का दावा नहीं किया गया है।
जय श्री माधव
यह श्रृंखला प्रतिदिन आगे बढ़ती है — पूज्य पंडित डॉ. श्री काशीनाथ मिश्र के मार्गदर्शन में, शास्त्र के क्रम में।